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अर्जुन –

  • (१) ये नरस्वरूप हैं ( आदि० ११२ । १ )।
  • इनको धर्ममय विशाल वृक्षका तना कहा गया है ( आदि० १३२ । १० )।
  • ये पाण्डुके क्षेत्रज पुत्र हैं । इन्द्रके द्वारा कुन्तीके गर्भसे इनकी उत्पत्ति हुई है ( आदि० १२३ । ११६ )।
  • ये इन्द्रके अंशसे प्रकट हुए हैं ( आदि० ६० । ७)।
  • फाल्गुन मास तथा दोनों फाल्गुनीके संधिकालमें इनकी उत्पत्ति हुई है, इसीसे इनका नाम ‘फाल्गुन’ हुआ ( आदि० १२३ । ३५ के बाद दक्षिणात्य पाठ )।
  • आकाशवाणीद्वारा इनकी जन्मकालमें प्रशंसा ( आदि० १२२ । ३८-४६ )।
  • इनके जन्मोत्सवपर समस्त देवताओं, गन्धर्वो, आदित्यों, रुद्रों, वसुओ, नागों तथा ऋषिपियोंका शुभागमन और अप्सराओंद्वारा नृत्य-गान ( आदि० १२२ । ५०-७४ )।
  • शतशृङ्गनिवासी ऋषिपियोंद्वारा इनका नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । २० )।
  • वसुदेवके पुरोहित काश्यपके द्वारा इनके उपनयनादि-संस्कार । राजर्षि शुकसे इनके द्वारा धनुर्वेदका अध्ययन ( आदि० १२३ । ३१ के बाद दक्षिणात्य पाठ )।
  • इनके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे श्रुतकीर्तिका जन्म ( आदि० ७५ । ७५ )।
  • सुभद्राके गर्भसे अभिमन्युकी उत्पत्ति ( आदि० ७५ । ७८ )।
  • कृपाचार्यने इन (पाण्डवों) का अध्ययन ( आदि० १२९ । २३) अर्जुन आदिका द्रोणाचार्यकी शिष्यतामें अध्ययन ( आदि० १३१ । ४ )।
  • अर्जुनद्वारा गुरुके अभीष्ट कार्यको सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा ( आदि० १३१ । ७)।
  • आचार्यका अर्जुनको हृदयसे लगाकर उनके प्रति हार्दिक स्नेह प्रकट करना । इनकी अध्ययननिष्ठा तथा सर्वाधिक योग्यता ( आदि० १३१ । १२-१३ )।
  • इनसे कर्णकी स्पर्द्धा । ‘ये अर्जुन अनुपम प्रतिभाशाली हैं'-ऐसी द्रोणाचार्यकी धारणा ( आदि० १३१ । १५)।
  • ये अपनी गुरुभक्ति तथा अस्त्रोंके अभ्यासकी ध्यानके कारण गुरुके विशेष प्रिय हुए ( आदि० १३१ । १० )।
  • इनके द्वारा रात्रिमें धनुर्विद्याका अभ्यास ( आदि० १३१ । २५)।
  • इनको अद्वितीय धनुर्धर बनानेके लिये द्रोणाचार्यका आश्वासन ( आदि० १३१ । २७)।
  • एकलव्यकी धनुर्विद्यासे इनकी चिन्ता और द्रोणसे इनका उलहना ( आदि० १३१ । ४८-४९ )।
  • समस्त युद्ध-विद्याओमें इनकी कुशलता ( आदि० १३१ । ६३ )।
  • ये सर्वश्रेष्ठ अस्त्रभ्यासी और गुरुभक्त थे ( आदि० १३१ । ६४ )।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इनकी लक्ष्यवेधके विषयमें परीक्षा तथा इनके द्वारा पक्षीके मस्तकका छेदन ( आदि० १३२ । १-५ )।
  • द्रोणाचार्यपर आक्रमण करनेवाले ग्राहका इनके द्वारा वध ( आदि० १३२ । १० )।
  • द्रोणाचार्यद्वारा प्रसन्न होकर इनको ‘ब्रह्मशिर’ नामक अस्त्रका दान ( आदि० १३२ । १८)।
  • रङ्गभूमिमें इनके अद्भुत अस्त्रकौशल (आदि० १३४।१८-२५)।
  • रङ्गभूमिमें कर्णको इनकी फटकार (आदि० १३५।१८)।
  • कर्णसे लड़नेके लिये रणभूमिमें इनका उद्यत होना (आदि० १३५।२१)।
  • इनके द्वारा मन्त्रीसहित द्रुपदकी पराजय और उन्हें बंदी बनाकर द्रोणाचार्यको सौंपना (आदि० १३०।६३)।
  • इनका द्रुपदकी ‘अहिच्छत्रा’ नगरीको जीतकर उसे द्रोणाचार्यको गुरुदक्षिणाके रूपमें देना (आदि० १३०। ७७)।
  • ‘ब्रह्मशिर’ नामक अस्त्रकी परम्परा तथा उसके उपयोगका नियम बतलाकर द्रोणाचार्यका अर्जुनको विरोधी होनेपर अपने साथ भी लड़नेके लिये वचनबद्ध करना (आदि० १३८।१९-१५)।
  • इनके द्वारा पराक्रमका धृतराष्ट्रद्वारा चिन्तन (आदि० १३८।२०-२३)।
  • हिडिम्बके साथ युद्ध होते समय भीमसेनकी सहायताके लिये इनका उद्यत होना (आदि० १५२।१८-१९)।
  • द्रौपदीको इन्हें समर्पित करनेके लिये द्रुपदका संकल्प तथा लाक्षागृहमें इनकी मृत्यु होनेका समाचार सुनकर द्रुपदका शोक (आदि० १६६।५६ के बाद दक्षिणात्य पाठ, )।
  • चित्ररथ गन्धर्वको इनकी फटकार और इनके द्वारा गङ्गा आदि नदियोंकी महिमा (आदि० १६६।१९६-२४)।
  • युद्धमें इनके द्वारा चित्ररथपर आग्रेयास्त्र- का प्रहार और उसकी मूर्छा (आदि० १६९। ३१-३३)।
  • चित्ररथको इनका ज्ञानदान (आदि० १६९।३७)।
  • चित्ररथके साथ इनकी मित्रता (आदि० १६९।३८-५८)।
  • चित्ररथसे इन्हें ‘चाक्षुषी’ विद्या एवं दिव्य अस्त्रोंकी प्राप्ति (आदि० १६९। ४३-४६)।
  • इनपर चित्ररथके आक्रमणका कारण (आदि० १६९।५०)।
  • चित्ररथपर इनकी विजयका कारण (आदि० १६९।७१)।
  • किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण पुरोहितरूपमें वरण करनेके लिये इनको चित्ररथकी सलाह (आदि० १६९।७४)।
  • चित्ररथ को इनके द्वारा आग्नेयास्त्रका दान (आदि० १८२। ३)।
  • पाञ्चाल-यात्राके समय मार्गमें अर्जुन आदि पाण्डवोंसे व्यासजीकी भेंट (आदि० १८४।२)।
  • द्रुपदनगरमें अर्जुन आदि पाण्डवोंका मातासहित एक कुम्भकारके घरमें ठहरना (आदि० १८४।४)।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें इन्हें लक्ष्यवेधके लिये उद्यत देखकर इनके सम्बन्धमें ब्राह्मणोंके ऊहापोह (आदि० १८७।१२-१६) स्वयंवरमें इनका लक्ष्यवेध और द्रौपदीका इनके गलेमें जयमाला डालना (आदि० १८७।२६-२७ के बाद दक्षिणात्य पाठ)।
