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पाण्ड्य

  • इनके पुत्रका नाम मलयध्वज था । मलयध्वज अस्त्रविद्यामें पारंगत होकर अपने पिताके वधका बदला लेनेके लिये द्वारकापुरीको विध्वंस करना चाहते थे; परंतु इनके सुहृदों ने इन्हें ऐसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया। तबसे वैर छोड़कर ये अपने राज्यका शासन करते थे। महाभारतकालमें ये ही पाण्ड्यदेशके शासक थे ( द्रोण० २३ । ७०-७२ ) ।
  • ये द्रौपदीके स्वयंवरमें गये थे ( आदि० १८६ । १६ ) ।
  • ये युधिष्ठिरकी सभामें बैठा करते थे ( सभा० ४ । २४ ) ।
  • इन्होंने राजसूय यज्ञमें भेंट अर्पण की थी ( सभा० ५२ । ३५ ) ।
  • ये अपनी सेनाके साथ युधिष्ठिरकी सेवामें आये थे ( उद्योग० १६ । ९ ) ।
  • इनके रथपर नागके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती थी । बलवान् राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टङ्कार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित चन्द्रकिरणके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया था ( द्रोण० २३ । ७२-७३ ) ।
  • इनका वृषसेनके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । ५७ ) ।
  • इनका महान् पराक्रम और अश्वत्थामाद्वारा वध ( कर्ण० २० । ४६ ) ।

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