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प्रयाग

  • महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयाग-तीर्थमें ब्रह्मा आदि देवता; दिशा, दिक्पाल, लोक-पाल, साध्य, लोकसम्मानित पितर, सनत्कुमार आदि महर्षि; अङ्गिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि; नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्माजीसहित भगवान् विष्णु निवास करते हैं । वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं, जिनके बीचसे गङ्गा बहती है । यहीं यमुना गङ्गाके साथ
  • मिली है । गङ्गा-यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका जघन माना गया है । प्रयाग जन्मस्थानीय उपस्थ है । प्रतिष्ठानपुर ( झूँसी ), प्रयाग, कम्बुल और अक्षत नाम तथा भोगवती तीर्थ ब्रह्माजीकी वेदी है । उस तीर्थमें वेद और यज्ञ मूर्त्तिमान् होकर रहते हैं तथा प्रजापतिकी उपासना करते हैं । तथापि ऋषि, देवता तथा चक्रवर्ती सम्राट् वहाँ यथोचित भगवान्का यजन करते हैं । इसीलिये तीनों लोकोंमें प्रयागको सब तीर्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ एवं पुण्यतम बताया गया है । इस तीर्थमें जाने अथवा इसका नाम लेनेमात्रसे भी मनुष्य मृत्युकालके भय और पापसे मुक्त हो जाता है ( वन० ८५ । ६९-८० ) ।
  • प्रयागके विश्वविख्यात त्रिवेणी-सङ्गममें स्नान करनेसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंकी प्राप्ति होती है । यह देवताओंद्वारा सेवित हुई यज्ञभूमि है । यहाँ दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान महान् होता है । प्रयागमें ही साठ करोड़ दस हजार तीर्थोंका निवास है । चारों विद्याओंके ज्ञानसे तथा सत्यभाषणसे जो पुण्य होता है, वह सब गङ्गा-यमुनाके सङ्गममें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है । यहाँ वासुकिंका भोगवती नामक उत्तम तीर्थ है । जो उसमें स्नान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है । प्रयागमें ही हंसप्रपतन नामक तीर्थ है और वहीं गङ्गाके तटपर दशाश्वमेधिक तीर्थ है । प्रयागमें गङ्गास्नानका महत्त्व सबसे अधिक है ( वन० ८५ । ८१-८८ ) ।
  • गङ्गा-यमुनाका पुण्यमय सङ्गम सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है । बड़े-बड़े महर्षि उसका सेवन करते हैं । यहाँ पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीने यज्ञ किया था । उनके उस प्रकृष्ट यज्ञसे ही इस स्थानका नाम प्रयाग हो गया ( वन० ८७ । १८-१९ ) ।
  • पाण्डवोंमेंसे देवताओकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गङ्गा-यमुनाके सङ्गममें स्नान किया और कुछ दिनोंतक वे वहीं उत्तम तपस्यामें लगे रहे ( वन० ९५ । ४-५ ) ।
  • प्रयाग-राजमें माघमासकी अमावस्याको तीन करोड़ दस हजार तीर्थोंका समागम होता है ( अनु० २५ । ३५-३६ ) ।

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