  • स्वयंवरमें आये हुए राजाओंके साथ ब्राह्मणवेषमें युद्ध करते समय श्रीकृष्णद्वारा बलरामजीको इनका परिचय देना (आदि० १८८।२०)।
  • स्वयंवरमें कर्णसे इनका युद्ध और इनके द्वारा उसकी पराजय चित्ररथको (आदि० १८९।१०-२२)।
  • द्रौपदीके विषयमें इनकी युधिष्ठिरसे बातचीत (आदि० १९० । ८-१०)।
  • द्रौपदीके साथ इन (पाण्डवों) का विधिपूर्वक विवाह (आदि० १९०। १३)।
  • ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये इनका आयुधागारमें प्रवेश और वनवास (आदि० २१२। १९-३५)।
  • हरिद्वारमें उलूपीद्वारा इनका नाग- लोकमें आकर्षण (आदि० २१३।१९३)।
  • इनके द्वारा उलूपीके गर्भसे ‘इरावान्’ का जन्म (आदि० २१३।३६ के बाद दक्षिणात्य पाठ)।
  • इनका मणिपुर जाकर चित्राङ्गदासे विवाह (आदि० २१४। १५-२६)।
  • इनके द्वारा चित्राङ्गदाके गर्भसे बभ्रुवाहनका जन्म (आदि० २१४।२०)।
  • इनका दक्षिणके तीर्थोंमें जाना और वर्गो आदि अप्सराओंका ग्राह-योनिसे उद्धार करना (आदि० २१५ एवं २१६ अध्यायोंमें)।
  • पुनः मणिपुरमें आकर इनके द्वारा चित्राङ्गदाको आश्वासन और राजसूय-यज्ञमें आनेका आदेश (आदि० २१६। ३३-३९)।
  • इनका गोकर्णतीर्थकी ओर जाना (आदि० २१६। ३४)।
  • प्रभास क्षेत्रमें इनसे श्रीकृष्णकी भेंट (आदि० २१७। ३-४)।
  • रैवतक पर्वतपर इनका रातभर श्रीकृष्णके साथ विश्राम (आदि० २१७। ८)।
  • श्रीकृष्णके साथ इनका द्वारका- गमन (आदि० २१७।१५)।
  • सुभद्राके हरणमें इनके लिये श्रीकृष्णकी सम्मति (आदि० २१८। २२-२३)।
  • सुभद्रासे विवाहके लिये इनको युधिष्ठिरकी सम्मति (आदि० २१८ । २४)।
  • इनके द्वारा सुभद्राका हरण (आदि० २१९ । ७)।
  • इनसे युद्ध करनेके लिये वृष्णिवंशियोंकी तैयारी (आदि० २१९ । १६-१९)।
  • सुभद्रासे इनका विधिपूर्वक विवाह (आदि० २२०। १३)।
  • पुष्करतीर्थमें इनके द्वारा वनवासके शेष समयका यापन (आदि० २२० । १४)।
  • सुभद्राको गोपिवेज्ञमें सजाकर उसे द्रौपदीके पास इनका भेजना (आदि० २२०। १९)।
  • श्रीकृष्णके साथ इनका यमुनामें जलविहार (आदि० २२१ । १४-२०)।
  • खाण्डववनको जलानेके लिये इनसे ब्राह्मणरूपधारी अग्निकी प्रार्थना (आदि० २२२ । ५-११)।
  • इनका अग्निदेवसे दिव्य धनुष और रथ आदि माँगना (आदि० २२३ । १५-२९)।
  • अग्निका इनको गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस एवं दिव्य रथ देना (आदि० २२४ । ६-१४)।
  • खाण्डव-दाहके समय इन्द्रा आदि देवताओंके साथ इनका भयानक युद्ध (आदि० २२६ अ० में)।
  • इनके द्वारा तक्षक नागकी पत्निका वध (आदि० २२६ । ६-८)।
  • अश्वसेन (नाग) को इनका शाप (आदि० २२६ । ११)।
  • इनसे इन्द्र आदि देवताओंकी पराजय तथा इन्द्रका स्वर्गको लौटना (आदि० २२६ । १३ -२३)।
  • मयासुरको इनका अभयदान ( आदि० २२७।४४ )।
  • इन्द्रद्वारा इन्हें समस्त दिव्यास्त्र प्रदान करनेका आश्वासन ( आदि० २२३।१०-१२ )।
  • अर्जुन और मयासुरकी बातचीत ( सभा० १।२-८ )।
  • मयासुरद्वारा इनको देवदत्त नामक शङ्खौ भेंट ( सभा० ३।२१ )।
  • जरासंधको जीतनेके विषयमें युधिष्ठिरको उत्साह दिलानेके लिये वीरोचित उद्गार ( सभा० १७-१० )।
  • श्रीकृष्ण और भीमसेनके साथ अर्जुनकी मगध-यात्रा ( सभा० २० अ०में )।
  • इनका दिग्विजयके लिये प्रस्थान ( सभा० २५।७ )।
  • इनके द्वारा कुलिनन्द आदि देशोंपर विजय तथा भगदत्तकी पराजय ( सभा० २६ अ०में )।
  • अन्तर्गिरि, उत्कलपुर, मोदापुर आदि देशोंपर इनकी विजय ( सभा० २७ अ०में )।
  • किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तर कुरुपर विजय प्राप्त करके इनका इन्द्रप्रस्थ लौटना ( सभा० २८ अ०में )।
  • राजसूयके बाद अर्जुनका द्रुपदको कुछ दूर पहुॅचाना ( सभा० ४५।४८ )।
  • कर्ण और उसके अनुयायियोंको तथा समस्त विपक्षियोंको मारनेके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७७।२२-३६ )।
  • वनयात्राके समय अर्जुनका बालू उड़ाते हुए जानेका रहस्य ( सभा० ८०।५-१३ )।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन ( वन० १२।११-४३ )।
  • इनके द्वारा द्रौपदीको आश्वासन ( वन० १२।१३३ )।
  • इनको वनमें साथ गये हुए प्रजावर्गको आश्वासन ( वन० २३।१३२-१३४ )।
  • द्वैतवनमें निवास करनेके लिये युधिष्ठिरको इनकी सलाह ( वन० २४।५-११ )।
  • तपके लिये प्रस्थान और इन्द्रकीलपर इनकी इन्द्रसे भेंट, बातचीत तथा इन्हें इन्द्रका वरदान ( वन० ३७।३७-५८ )।
  • इनकी चार मासतक उग्र तपस्या ( वन० ३८।२२-२७ )।
  • इनके द्वारा मूक दानवका वध ( ३९। ७-१६ )।
  • किरात रूपधारी भगवान् शङ्करके साथ इनका युद्ध ( वन० ३९।३३।१-३४ )।
  • इनके द्वारा शिवजीकी स्तुति ( वन० ३९।७४-८२ )।
  • इनकी पाशुपतास्त्रके लिये महादेवजीकी प्रार्थना ( वन० ४०।८ )।
  • इन्हें पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति ( वन० ४०।२१ )।
