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पाण्डव

  • पाण्डुके पुत्र । युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—ये पाँचों पाण्डव कहलाते थे । शतशृङ्ग-निवासी ऋषियोंद्वारा पाण्डवोंके नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । १९-२२ ) ।
  • वसुदेवके पुरोहित काश्यपके द्वारा इनके उपनयनादि संस्कार और राजर्षि शुक्रद्वारा इनका विविध विद्याओंमें पारङ्गत होना ( आदि० १२३ । २९ के बाद, पृष्ठ ३६९ ) ।
  • पाण्डुके निधनपर इनका विलाप ( आदि० १२४ । १० के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ३०२ ) ।
  • शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंद्वारा इनको हस्तिनापुर पहुँचाकर भीष्म आदि कौरवोंको इनके जन्मोंका वृत्तान्त सुनाना ( आदि० १२५ । २२-२८ ) ।
  • कृपाचार्यसे इनका अध्ययन ( आदि० १२६ । २२ ) ।
  • द्रोणाचार्यसे इनका अध्ययन ( आदि० १३१ । १३ ) ।
  • एकलव्यकी धनुर्विद्यासे इनका विजित होना ( आदि० १३१ । ४५ ) ।
  • द्रुपदपर इनका आक्रमण और विजय ( आदि० १३० । ५२-६३ ) ।
  • धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंका वारणावत जाना ( आदि० १४२ । ६-१९ ) ।
  • विदुरद्वारा इनको कौरवोंके कुचक्रसे बचनेका संकेत ( आदि० १४४ । १९-२६ ) ।
  • वारणावतनिवासियोंद्वारा इनका स्वागत ( आदि० १४५ । १-५ ) ।
  • सुरंगृहसे लाक्षागृहसे निकलकर इनका पलायन ( आदि० १४७ । ११-१८ ) ।
  • विदुर-जीके भेजे हुए नाविकके द्वारा इनका गङ्गापार होना ( आदि० १४८ । १३ ) ।
  • इनको व्यासजीका आश्वासन तथा एक मासतक एकचक्रा नगरमें ठहरनेका आदेश ( आदि० १५५ । ७-१८ ) ।
  • एकचक्रानगरमें इनका ब्राह्मणके घरमें निवास ( आदि० १५६ । २ ) ।
  • उस
  • नगरीमें इनकी भिक्षावृत्ति ( आदि० १५६ । ४ ) ।
  • इनके प्रति एक ब्राह्मणद्वारा द्रोण तथा द्रुपदके पारस्परिक विरोधका वृत्तान्त एवं द्रौपदीके जन्म और उनके स्वयंवरका वर्णन ( आदि० अध्याय १५४ से १५६ तक ) ।
  • इनके विषयमें द्रुपदका शोक ( आदि० १६६ । ५६ के बाद ) ।
  • द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाकर इनको शान्त करनेके लिये व्यासजीकी आज्ञा ( आदि० १५८ । ५ ) ।
  • चित्ररथ गन्धर्वद्वारा इनको दिव्य अश्वोंकी प्राप्ति ( आदि० १५८ । ५ ) ।
  • इनका धौम्यके आश्रममें जाना और इनके द्वारा उनका पुरोहितके रूपमें वरण ( आदि० १६२ । ६ ) ।
  • इनकी पञ्चालयात्रा ( आदि० १६३ अध्याय ) ।
  • द्रुपदके नगरमें इनका कुम्भकारके घरमें निवास ( आदि० १६४ । १ ) ।
  • ब्राह्मणवेषमें इनका द्रौपदीके स्वयंवरमें प्रवेश ( आदि० १६४ । २० ) ।
  • स्वयंवरमें श्रीकृष्णद्वारा इनका पहचाना जाना ( आदि० १६५ । १ ) ।
  • द्रौपदीरूप भिक्षाका मिलकर उपभोग करनेके लिये इनको माताका आदेश ( आदि० १९० । २ ) ।
  • इनसे मिलनेके लिये बलरामसहित श्रीकृष्णका कुम्भकारके घरमें आगमन ( आदि० १९० । १८ ) ।
  • धृष्टद्युम्नद्वारा गुप्तरूपसे इनके व्यवहारोंका निरीक्षण ( आदि० १९१ । १-२ ) ।
  • द्रुपदद्वारा इनके शील-स्वभावकी परीक्षा ( आदि० १९३ । ४-१० ) ।
  • व्यास-द्वारा इनके पूर्वजन्मके दिव्य वृत्तान्तका द्रुपदके प्रति वर्णन ( आदि० १९४ अध्याय ) ।
  • धौम्यमुनिद्वारा इनका क्रमशः द्रौपदीके साथ विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १९७ अध्याय ) ।
  • द्रुपदके विवाहोपलक्षमें इनको श्रीकृष्णद्वारा बहुमूल्य वस्तुओंकी भेंट ( आदि० १९८ । १३ ) ।
  • पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा ( आदि० १९९ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंको पराक्रमसे दबानेके लिये कर्णकी सम्मति ( आदि० २०१ अध्याय ) ।
  • भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह ( आदि० २०२ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा पाण्डवोंको उपहार भेजने और उन्हें बुलाने-की सम्मति ( आदि० २०३ । १-१२ ) ।
  • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाकर पाण्डवोंको भेंट देना और उन्हें हस्तिनापुर भेजनेके लिये द्रुपदसे प्रस्ताव करना ( आदि० २०४ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका हस्तिनापुर आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना ( आदि० २०६ । १-५१ ) ।
  • पाण्डवोंके यहाँ नारद-जीका आगमन और द्रौपदीको लेकर उनमें फूट न हो-इसलिये कुछ नियम बनानेकी प्रेरणा देकर सुन्द और उप-सुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियमनिर्माण ( आदि० अध्याय २०७ से २११ अध्यायतक ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णकी पाण्डवोंका उन्हें पहुँचाना ( सभा० २ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका मयनिर्मित सभाभवनमें प्रवेश और निवास ( सभा० ५ अध्याय ) ।
  • नारदजीका पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आना और पाण्डवोंद्वारा उनकी पूजा ( सभा० ५१ । १२-१६ ) ।
  • पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत ( सभा० ४८ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंकी हस्तिनापुरयात्रा ( सभा० ५८ । १९-३८ ) ।
  • जुएमें पाण्डवोंकी पराजय ( सभा० ५९ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीद्वारा पाण्डवोंकी दास्यभावसे मुक्ति ( सभा० ७१ । २८-३३ ) ।
  • धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको सारा धन लौटाकर विदा करना ( सभा० ७३ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनका पुनः द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और धृतराष्ट्रद्वारा उसकी स्वीकृति ( सभा० ७४ अध्याय ) ।
  • दुःशासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास ( सभा० ७७ । २-१४ ) ।
  • वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टाके विषयमें धृतराष्ट्र और विदुरका संवाद ( सभा० ८० । १-१८ ) ।
  • पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवस ( वन० १ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश, विदुरजीका वहाँ आकर उनसे मिलना और उनसे बातचीत करना ( वन० ५ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका वध करनेके लिये दुर्योधन आदिकी वनमें जानेकी तैयारी और व्यासजीका आकर उनको रोकना ( वन० अध्याय ७ से ८ तक ) ।
  • व्यासजीकी पाण्डवोंके प्रति दयाका कारण ( वन० ९ । २०-२३ ) ।
  • मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भाव करनेका अनुरोध ( वन० १० । १०-२८ ) ।
  • भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंसहित श्रीकृष्णका, पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्नका, चेदिराज धृष्टकेतुका तथा कैकय राजकुमारोंका पाण्डवोंसे मिलनेके लिये वनमें आना और उन सबकी बातचीत ( वन० अध्याय १२ से २२ तक ) ।
  • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और धृतराष्ट्रका उनके लिये व्याकुल होना ( वन० २३ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना ( वन० २४ अध्याय ) ।
  • महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्माचरणका आदेश देना ( वन० २५ अध्याय ) ।
  • दम्भोद्भवपुत्र वकका पाण्डवोंको ब्राह्मणोंकी महिमा बताना ( वन० २६ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीसहित पाण्डवोंका परस्पर संवाद तथा उनका पुनः काम्यकवनमें जाना ( वन० अध्याय २७ से ३६ तक ) ।
  • बृहदश्वका पाण्डवोंको नलोपाख्यान सुनाकर युधिष्ठिरको द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताना ( वन० अध्याय ५२ से ७९ तक ) ।
  • अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता
  • ( वन ८० अध्याय ) ।
  • नारदजीका पाण्डवोंको तीर्थयात्राकी महिमा बताना और पुलस्त्यवर्णित तीर्थयात्राका प्रसङ्ग सुनाना ( वन० अध्याय ८१ से ८५ तक ) ।
