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बभ्रुवाहन

  • राजा चित्रवाहनकी पुत्री चित्राङ्गदाके गर्भसे अर्जुनद्वारा उत्पन्न एक वीर राजा ( आदि० २१६ । २४ ) ।
  • चित्रवाहनने अर्जुनको अपनी कन्या देनेसे पहले ही यह शर्त रख दी थी कि 'इसके गर्भसे जो एक पुत्र हो, वह यहीं रहकर इस कुलपरंपराका प्रवर्तक हो। इस कन्या- के विवाहका यही शुल्क आपको देना होगा। 'तथास्तु' कहकर अर्जुनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की। पुत्रका जन्म हो जानेपर उनका नाम 'बभ्रुवाहन' रखा गया। उसे देख कर अर्जुनने राजा चित्रवाहनसे कहा—'महाराज! इस बभ्रुवाहनको आप चित्राङ्गदाके शुल्करूपमें ग्रहण कीजिये। इससे मैं आपके ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा।' इसके अनुसार ये धर्मतः चित्रवाहनके पुत्र माने गये ( आदि० २१४ । २७—२९; आदि० २१६ । २४—२५ ) ।
  • अपने पिता अर्जुनको मणिपुरके समीप आया जान इनका बहुत-सा धन साथमें लेकर उनके दर्शनके लिये नगरके बाहर निकलना ( आश्व० ७९ । १ ) ।
  • क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध न करनेके कारण अर्जुनका इन्हें धिक्कारना ( आश्व० ७९ । ३— ७ ) ।
  • उलूपीके प्रोत्साहन देनेपर इनका अर्जुनके साथ युद्ध करनेके लिये उद्यत होना और अश्वमेधसम्बन्धी अश्व को पकड़वा लेना ( आश्व० ७९ । ८—१७ ) ।
  • पिता और पुत्रमें परस्पर अद्भुत युद्ध और बभ्रुवाहनका अर्जुन को मूर्छित करके स्वयं भी मूर्छित होना ( आश्वमेध० १८—३० ) ।
  • मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका विलाप और आमरण अनशनके लिये प्रतिज्ञा करके बैठना ( आश्व० ८० । २१—४० ) ।
  • उलूपीका बभ्रुवाहनको सान्त्वना देकर उनके हाथमें दिव्यमणि प्रदान करना और उसे पिता- के वक्षःस्थलपर रखनेके लिये आदेश देना ( आश्व० ८० । ४२—५० ) ।
  • मणिके स्पर्शसे जीवित हुए पिताको बभ्रु- वाहनका प्रणाम करना और पिताका पुत्रको गलेसे लगाना ( आश्व० ८० । ५१—५६ ) ।
  • अर्जुनका बभ्रुवाहनसे युद्ध स्थलममें उलूपी और चित्राङ्गदाके उपस्थित होनेका कारण पूछना और बभ्रुवाहनका उलूपीसे ही पूछनेकी प्रार्थना करना ( आश्व० ८० । ५७—६१ ) ।
  • उलूपीसे सब समाचार सुन- कर प्रसन्न हुए अर्जुनका बभ्रुवाहनको अपनी दोनों माताओं- के साथ युधिष्ठिरके अश्वमेध यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रण देना ( आश्व० ८१ । १—२४ ) ।
  • पिताकी आज्ञा शिरो- धार्य करके बभ्रुवाहनका पितासे नगरमें चलनेके लिये अनु- रोध करना और अर्जुनका 'कहीं भी ठहरनेका नियम नहीं है' ऐसा कहकर पुत्रसे सत्कारपूर्वक विदा ले वहाँसे प्रस्थान करना ( आश्व० ८१ । २६—३२ ) ।
  • अर्जुनका संदेश सुनाते हुए श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे राजा बभ्रुवाहनके भावी आगमनकी चर्चा करना ( आश्व० ८६ । १८—२० ) ।
  • माताओंसहित बभ्रुवाहनका कुरुदेशमें आगमन और गुरु- जनोंको प्रणाम करके उनका कुन्तीके भवनमें प्रवेश ( आश्व० ८७ । २६—२८ ) ।
  • माताओंसहित बभ्रुवाहनका कुन्ती, द्रौपदी और सुभद्रा आदिके चरणोंमें प्रणाम करना और उन सबके द्वारा रत्न-आभूषण आदिसे सम्मानित होना
  • ( आश्व० ८८ । १—५ ) ।
  • अन्त:पुरसे आकर बभ्रुवाहनका राजा धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करना और उन सबके द्वारा धन आदिसे सत्कृत होना। श्रीकृष्णका बभ्रुवाहनको दिव्य अश्वोंसे जुता हुआ सुवर्णमय रथ प्रदान करना ( आश्व० ८८ । ६—११ ) ।
  • राजा युधिष्ठिरका बभ्रुवाहनको बहुत धन देकर विदा करना ( आश्व० ८९ । १४ ) ।

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