  • इन्हें यमद्वारा दण्डास्त्रकी प्राप्ति ( वन० ४१।२५-२६ )।
  • वरुणद्वारा पाश-अस्त्रकी प्राप्ति ( वन० ४१।१-२२ )।
  • कुबेरद्वारा अन्तर्धानास्त्रकी प्राप्ति ( वन० ४१।४१ )।
  • इन्द्रका इन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश ( वन० ४१।४३-४४ )।
  • अर्जुनके चिन्तन करनेपर मातलिद्वारा इन्द्रके रथका आनयन और उसपर बैठकर इनका स्वर्गलोकके लिये प्रस्थान ( वन० ४२।१०-३१ )।
  • स्वर्गलोकमें पहुॅचनेपर इनका महान् स्वागत तथा इन्द्रसभामें पहुॅचकर इनका इन्द्रदेवसे मिलना ( वन० ४३।८-१५ )।
  • इन्द्रभवनमें इन्हें अस्त्र और संगीतकी शिक्षा ( वन० ४४। १-११ )।
  • अर्जुनके सारथ्यके लिये इन्द्रका चित्रसेनद्वारा उर्वशीको भेज्ना एवं आदेश ( वन० ४५ अ०में )।
  • उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और अपने आनेका कारण बताना ( वन० ४६।२२-३५ )।
  • अर्जुनका उर्वशीका प्रस्ताव सुनकर दोनों हाथोंसे आँख बंद कर लेना और इसकी ओर देखनेका कारण बताते हुए उसे 'पूरुवंशकी जननी' कहना, साथ ही उसे अपने लिये कुन्ती, माद्री और शचीका स्थान देना ( वन० ४६। ३६-४० )।
  • उसके अस्वीकार करनेपर उर्वशीका इन्हें शाप देकर लौट आना ( वन० ४६ अ०में )।
  • अर्जुनको इन्द्रका आश्वासन ( वन० ४६ । ५५-५९ )।
  • इनकी युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये महर्षि लोमशसे प्रार्थना ( वन० ४७ । ३२-३३ )।
  • इन्द्रलोकसे लौटकर इनका गन्धमादन पर्वतपर भाइयोंसे मिलना ( वन० ५१। ५४ )।
  • इनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्रा और पाशुपतास्त्रकी प्राप्तिका वर्णन ( वन० १६७ अ०में )।
  • इनका इन्द्र-लोकमें प्राप्त हुई अस्त्रशिक्षा आदिका वृत्तान्त बताना ( वन० १६८ अ०में )।
  • निवातकवचके साथ अपने युद्धका वर्णन ( वन० १६९ अ०से १७२ अ० तक )।
  • अपने द्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोमों और कालकेयोंके वधका वृत्तान्त बताना ( वन० १७३ अ०में )।
  • इनका भाइयोंको दिव्यास्त्रोंका प्रयोग दिखानेके लिये उद्यत होना ( वन० १७५।७ )।
  • गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा ( वन० २४३।२१ )।
  • अर्जुनका गन्धर्वोसे दुर्योधनको छोड़नेके लिये कहना और न छोड़नेपर उनके ऊपर बाण बरसाना ( वन० २४४।१२-२९ )।
  • इनके द्वारा चित्रसेन गन्धर्वकी पराजय ( वन० २४५।१-२६ )।
  • जयद्रथके अनुगामी पाँच सौ पर्वतीय महर्षियोंका संहार ( वन० २७१।८ )।
  • सौवीरदेशके बारह राजकुमारोंका वध ( वन० २७१।२० )।
  • शिबि, इक्ष्वाकु, त्रिगर्त और सिन्धुदेशके क्षत्रियोंका विनाश ( वन० २७१। २८ )।
  • द्वैतवनमें पानी लानेके लिये जाना और सरोवरपर मूर्छित होना ( वन० २९२।२२-३२ )।
  • अर्जुनका युधिष्ठिरको अज्ञातवासके लिये कुछ उपयोगी गव्योके नाम बताना ( विराट० ७।१२-१३ )।
  • विराटनगरमें 'बृहन्नला' नामसे रहनेकी बात बताना ( विराट० ८।२५- २७ )।
  • नपुंसक वेषमें राजा विराटके पास जाना और उनसे अपने यहाँ रखनेके लिये प्रार्थना करना ( विराट० ११।२-९ )।
  • बृहन्नलारूपमें इनका द्रौपदीसे अपना मनोगत दुःख प्रकट करना ( विराट० २३।२३-२५ )।
  • अपने आप ( बृहन्नला ) को सारथि बनानेके लिये द्रौपदीद्वारा इनका उत्तरको कहलाना ( विराट० २६।१०-१३ )।
  • उत्तरका सारथि बनकर युद्धके लिये प्रस्थान (विराट० ३०।२७)।
  • भयभीत होकर भागते हुए उत्तरको दौड़कर पकड़ना (विराट० ३८ । ४०)।
  • उत्तरको समझा-बुझाकर अपना सारथि बनाकर रथपर चढ़ाना (विराट० ३८ । ४६-५१)।
  • शम्वीवृक्षसे अस्त्र उतारने- के लिये उत्तरको आदेश देना (विराट० ४० । ३)।
  • उत्तरको पाण्डवोंके दिव्यायुधोंका परिचय देना (विराट० ४३ अ०में)।
  • उत्तरकुमारसे अपने भाइयोंका परिचय देना तथा अपने दस नामोंकी पृथक्-पृथक् व्याख्या करना (विराट० ४४ । १३-२२)।
  • उत्तरसे अपनी नपुंसकताका कारण बताना (विराट० ४४ । १३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ १४ तक)।
  • अपने अश्वोंका स्मरण करना और आनेपर उनसे वार्तालाप (विराट० ४५ । २७-२८)।
  • इनका शङ्ख बजाना और डरे हुए उत्तरको धीरज देना (विराट० ४६ । ८-२३)।
  • बाणोंद्वारा आचार्य द्रोण- को प्रणाम करना और युद्धकी आज्ञा माँगना (विराट० ५३ । ७)।
  • कौरवसेनापर आक्रमण करके विराटकी गौओंको लौटा लेना (विराट० ५३ । २४-२५)।
  • कर्णपर आक्रमण (विराट० ५४ । ४-५)।
  • इनके द्वारा विकर्णकी पराजय (विराट० ५४ । ९-१०)।
  • राजा शत्रुञ्जयका वध (विराट० ५४ । ११-१३)।
  • कर्णके भाई सङ्ग्रामजित्‌का वध (विराट० ५४ । १८)।
  • कर्णकी पराजय (विराट० ५५ । १३)।
  • कौरवसेनाका संहार करके उसे खदेड़ देना (विराट० ५५ । ३६-३८)।
  • उत्तरको कौरववीरोंका परिचय देकर कृपाचार्यके पास जाना (विराट० ५५ । ४१-४०)।
  • कृपाचार्यको रथ- हीन और घायल करना (विराट० ५७ । ३६-३८)।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और उन्हें घायल करना (विराट० ५८ अ०में)।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध और उनके बाणोंको समाप्त कर देना (विराट० ५९ । १-१५)।