  • धौम्यद्वारा पाण्डवोंके प्रति विभिन्न दिशाओंके तीर्थोंका वर्णन ( वन० अध्याय ८६ से ९० तक ) ।
  • महर्षि लोमशका स्वर्गसे आकर पाण्डवोंको अर्जुनके समाचार बताना और इन्द्रका संदेश सुनाना ( वन० ९१ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका अपने अधिक साथियोंको विदा करके लोमशजीके साथ तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान करना ( वन० अध्याय ९२ से ९३ तक ) ।
  • पाण्डवोंका विभिन्न तीर्थोंमें जाना और लोमशजीसे उनके माहात्म्य सुनना ( वन० अध्याय ९४ से १३८ तक ) ।
  • पाण्डवोंकी उत्तराखण्डयात्रा ( वन० अध्याय १३९ से १४२ तक ) ।
  • गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना और घटोत्कचकी सहायतासे इनका गन्धमादनपर पहुँचना ( वन० अध्याय १४३ से १४५ तक ) ।
  • पाण्डवोंका गन्धमादनमें निवास, सौगन्धिकसरोवर एवं कदलीवनके दर्शन; भीमकी हनुमान्‌जीसे भेंट, जटासुर-वध, वृषपर्वाके यहाँ होते हुए इनका राजर्षि आर्षिषेणके आश्रमपर जाना, कुबेरसे इनकी भेंट तथा धौम्यका इन्हें मरुत्पर्वतके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना ( वन० अध्याय १४६ । १ से १६३ तक ) ।
  • पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका गन्धमादनपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना ( वन० अध्याय १६४ से १६५ तक ) ।
  • इन्द्रका पाण्डवोंको सांत्वना देकर लौटना ( वन० १६६ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका अर्जुनके मुखसे उनकी यात्राका वृत्तान्त सुनना ( वन० अध्याय १६७ से १७३ तक ) ।
  • पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान और द्वैतवनमें प्रवेश ( वन० अध्याय १७४ से १७७ तक ) ।
  • पाण्डवोंका पुनः द्वैतवनमें काम्यकवनमें प्रवेश और वहाँ इनके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन ( वन० अध्याय १८२ से १८४ तक ) ।
  • पाण्डवोंका मार्कण्डेयजीके मुखसे नाना प्रकारके आख्यान और उपदेश सुनना ( वन० अध्याय १८४ से २३२ तक ) ।
  • पाण्डवोंका गन्धर्वोंको परास्त करके दुर्योधन आदिको उनकी कैदसे छुड़ाना ( वन० अध्याय २४४ से २४५ तक ) ।
  • पाण्डवोंका आश्रमपर आकर द्रौपदी हरणका समाचार सुन जयद्रथका पीछा करना ( वन० २६९ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीका पाण्डवोंका पराक्रम वर्णन करना ( वन० २७० अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार ( वन० २७१ अध्याय ) ।
  • मार्कण्डेयजीका पाण्डवोंको श्रीराम और सावित्रीका उपाख्यान सुनाना ( वन० अध्याय २७४ से २९९ तक ) ।
  • ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थनकाष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दुखी होना ( वन० ३११ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंके शाप देनेके लिये गये हुए चार पाण्डवोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना ( वन० ३१२ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका सबको जिलाकर उसका धर्मके प्रति प्रकट हो युधिष्ठिरको वर देना ( वन० अध्याय ३१३ से ३१४ तक ) ।
  • अज्ञातवासके निमित्त पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना ( वन० ३१५ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीसहित पाण्डवोंका विराटनगरमें अज्ञातवास तथा उनके द्वारा त्रैगर्तों एवं कौरवोंको पराजित करके विराटकी गौओंकी रक्षा ( विराट० अध्याय १ से ६८ तक ) ।
  • अपने घरमें पाण्डवोंका परिचय पाकर राजा विराटके द्वारा उनका सत्कार और इन्हें अपना राज्य समर्पित करके इनकी रुचिके अनुसार उनका अर्जुनकुमार अभिमन्युके साथ उत्तराका विवाह करना ( विराट० अध्याय ६९ से ७२ तक ) ।
  • द्रुपदके संदेशसे राजाओंका पाण्डवपक्षकी ओरसे युद्धके लिये आगमन ( उद्योग० ५ अध्याय ) ।
  • पाण्डवपक्षमें आयी हुई सेनाका संक्षिप्त विवरण ( उद्योग० १११— ११४ ) ।
