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पुष्कर

  • (१) क्षेत्र । तीर्थगुरु ( आदि० २२० । १४ ) ।
  • ( यह तीर्थ अजमेरसे छः कोसकी दूरीपर उत्तर दिशामें है । इसके सम्बन्धमें पुराणोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि ब्रह्माजीने इस स्थानपर यज्ञ किया था । यहाँ ब्रह्माजीका एक मन्दिर है । पद्म और नारदपुराणमें इस तीर्थका बहुत कुछ माहात्म्य मिलता है । पद्मपुराणमें लिखा है कि एक बार पितामह ब्रह्मा हाथमें कमल लिये वर करनेकी इच्छासे इस सुन्दर पर्वतप्रदेशमें आये और यहाँ कमल उनके हाथसे गिर पड़ा । उसके गिरनेसे ऐसा शब्द हुआ कि सब देवता काँप उठे । जब देवता ब्रह्मासे पूछने लगे—'तब ब्रह्मा ने कहा—'बालकोंका घातक वज्रनाभ असुर रसातलमें तप करता था । वह तुमलोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आता ही चाहता था कि मैंने कमल गिराकर उसे मार डाला । तुमलोगोंकी बड़ी भारी विपत्ति दूर हुई । इस पद्मके गिरनेके कारण इस स्थानका नाम पुष्कर होगा । यह परम पुण्यप्रद महातीर्थ होगा ।' साँचीसे मिले हुए एक शिलालेखसे यह पता लगता है कि ईसासे तीन सौ वर्षसे भी और पहले यह तीर्थस्थान प्रसिद्ध था—( हिंदी शब्दसागरसे ) ।
  • ( यहाँ ब्रह्मा, सावित्री, बदरीनारायण और वराहजीके मन्दिर प्रसिद्ध हैं । ) अर्जुनने अपने वनवासका शेष समय यहीं व्यतीत किया था ( आदि० २२० । १७ ) ।
  • पुलस्त्यजीद्वारा इसका विशेष वर्णन ( वन० ८२ । २०—४० ) ।
  • धौम्यद्वारा इसके माहात्म्यका वर्णन ( वन० ८९ । १६—१८ ) ।
  • पुष्करमें जाकर मृत्युने घोर तप किया था ( द्रोण० ५४ । २६ ) ।
  • यहाँ ब्रह्माजीका यज्ञ हुआ था, जिसमें सरस्वती सुप्रभा नामसे प्रकट हुई थी ( शल्य० ३८ । ५—१४ ) ।
  • पुष्करमें जाकर दान देना, भोगोंका त्याग करना, शान्तभावसे रहना, तपस्या और तीर्थके जलसे तन-मनको पवित्र करना चाहिये ( शान्ति० २९७ । ३७ ) ।
  • यहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विमानपर बैठकर स्वर्गलोकमें जाता है और अप्सराएँ स्तुति करती हुई जगाती हैं ( अनु० २५ । ९ ) ।
  • ( २ ) कमलके समान दर्शनीय । सोमकी पुत्रीने इनका पतिरूपसे वरण किया है ( उद्योग० १८ । १२ ) ।
  • ( ३ ) ये राजा नलके छोटे भाई थे ( वन० ५२ । ५६ ) ।
  • इन्हें कलियुगका राजा नलके साथ जुआ खेलनेके लिये आदेश देना ( वन० ५१ । ४ ) ।
  • इनका राजा नलके साथ जुआ खेलना ( वन० ५१ । ९ ) ।
  • पुष्कर ने राजा नलका सर्वस्व जीत लिया था ( वन० ६१ । १ ) ।
  • इनका राजा नलके साथ पुनः जुआ खेलना और सर्वस्व हारना ( वन० ७८ । ४—२० ) ।
  • नलसे क्षमा माँगकर इनका अपनी राजधानीको लौट जाना ( वन० ७८ । २७— (४) एक द्वीप, इसका विशेषरूपसे वर्णन ( भीष्म० १२ । २४—३० ) ।
  • (५) पुष्करद्वीपका एक पर्वत, जो मणियों तथा रत्नोंसे भरा-पूरा है ( भीष्म० १२ । २४—२५ ) ।

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