  • कर्णके साथ पुनः युद्ध और उसे घायल करके खदेड़ना (विराट० ६० अ०में)।
  • उत्तरके हतोत्साह होनेपर उसे आश्वासन देकर भीष्मके पास जाना और उनका ध्वज काट गिराना (विराट० ६१ । १३-३५)।
  • दुःशासन- को घायल करना (विराट० ६१ । ४०)।
  • विकर्णको रथसे नीचे गिराना (विराट० ६१ । ४२)।
  • दुःसह और विविंशतिको घायल करना (विराट० ६१ । ४५)।
  • रणभूमिमें रक्तकी नदी प्रकट कर देना (विराट० ६२ । १७-२१)।
  • समस्त कौरव महारथियोंको पराजित करना (विराट० ६३ । १३-१४)।
  • भीष्मके साथ अद्भुत युद्ध और उन्हें घायल करके युद्धसे विमुख करना (विराट० ६४ अ० में)।
  • पुनः उनके द्वारा विकर्णकी पराजय (विराट० ६५ । १०)।
  • दुर्योधनकी पराजय (विराट० ६५ । १३)।
  • सम्मोहनास्त्रके द्वारा इनका सभी कौरव महारथियोंको मोहित कर देना (विराट० ६६ । ८-११)।
  • युद्ध बंद होनेपर इनके द्वारा भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषोंका अभिवादन एवं सम्मान (विराट० ६६ । २५-२६)।
  • दुर्योधनके मुकुटका खण्डन (विराट० ६६ । २७)।
  • उत्तरसे अपना रहस्य न खोलनेके लिये कहना (विराट० ६७ । १-१०)।
  • उत्तरको कौरव महारथियोंके वस्त्र देना (विराट० ६९ । १६)।
  • विराटको युधिष्ठिरका परिचय देना (विराट० ७० । १-२८)।
  • अन्य चारों पाण्डवों और द्रौपदीका परिचय देना (विराट० ७१ । ३-१०)।
  • उत्तरद्वारा अर्जुनके पराक्रमका वर्णन (विराट० ७१ । १९-२९)।
  • उत्तरको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना (विराट० ७२ । ७)।
  • युद्ध न करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको ही सहायककरूपमें स्वीकार करना (उद्योग० ७ । २९)।
  • हस्तिनापुरको लौटते हुए संजयसे कौरवोंको संदेश देना (उद्योग० ३२ अध्यायके आदिमें दाक्षिणात्य पाठ)।
  • संजय- द्वारा इनकी वीरताका वर्णन (उद्योग० ५० । २६-२८)।
  • कौरवोंसे संधिमें विषयमें श्रीकृष्णके समक्ष अपने विचार प्रकट करना (उद्योग० ७८ अ० में)।
  • आधा राज्य लेकर ही संधि स्वीकार करनेके लिये श्रीकृष्णसे कहना (उद्योग० ८३ । ५१-५३)।
  • इनके द्वारा धृष्टद्युम्नको प्रधान सेनापति बनानेका प्रस्ताव (उद्योग० १५१ । १९-२५)।
  • युद्धके लिये कही श्रीकृष्णकी बातोंका समर्थन (उद्योग० १५४ । २५-२६)।
  • अपने पराक्रमका वर्णन करके रुक्मीकी सहायताको अस्वीकार करना (उद्योग० १५८ । २७-३५)।
  • उद्धवसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर (उद्योग० १६२ । ३०-४४)।
  • उद्धवसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर (उद्योग० १६३ । ३-२३)।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर त्रिलोकीको पलक मारते नष्ट करनेकी अपनी शक्ति बताना (उद्योग० १९४ । १०-११)।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञासे इनके द्वारा अपनी सेनाका वज्रव्यूह- निर्माण (भीष्म० १९ । ७)।
  • 'श्रीकृष्णकी कृपासे विजय होती है’ ऐसा कहकर युधिष्ठिरको आश्वासन (भीष्म० २० । ७-१०)।
  • इनके द्वारा दुर्गादेविका स्तवन और वरप्राप्ति (भीष्म० २३ । १४-१९)।
  • इनका श्रीकृष्णसे दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेके लिये कहना (भीष्म० २५ । २१)।
  • स्वजनोंको देखकर मोहग्रस्त हो युद्धसे खेद, धर्म-नाशका भय और दोष प्रकट करते हुए धनुष त्यागकर बैठ जाना (भीष्म० २५ । ३६-४७)।
  • किंकर्तव्यविमूढ़ होकर श्रीकृष्णसे अपने कर्तव्यके विषयमें शिक्षा देनेके लिये प्रार्थना करते हुए युद्ध न करनेका निश्चय करके बैठ जाना ( भीष्म० २६।१-९ )।
  • अर्जुनका भगवान्से गीताके उपदेश सुनना ( भीष्म० २६।११ से ४२ अ० तक )।
  • अर्जुनका भगवान्से स्थितप्रज्ञ पुरुषके लक्षण पूछना ( भीष्म० २६।५४ )।
  • ज्ञान और कर्मकी श्रेष्ठताके विषयमें अर्जुनकी शङ्का ( भीष्म० २७।१-२ )।
  • बलात्कारसे पाप करानेमें हेतु क्या है, इस विषयमें इनका प्रश्न ( भीष्म० २७।३६ )।
  • भगवान् श्रीकृष्णका जन्म आधुनिक मानकर अर्जुनका सन्देह करना ( भीष्म० २८।४४ )।
  • संन्यास और निष्काम कर्मयोगकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न ( भीष्म० २९।१ )।
  • योगभ्रष्ट पुरुषकी गति के सम्बन्धमें अर्जुनका प्रश्न और संशय-निवारणके लिये भगवान्से प्रार्थना ( भीष्म० ३०।३७-३९ )।
  • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें इनके सात प्रश्न ( भीष्म० ३२।१-२ )।
  • अर्जुनद्वारा भगवान्की स्तुति और उनके प्रभावका वर्णन करते हुए उनकी विभूतियोंको जाननेकी इच्छा प्रकट करना तथा भगवच्चिन्तनके विषयमें सात प्रश्न करके योगशक्ति और विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करना ( भीष्म० ३४। १२-१८ )।
  • अपने मोहकी निवृत्ति मानते हुए अर्जुन- द्वारा भगवद्वचनोंकी प्रशंसा एवं विश्वरूप देखनेकी इच्छा प्रकट करके उस रूपका दर्शन करानेके लिये भगवान्से प्रार्थना ( भीष्म०३५। १-४ )।