  • दुर्योधनद्वारा पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन ( उद्योग० ५५ अध्याय ) ।
  • संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धकी तैयारीका वर्णन ( उद्योग० १३० । २—२५ ) ।
  • कुन्तीका विदुलौपाख्यान सुनाकर पाण्डवोंके लिये शौर्यका संदेश देना ( उद्योग० अध्याय १३२ से १३७ तक ) ।
  • पाण्डवसैन्यका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश, पड़ाव तथा शिविरनिर्माण ( उद्योग० अध्याय १३९ से १४२ तक ) ।
  • बलरामजीका पाण्डवोंसे विदा लेकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान ( उद्योग० १४७ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनका उल्लूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास संदेश भेजना ( उद्योग० १६० अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उल्लूकका दुर्योधनके संदेशकी सुनाना ( उद्योग० १६१ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका उल्लूकको दुर्योधनके संदेशका उत्तर । पाँचों पाण्डवोंका संदेश लेकर उल्लूकका लौटना ( उद्योग० १६२ अध्याय ) ।
  • पाण्डवसेनाका युद्धके मैदानमें जाना ( उद्योग० १६४ अध्याय ) ।
  • पाण्डवपक्षके रथी-अतिरथी आदिका वर्णन ( उद्योग० अध्याय १६९ से १७२ तक ) ।
  • पाण्डवसेनाका युद्धके लिये प्रस्थान ( उद्योग० १६६ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध ( भीष्मपर्वसे शल्यपर्वतक ) ।
  • पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना ( ऐषीक० १६ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना; धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भङ्ग होना तथा श्रीकृष्णके फटकारनेसे शान्त हुए धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको हृदयसे लगाना ( स्त्री० अध्याय १२ से १३ तक ) ।
  • पाण्डवोंको शाप देनेके लिये उद्यत हुई गान्धारीको व्यासजीका समझाना ( स्त्री० १४ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका गान्धारीकी आज्ञा लेकर अपनी मातासे मिलना ( स्त्री० १५ । ३२—३५ ) ।
  • व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे पाण्डवोंका नगरमें प्रवेश तथा प्रजावासियोंद्वारा इनका सत्कार ( शान्ति० अध्याय ४० से ४६ तक ) ।
  • पाण्डवोंके रहनेके लिये विभिन्न भवनोंका विभाजन ( शान्ति० ४४ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका भीष्मजीका उपदेश सुनना ( शान्ति० अध्याय ५६ से अनु० १६५ अध्यायतक ) ।
  • पाण्डवोंका भीष्मजीको जलाञ्जलि देना ( अनु० १६८ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका हिमालयसे धन लेकर आना ( आश्व० अध्याय ६३ से ६५ तक ) ।
  • पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन; श्रीकृष्ण आदि द्वारा इनका स्वागत तथा इनका नगरमें आकर सबसे मिलना ( आश्व० अध्याय ७० से ७१ तक ) ।
  • पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव ( आश्रम० अध्याय १ से २ तक ) ।
  • गान्धारी और धृतराष्ट्रके साथ वनको जाती हुई कुन्तीसे घरको लौटनेके लिये पाण्डवोंका अनुरोध और कुन्तीद्वारा उनके अनुरोधका उत्तर ( आश्रम० अध्याय १ से १० तक ) ।
  • धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, इनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना तथा कुन्ती, गान्धारी एवं धृतराष्ट्रके दर्शन करना ( आश्रम० अध्याय २१ से २४ तक ) ।
  • संजयका ऋषियोंसे पाण्डवोंका परिचय देना ( आश्रम० २९ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान ( महाप्र० १ अध्याय ) ।
  • मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरका प्रत्येकके गिरनेका कारण बताना ( महाप्र० २ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका स्वर्गमें पहुँचकर धर्म आदि अपने मूल स्वरूपमें मिलना ( स्वर्गारो० ४ । २—१३; स्वर्गारो० ५ । २२ ) ।

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