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प्रतिविन्ध्य

  • (१) ययातिके दौहित्र ( आदि० ९३ । १३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ २८२ ) ।
  • ययाति-पुत्री माधवीके गर्भसे काशिराज दिवोदासके द्वारा इनका जन्म हुआ था ( उद्योग० ११० । १८ । अनु० ३० । ३० ) ।
  • स्वर्गसे गिरते हुए राजा ययातिकी इनसे भेंट ( आदि० ८६ । ५-६ ) ।
  • इनका ययातिके साथ वार्तालाप ( आदि० ९२ । १४—१६ दा० पाठसहित ) ।
  • इनके द्वारा ययातिको पुण्यदानका आश्वासन ( आदि० ९२ । १६ ) ।
  • अप्सरा आदि राजाओंके साथ इनका स्वर्गलोकको जाना ( आदि० ९३ । १६ के बाद दा० पाठ ) ।
  • देवर्षि नारदद्वारा भविष्यमें इनके स्वर्गसे गिरनेके कारणका वर्णन ( वन० १८५ । ५ ) ।
  • इनका ययातिको अपना पुण्यफल देना ( उद्योग० १२३ । १० ) ।
  • पराजित राजाका सारा धन ले जाना ( शान्ति० ९६ । २० ) ।
  • महाराज शिबिद्वारा इन्हें खड्गकी प्राप्ति ( शान्ति० १६६ । ८० ) ।
  • इनके द्वारा ब्राह्मणको नेत्र-दान ( शान्ति० २३४ । २० ) ।
  • इनके द्वारा वीतहव्य-पुत्रोंका वध ( अनु० ३० । ४२-४३ ) ।
  • वीतहव्यको छोड़ देनेके लिये इनकी भृगुजीसे प्रार्थना ( अनु० ३० । ५०-५२ ) ।
  • भृगुजीके वचनोंसे संतुष्ट होकर इनका नगरको लौटना ( अनु० ३० । ५४-५६ ) ।
  • इनका अपने पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें समर्पित करके इस लोकमें अनुपम कीर्ति पाना और परलोकमें अक्षय आनन्द भोगना ( अनु० १३० । ५ ) ।
  • (१) द्रौपदीके गर्भसे युधिष्ठिरद्वारा उत्पन्न ( आदि० १२२ । १२२-१२३; आदि० १५५ । ७५ ) ।
  • इनकी जन्म विच्छेदकके अंशसे हुआ था ( आदि० ६७ । १२७-१२८ ) ।
  • इनके नामकी निरुक्ति ( आदि० २२० । ७९-८१ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें शकुनिके साथ इनका द्वन्द्व युद्ध ( भीष्म० ४५ । ६३-६५ ) ।
  • अलम्बुषके साथ इनका युद्ध और उससे पराजित होना ( भीष्म० १०० । २९-३५ ) ।
  • इनके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । २० ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० २५ । २९-३१ ) ।
  • दुःशासनके साथ इनका युद्ध और पराजित होना ( द्रोण० १६८ । ३४—४३ ) ।
  • राजा चित्रके साथ युद्ध और इनके द्वारा उसका वध ( कर्ण० १४ । २०—३३ ) ।
  • रात्रिमें अश्वत्थामाके साथ युद्ध और उसके द्वारा मारा जाना ( सौप्तिक० ८ । ४८—५४ ) ।
  • ( महाभारतमें इनके लिये यौधिष्ठिर और यौधिष्ठिर शब्द का भी प्रयोग हुआ है । ) ( २ ) एक प्रसिद्ध राजा जो एकचक्र नामक दैत्यके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । २१—२२ ) ।
  • दिग्विजयके समय अर्जुनने इन्हें परास्त किया था ( सभा० २६ । ५ ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इन्हें रण-निमन्त्रण भेजनेका विचार किया गया था ( उद्योग० ४ । १३ ) ।
  • ये यमराजकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । २४ ) ।

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