  • अर्जुनका भगवान्के विश्वरूपका दर्शन और स्तुति करना ( भीष्म० ३५।१०-३१ )।
  • भयभीत अर्जुनद्वारा भगवान्की स्तुति और चतुर्भुजरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना ( ३५।३४-४६ )।
  • साकार-निराकारके उपासकोंमें कौन श्रेष्ठ है, यह जाननेके लिये अर्जुनका प्रश्न ( भीष्म० ३६।१ )।
  • गुणातीत पुरुषके विषयों में अर्जुनके तीन प्रश्न ( भीष्म० ३८।२१ )।
  • शास्त्रविधिको त्यागकर श्रद्धासे पूजन करने- वाले पुरुषोंकी निष्ठाके विषय में इनका प्रश्न ( भीष्म० ३९। १ )।
  • संन्यास और त्यागका तत्त्व जाननेके लिये अर्जुनका प्रश्न ( भीष्म० ४२।१ )।
  • अर्जुन और श्रीकृष्णके प्रभावका कथन ( भीष्म० ४२।७८ )।
  • कवच उतारकर पैदल ही कौरव- सेनाकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरसे उधर जानेका कारण पूछना ( भीष्म० ४४।१६ )।
  • प्रथम दिनके युद्धमें इनका भीमके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५।८-११ )।
  • भीमके साथ घोर युद्ध ( भीष्म० ४२अ में )।
  • दूसरे दिनके युद्धमें अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए कौरवसेनाको खेदड़ देना ( भीष्म० ५५।१०- १५ )।
  • भीमको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको रोककर उनसे कर्तव्य-पालनके लिये प्रतिज्ञा करना ( भीष्म० ५९।१०१-१०३ )।
  • इनके द्वारा कौरवसेनाकी पराजय और तीसरे दिनके युद्धकी समाप्ति ( भीष्म० ५९।१११-११२ )।
  • भीमके साथ द्वैरथ युद्ध ( भीष्म० ६०।२५-२९ )।
  • भीमके साथ भयङ्कर युद्ध ( भीष्म० ७१अ में )।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध ( भीष्म० ७३।१३-१६ )।
  • इनके द्वारा त्रिगर्त्तराज सुशर्मा- की पराजय और कौरवसेनामें भगदड़ ( भीष्म० ७२।१ )।
  • इनका अद्भुत पराक्रम ( भीष्म० ७५।१-८ )।
  • इनके द्वारा रथसेनाका संहार ( भीष्म० ७९।३५-३८ )।
  • इरावान्के वधसे इनके दुःखपूर्ण उद्गार ( भीष्म० ९६।१-१२ )।
  • दुर्योधनके प्रति भीष्मद्वारा इनके पराक्रमका वर्णन ( भीष्म० ९८।४- १५ )।
  • द्रोणाचार्य और सुशर्माके साथ युद्ध ( भीष्म० १०२। ६-२३ )।
  • इनके द्वारा त्रिगर्त्तोंकी पराजय ( भीष्म० १०४। १८-८ )।
  • श्रीकृष्णने चेतावनी देनेपर भीष्मके साथ युद्ध ( भीष्म० १०६।४२-४४ )।
  • भीष्मको मारनेके लिये उद्यत श्रीकृष्णसे कर्तव्यपालनके लिये प्रतिज्ञा करना ( भीष्म० १०६। ७०-७५ )।
  • भीष्मवधके लिये उद्यत न होना ( भीष्म० १०७। ९१-९५ के बादतक )।
  • श्रीकृष्णके समझानेपर भीष्म- वधके लिये उद्यत होना ( भीष्म० १०७।१०३-१०६ )।
  • भीम- वधके लिये शिखण्डीको प्रोत्साहन देना ( भीष्म० १०८।५२- ६० )।
  • इनके भयसे पीड़ित होकर कौरवसेनाका पलायन ( भीष्म० १०९।९३-९४ )।
  • दुःशासनके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११०।२८-४६; १११।५७-५८ )।
  • इनका अद्भुत पुरुषार्थ ( भीष्म० ११४ अ में )।
  • भगदत्तके साथ अर्जुनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६।४६-५० )।
  • भीमके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६।६२-७८ )।
  • भीमके साथ घोर युद्ध और उन्हें मूर्च्छित करना ( भीष्म० ११७।३५- ४४ )।
  • दुःशासनके साथ युद्ध ( भीष्म० ११८।१२-१५ )।
  • शिखण्डीको आगे करके भीमपर आक्रमण ( भीष्म० ११८। ३७-४४ )।
  • भीमको रथसे गिराना ( भीष्म० ११ ९।८७ )।
  • बाणशय्यापर सोये हुए भीमको तीन बाण मारकर तकिया देना ( भीष्म० १२०।४५ )।
  • दिव्यास्त्रद्वारा भीमके मुखमें शीतल जलकी धारा गिराना ( भीष्म० १२१।२४-२५ )।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १०।१५- २८ )।
  • नरखरूपमें इनकी महिमाका वर्णन ( द्रोण० ११।४१- ४२ )।
  • द्रोणाचार्यद्वारा पकड़े जानेके भयसे भीत युधिष्ठिर- को आश्वासन ( द्रोण० १३।७-१४ )।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और उनकी सेनाको पराजित करना ( द्रोण० १६।४३- ४५ )।
  • युधिष्ठिरकी रक्षाका भार सत्यजित्‌को सौंपना ( द्रोण० १७।४४ )।
  • संशप्तकोंके साथ युद्ध और सुशर्माका वध ( द्रोण० १८।२२ तथा १९ अ में )।
  • इनके द्वारा संशप्तकोंका वध ( द्रोण० २०।१८-२६ )।
  • सुशर्माके भाईका वध और सुशर्माकी पराजय ( द्रोण० २८।८-१० )।
  • भगदत्तके साथ युद्ध ( द्रोण० २८। १४-३० से २९ अ० तक )।
  • श्रीकृष्णसे वैष्णवास्त्रका रहस्य पूछना ( द्रोण० २९। २१-२४ )।
  • इनके द्वारा भगदत्तके हाथी सुप्रतीकका वध ( द्रोण० २९।४३ )।
  • अर्जुनके द्वारा भगदत्तका वध ( द्रोण० २९।४७-५०)।
  • वृषक और अचलका वध (द्रोण० २०।११)।
  • इनका शकुनिकी मायाका नाश करते हुए उसे पराजित करना (द्रोण० ३०।१५-२८)।
  • कर्णके साथ युद्ध (द्रोण० ३२।५-६२)।
  • इनके द्वारा कर्णकी तीन भाईयोंका वध (द्रोण० ३२।६०-६१)।
  • अभिमन्युकी मृत्युपर विलाप (द्रोण० ७२।१९-६५)।
  • भाईयोंपर क्रोध प्रकट करना (द्रोण० ७२।७६-८३)।
  • युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर मूर्छित होना (द्रोण० ७३।१६-१७)।
