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पार्वती

  • पर्वतराज हिमवान्की पुत्री तथा भगवान् शिवकी धर्मपत्नी ( आदि० १८ । ५ ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें भी विराजमान होती हैं ( सभा० ११ । ४१ ) ।
  • द्रौपदी-द्वारा अर्जुनकी रक्षाके लिये देवी उमाका कीर्तन एवं स्तवन ( वन० २० । ३३ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इनके दुर्गा-रूपका स्तवन और इनका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें अनुगृहीत करना ( विराट० ६ अध्याय ) ।
  • अर्जुनद्वारा इनके दुर्गा-रूपका स्मरण और इनका प्रत्यक्ष दर्शन देना ( भीष्म० २३ । ४-१६ ) ।
  • एक समय ये भगवान् शङ्करको, जो पाँच शिखावाले बालकके रूपमें प्रकट हुए थे, गोदमें लेकर आयीं और देवताओंसे बोलीं, 'पहचानो यह कौन है?' ( द्रोण० २०२ । ८४ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको पार्थद-प्रदान ( शल्य० ४५ । ५१-५२ ) ।
  • दक्षयज्ञके विषयमें शिवजीके साथ इनका वार्तालाप ( शान्ति० २८३ । २२-२९ ) ।
  • दक्षयज्ञमें शिवजीका भाग न देखकर इनकी चिन्ता ( शान्ति० २८४ । २३ ) ।
  • उशनापर कुपित हुए शिव- जीको शान्त करना ( शान्ति० २८१ । ३५ ) ।
  • श्रीकृष्णको आठ वर देना ( अनु० १५३ । ७—८ ) ।
  • देवताओंको संतानहीन होनेका शाप देना ( अनु० ८४ । ७४-७५ ) ।
  • परिहामवश शिवजीकी दोनों आँखें हाथोंसे बंद करना ( अनु० १४० । २६ ) ।
  • शङ्करजीके साथ संवाद ( अनु० १४० । ४० से १४५ अध्यायतक ) ।
  • गङ्गा आदि नदियोंसे स्त्री-धर्मके विषयमें सलाह लेना ( अनु० १४६ । २२—२६ ) ।
  • इनके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन ( अनु० १४६ । ३३—५६ ) ।
  • ये मुञ्जवान् पर्वतपर भगवान् शिवके साथ रहती हैं ( आश्र० ८ । १-३ ) ।

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