  • जयद्रथवधकी प्रतिज्ञा करना (द्रोण० ७३।२०-४९)।
  • श्रीकृष्णसे जयद्रथवधके विषयमें वीरोचित वचन कहना (द्रोण० ७६ अ० में)।
  • श्रीकृष्णसे पुत्रवधू उत्तरासहित सुभद्राको समझानेके लिये कहना (द्रोण० ७७।१-१०)।
  • इनके द्वारा शङ्करजीका निशीथ-पूजन (द्रोण० ७९।१-४)।
  • (अर्जुनका स्वप्न–) स्वप्नमें श्रीकृष्णका आना और उनकी सम्मतिसे उनके साथ शिवजीके पास जाकर प्रणाम करना (द्रोण० ८०।२-४९)।
  • इनके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति (द्रोण० ८०।५५-६४)।
  • भगवान् शिवसे दिव्यास्त्रकी याचना (द्रोण० ८१।३)।
  • पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति और श्रीभृगुसहित शिविसेको भेंटकर (स्वप्नकी समाप्ति) (द्रोण० ८१।२१-२४)।
  • पाण्डवसभामें अपना स्वप्न सुनाना (द्रोण० ८४।६)।
  • श्रीकृष्ण और सात्यकिके साथ रथयात्रा (द्रोण० ८४।२१)।
  • सात्यकिको युधिष्ठिरकी रक्षाका भार सौंपना (द्रोण० ८४।२७-३४)।
  • युद्धके आरम्भमें इनके द्वारा शंखनाद (द्रोण० ८८।१०)।
  • दुर्मर्षणकी गजसेनाका संहार (द्रोण० ८९ अ० में)।
  • इनका दुःशासनके साथ युद्ध और उसका पलायन (द्रोण० ९० अ०में)।
  • इनके द्वारा द्रोणाचार्यका सम्मान (द्रोण० ९१।३-६)।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना (द्रोण० ९१।३३-३३; ९२।१-१४)।
  • कृतवर्माके साथ युद्ध (द्रोण० ९२।१९६-२६)।
  • श्रुतायुधके साथ युद्ध (द्रोण० ९२।३५-४३)।
  • काम्बोजराज सुदक्षिंणके साथ युद्ध और उसका वध (द्रोण० ९२।६९-७७)।
  • श्रुतायु और अच्युतायुके साथ इनका युद्ध और उन दोनोंका वध (द्रोण० ९३।७-२४)।
  • इनके द्वारा नियुतायु और दीर्घायुकी वध (द्रोण० ९३।२९)।
  • म्लेच्छसेनाका संहार (द्रोण० ९३।३९-५१)।
  • श्रुतायु और अम्बष्ठके साथ युद्ध और अम्बष्ठका वध (द्रोण० ९३।६०-६१)।
  • बिन्द-अनुबिन्दका वध (द्रोण० ९४।२५-२९)।
  • संग्रामक्षेत्रमें इनका सरोवर प्रकट करना (द्रोण० ९९।५२)।
  • रणक्षेत्रमें बाणमय गृहका निर्माण (द्रोण० ९९।६२)।
  • श्रीकृष्णके प्रोत्साहन देनेपर दुर्योधनको मारनेके लिये उद्यत होना (द्रोण० १०२।१९-२१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) दुर्योधनके साथ युद्ध और उसे परास्त करना (द्रोण० १०२।२१-३२)।
  • इनका कौरव महारथियोंके साथ घोर युद्ध (द्रोण० १०३ अ०में)।
  • इनके ध्वजका वर्णन (द्रोण० १०५।८-९)।
  • इनका नौ महारथियोंके साथ युद्ध (द्रोण० १०५।३३-३८) कर्ण और अश्वत्थामाको खदेड़ना (द्रोण० १२९।३१२-३१३)।
  • सात्यकिको देखकर अर्जुनकी चिन्ता (द्रोण० १३१।२६-३७)।
  • श्रीकृष्णकी प्रेरणासे भूरिश्रवाकी दाहिनी भुजा काटना (द्रोण० १४२।७२)।
  • भूरिश्रवाकी उत्तर देना (द्रोण० १४३।१६-३२)।
  • इनका सात कौरव महारथियोंके साथ युद्ध (द्रोण० १४५ अ०में)।
  • इनके द्वारा कर्णकी पराजय (द्रोण० १४५।८३)।
  • कौरवसेनाका भीषण संहार (द्रोण १४६ अ० में)।
  • इनके द्वारा जयद्रथका सिर काटकर उसे बाणद्वारा उसके पिता वृद्धक्षत्रकी गोदमें डालना (द्रोण० १४६।१२२-१२७)।
  • कृपाचार्य और अश्वत्थामाको युद्धमें पराजित करना (द्रोण० १४७।९-११)।
  • कृपाचार्यके मूर्च्छित होनेपर विलाप करना (द्रोण० १४७।१३-२०)।
  • भीमसेनको कटुवचन सुनानेके कारण कर्णकी फटकारना (द्रोण० १४८।८-२२)।
  • कर्णपुत्र वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना (द्रोण० १४८।१९-२०)।
  • कर्णके साथ युद्ध करके उसे पराजित करना (द्रोण० १४९।६२-६४)।
  • द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और कौरवसेनाको खदेड़ना (द्रोण० १६१ अ०में)।
  • इनके द्वारा राक्षसराज अलम्बुषकी पराजय (द्रोण० १६०।४०)।
  • शकुनि और उलूककी पराजय (द्रोण० १७१।३८-४०)।
  • कर्णके पराक्रमसे भयभीत हुए युधिष्ठिरसे प्रेरित हो इनका श्रीकृष्णसे अपना कर्तव्य पूछना (द्रोण० १७३।२१-३४)।
  • घटोत्कचको कर्णके साथ युद्ध करनेके लिये आदेश देना (द्रोण० १७३।६०-६२)।
  • घटोत्कचवधसे प्रसन्न हुए श्रीकृष्णसे उनकी प्रसन्नताका कारण पूछना (द्रोण० १८०।६-१०)।
  • जरासंध आदिके वधके विषयमें श्रीकृष्णसे प्रश्न करना (द्रोण० १८१।१)।
  • उभयपक्षके सैनिकोंको सो जानेके लिये आदेश देना (द्रोण० १८४।२६-२८)।
  • द्रोणाचार्यके साथ घोर युद्ध करना (द्रोण० १८८।२४-४३)।
  • श्रीकृष्णसे सात्यकिकी प्रशंसा करना (द्रोण० १९२।४०-४३)।
  • अश्वत्थामाके क्रोध और गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन करना (द्रोण० १९६।२६-४३)।
  • नारायणास्त्र, गौ और ब्राह्मणके सामने गाण्डीव रख देनेकी बात 1 कहना (द्रोण० १९९।५३)।
  • व्यासजीसे अपने आगे-आगे चलनेवाले त्रिशूलधारी पुरुषके विषयमें प्रश्न करना (द्रोण० २०२।४-८)।
  • युधिष्ठिरके आदेशसे अर्धचन्द्रव्यूह बनाकर कर्णके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थान (कर्ण० ११।२८)।
  • अश्वत्थामाके साथ घोर युद्ध और उसे परास्त करना (कर्ण० १६ अ०में १० वें से० तक)।
  • इनके द्वारा हाथीसहित दण्डधरका वध (कर्ण० १८।३)।
  • इनके द्वारा हाथीसहित दण्डका वध (कर्ण० १८।११)।
  • संशप्तकोंका भीषण संहार (कर्ण० १९।१-२९)।
  • सुशर्माके छः भाइयो ( सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, श्रुतंजय, सौश्रुति और मित्रवर्मा ) का वध ( कर्ण० २० । १२ – २४ )।
  • कौरवसेनाका संहार ( कर्ण० २० । १५-३६ )।
  • युधिष्ठिरके आदेशसे कर्णपर आक्रमण ( कर्ण० ४६ । ३७ )।
  • इनके द्वारा संशप्तकोंका संहार ( कर्ण० ५० अंमें )।
  • सुशर्माके साथ युद्ध और दस हजार संशप्तकोंका वध ( कर्ण० ५३ अंमें )।
  • संशप्तकोंका संहार और सुदक्षिणके भाईका वध ( कर्ण० ५६ । १०-१७ )।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध और उसे परास्त करना ( कर्ण० ५६ । १२१-१४२ )।
  • श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरको देखनेके लिये उनके पास चलनेका आग्रह ( कर्ण० ५८ । ३-७ )।
  • धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामा- के चंगुलसे छुड़ाना और अश्वत्थामाको पराजित करना ( कर्ण० ५९ । ५४-६१ )।
  • इनके द्वारा अश्वत्थामाकी पराजय ( कर्ण० ६४ । ३१-३२ )।
  • श्रीकृष्णके साथ युधिष्ठिरके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करना ( कर्ण० ६५ । १७ )।
  • अबतक कर्णके न मारे जानेका कारण युधिष्ठिरसे बतलाते हुए उसके वधकी प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ६७ अंमें )।
  • युधिष्ठिरका वध करने- को उद्यत होना ( कर्ण० ६९ । १७-१५ )।
  • श्रीकृष्णसे अपनी प्रतिज्ञा-पूर्तिका उपाय पूछना ( कर्ण० ६९ । १७- ७५ )।
  • 'तू' शब्द कहकर युधिष्ठिरको कटुवचन सुनाना ( कर्ण० ७० । २-२१ )।
  • युधिष्ठिरका अपमान करनेके कारण आत्महत्याके लिये तलवार खींचना ( कर्ण० ७० । २२ )।
  • युधिष्ठिरसे क्षमायाचना ( कर्ण० ७० । ३८-३९ )।
  • युधिष्ठिरसे कर्ण-वधकी प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ७० । ४०-४१ )।
  • युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणिपात और कर्ण- वधकी प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ७१ । ३५-३६ )।
  • कर्ण- वधके लिये मार्गमें जाते समय चिन्तामग्न होना ( कर्ण० ७२ । १६-१७ )।
  • श्रीकृष्णसे इनके वीरोचित उद्गार ( कर्ण० ७४ अंमें )।
  • इनके द्वारा कौरवसेनाका भीषण संहार ( कर्ण० ७७ । ५-२० )।
  • श्रीकृष्णसे कर्ण- के पास चलनेके लिये कहना ( कर्ण० ७९ । ७-१२ )।
  • इनके द्वारा कौरवसेनाका विध्वंस ( कर्ण० ७९ । ७१-१० से ८० अं० तक ; ८१ । ५-२० )।
  • कौरवोंको ललकारते हुए धृष्टद्युम्नका वध ( कर्ण० ८५ । ३७ )।
  • युद्धके लिये इनका कर्णके सम्मुख उपस्थित होना ( कर्ण० ८६ । २३ )।
  • कर्णवधके लिये श्रीकृष्णसे वार्तालाप ( कर्ण० ८७ । १०५-११० )।
  • कर्णके साथ इनका द्वैरथ युद्ध ( कर्ण० ८९ अं०से ९० अं० तक )।
  • इनके द्वारा राजकुमार समपातिका वध ( कर्ण० ८९ । ६४ )।
  • कर्णके सम्मुख प्राणसे इनके किरीटका गिरना ( कर्ण० ९० । ३३ )।
  • इनके द्वारा कर्णका वध ( कर्ण० ९१ । ५० )।
  • रथसेनाका विध्वंस ( कर्ण० ९३ । ४२-४६ )।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध ( शल्य० १४ अंमें )।
  • श्रीकृष्णके समक्ष दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा ( शल्य० २४ । १९-५० )।
  • कौरवोंकी रथसेनाका संहार ( शल्य० २५ । १-१४ )।
  • दुर्योधनको मारनेके विषयमें श्रीकृष्णसे वार्तालाप ( शल्य० २७ । १३-२० )।
  • सत्यकर्मा, सत्येयु और पैंतालीस पुत्रोसहित सुशर्माका वध ( शल्य० २७ । ३८-४८ )।
  • श्रीकृष्णसे भीमसेन और दुर्योधनके बलाबालके विषयमें पूछना ( शल्य० ५८ । ३ )।
  • भीमसेनको अपनी जाँघ ठोंककर संकेत करना ( शल्य० ५८ । २१ )।
  • युद्धके पश्चात् इनके रथका दग्ध होना ( शल्य० ६२ । १३ )।
  • श्रीकृष्णसे अपने रथके दग्ध होनेका कारण पूछना ( शल्य० ६२ । १६-१७ )।
  • अश्वत्थामासे भीमसेन- की रक्षाके लिये श्रीकृष्णके साथ जाना ( सौप्तिक० १३ । १६ )।
  • अश्वत्थामाका अस्त्र-शान्त करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग ( शल्य० १४ । ५-६ )।
  • व्यासजीको देखकर अपना अस्त्र लौटा लेना ( सौप्तिक० १५ । ३-४ )।
  • गान्धारीके शापके भयसे श्रीकृष्णके पीछे छिपना ( स्त्री० १५ । ३१ )।
  • धनकी महत्ता दिखाते हुए राजधर्म-पालनके लिये युधिष्ठिरको समझाना ( शान्ति० ८ अंमें )।
  • युधिष्ठिरको समझाते हुए गृहस्थधर्मके पालनपर जोर देना ( शान्ति० ११ अंमें )।
  • युधिष्ठिरसे इनके द्वारा राजधर्मकी महत्ताका वर्णन करना ( शान्ति० १५ अंमें )।
  • राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देकर युधिष्ठिरको संन्यास लेनेसे रोकना ( शान्ति० १८ अंमें )।
  • युधिष्ठिरसे क्षत्रिय-धर्मकी प्रशंसा करना ( शान्ति० २२ अं०में )।
  • युधिष्ठिरका शोक दूर करनेके लिये श्रीकृष्णसे प्रार्थना करना ( शान्ति० २९ । २-३ )।
  • अर्जुनको युधिष्ठिरका शत्रुओ तथा दुष्टोंके दमनका कार्य सौंपना ( शान्ति० ४१ । १२ )।
  • युधिष्ठिरका इन्हें रहनेके लिये दुःशासनका भवन देना ( शान्ति० ४४ । ७-९ )।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर त्रिवर्गमें अर्थकी प्रधानता बताना ( शान्ति० १६७ । १९-२० )।
  • श्रीकृष्ण उनसे नामोंकी व्युत्पत्ति पूछना ( शान्ति० ३४९. ५-७ )।
  • श्रीकृष्णसे पुन: गीताका ज्ञान पूछना ( आश्व० १६ । ५-७ )।
  • श्रीकृष्णसे परब्रह्मके स्वरूपके विषयमें प्रश्न करना ( आश्व० ३५ । १ )।
  • श्रीकृष्णके प्रति इनके प्रशंसा- सूचक वचन ( आश्व० ५२ । ८-२४ )।
  • श्रीकृष्णकी द्वारका-यात्राके लिये युधिष्ठिरसे आज्ञा माँगना ( आश्व० ५२ । ४२-४३ )।
  • व्यासजीके श्मशानसे पुत्रशोकमें निवृत्त होकर संतोष-लाभ करना ( आश्व० ६२ । १८ )।
  • धन लानेके विषयमें पाँचों भाइयोंमें बातचीत; और भाइयोंके साथ जाकर इनका हिमालयसे मरुत्तका धन ले आना ( आश्व० ६३ अं०से ६५ अं० तक )।
  • अर्जुनके अश्वसंरक्षकके लिये नियुक्ति ( आश्व० ७२ । १६ )।
  • सेनासहित अर्जुनका अश्वकी रक्षाके लिये पीछे-पीछे पैदल ही जाना ( आश्व० ७३ । ७-८ )।
  • अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय, सूर्यवर्माकी मृत्यु, धृतवर्माका धृत-वर्माका घायल होना आदि ( आश्व० ७४ अ० )।
  • प्राग्ज्योतिषपुरमें भगदत्तके पुत्र वज्रदत्तकी पराजय तथा उसके हाथीका विनाश ( आश्व० ७६ । १७-१९ )।
  • अर्जुनका सैन्यकोके साथ युद्ध और दु:शालके अनुरोधसे उसकी समाप्ति ( आश्व० ७७-७८ अ० )।
  • अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध तथा अर्जुनकी मृत्यु ( आश्व० ७९ अ० )।
  • उद्दालकके प्रयत्नसे संजीविनी मणिके द्वारा अर्जुनका पुनर्जीवन ( आश्व० ८० अ०में )।
  • उद्दालकसे उसके और चित्राङ्गदाके युद्धस्थलमें आनेका कारण पूछना ( आश्व० ८१ । १ में )।
  • अर्जुनकी पराजयका रहस्य तथा उद्दालक और चित्राङ्गदासे विदा लेकर उनका पुन: अश्वके पीछे जाना ( आश्व० ८१ अ०में )।
  • अर्जुनद्वारा मगधराज मेघसंधिकी पराजय ( आश्व० ८२ अ० )।
  • शकुनि-पुत्रकी पराजय, शकुनिकी स्त्रीके अनुरोधसे अर्जुनका युद्ध बंद कर देना ( आश्व० ८४ अ० )।
  • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना ( आश्व० ८६ । १९-२१ )।
  • अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण-युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनके दूत तथा अर्जुनका हस्तिनापुरमें आना ( आश्व० ८७ । १९-२२ )।
  • धृतराष्ट्रके श्राद्ध और दानके लिये धन माँगनेपर अर्जुनकी सहमतितथा भीमसेनके अस्वीकार करनेपर अर्जुनका उन्हें समझाना ( आश्व० ९१-९२ अ० )।
  • यादवलोगों सहित इनका वनमें जाकर धृतराष्ट्र और माता कुन्ती आदिके दर्शन करना तथा व्यासजीके द्वारा मृत व्यक्तियोंका आवाहन होनेपर उन सबसे मिलना-हस्तिनापुरको लौटना तथा धृतराष्ट्र आदिके दग्ध होनेके समाचारसे दुखी होना और उनके श्राद्ध आदि करना ( आश्व० ९३-९४ अ०तक )।
  • अर्जुनका दारुकके साथ द्वारका जाना, श्रीकृष्णपत्नियोंसे मिलना और उन्हें धीरज बँधाकर वसुदेवके पास जाना ( मौसल० ५ अ०में )।
  • अर्जुनसे मिलकर वसुदेवका विलाप करना और उनके लिये कहे गये श्रीकृष्णका संदेश सुनाना ( मौसल० ६ अ०में )।
  • 'अब पाण्डवोंके भी परलोकगमनका समय आ गया है। हम यहाँके लोगोंको इन्द्रप्रस्थ ले जायँगे' - ऐसा वसुदेवसे कहकर अर्जुनका दारुक तथा मंत्रियोंकी यात्राकी तैयारीके लिये आदेश देना तथा रातमें श्रीकृष्णभवनमें ठहरना ( मौसल० ७ । १७-१९ )।
  • अर्जुनका संवतों सहित और अनिरुद्धका उनका दाहसंस्कार एवं वृष्णिदेशी कुमारोंद्वारा जलदान ( मौसल० ७ । ९५-९७ )।
  • अर्जुनका यादव-विनाशस्थलमें जाकर छोटे-बड़ेके क्रमसे सबका दाह करना; फिर श्रीकृष्ण-बलरामके शरीरों-का अनुसंधान कराकर उनका भी दाहसंस्कार करना ( मौसल० ७ । १८-३१ )।
  • अर्जुनका श्रीकृष्णपत्नियों तथा द्वारकावासियोंको लेकर इन्द्रप्रस्थको और प्रस्थान ( मौसल० ७ । ३२ )।
  • मार्गमें लुटेरोंका आक्रमण और अर्जुन आदिका उनसे स्त्रियोंकी रक्षा करनेमें असमर्थ होना । शेष व्यक्तियोंको लेकर जाना । मार्तिकावतमें कृतवर्माके पुत्रको सरस्वतीके तटपर सात्यकिके पुत्रको उन प्रदेशोंका राजा बनाना और वज्रको इन्द्रप्रस्थमें अभिषिक्त करना ( मौसल० ७ । ५१-७२ )।
  • अर्जुनका व्यासजीसे बीती बातें बताना और व्यासजीका उन्हें आश्वासन देते हुए पाण्डवों-को महाप्रस्थानके लिये प्रेरित करना ( मौसल० ८ अ०में )।
  • अर्जुनका भाइयो सहित महाप्रस्थान और मार्गमें अग्निदेव और भाइयोके कहनेसे गाण्डीव धनुषको जल-में डाल देना ( महाप्रा० १ । ९४-९२ )।
  • मार्गमें अर्जुनका गिरना और युधिष्ठिरका उनके गिरनेका कारण बताना ( महाप्रा० २ । १७-२२ )।
  • अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके पार्षद रूपसे दर्शन ( स्वर्ग० ५ । ४ )।

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