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बलदेव ( बलराम )

  • ( १ ) वसुदेव तथा रोहिणीके पुत्र । भगवान् श्रीकृष्णके अग्रज और शेषके अवतार ( आदि० ६७ । १५२ ) ।
  • भगवान् नारायणके श्वेत केशसे इनका आविर्भाव हुआ ( आदि० १६ । ३३ ) ।
  • इनके द्वारा भीमको गदायुद्धकी शिक्षा ( आदि० १३८ । ४ ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें श्रीकृष्णसहित इनका आगमन ( आदि० १७५ । १० ) ।
  • द्रौपदीस्वयंवरमें इनका भीम और अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्णसे वार्तालाप ( आदि० १८८ । २४ ) ।
  • पाण्डवोंसे मिलनेके लिये श्रीकृष्णसहित कुम्भकारके घर जाना ( आदि० १९० । १-८ ) ।
  • सुभद्राहरणके समय अर्जुनपर इनका कोप ( आदि० २१९ । २५-३१ ) ।
  • श्रीकृष्णका इनको शान्त करना ( आदि० २२० । ११-११ ) ।
  • ये देवकीके गर्भमें थे, परंतु राजा यमने वाम्य मायाद्वारा इन्हें रोहिणीके गर्भमें डाल दिया । इस सङ्कर्षणकर्मके कारण इनका 'सङ्कर्षण' और बलकी अधिकता होनेसे 'बलदेव' नाम भी हुआ ( सभा० २२ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७३१ ) ।
  • इनके द्वारा धेनुकासुरका वध ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८०० ) ।
  • मुष्टिका वध ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८०१ ) ।
  • सान्दीपिनिमुनिके आश्रममें इनका अध्ययन ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८०२ ) ।
  • प्रभासक्षेत्रमें इनके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दुःखपूर्ण उद्गार ( वन० ११६ । ५-२२ ) ।
  • उपप्लव्य नगरमें अभिमन्युके विवाहमें जाना ( विराट० ७२ । २१ ) ।
  • कौरव-पाण्डवोंमें सन्धिकी कामना रखते हुए इनके द्वारा दूत भेजनेके प्रस्तावका समर्थन ( उद्योग० २ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनके सहायता माँगनेपर इनका उसकी तथा अर्जुनकी भी सहायता करनेसे इनकार करना ( उद्योग० ७ । २९ ) ।
  • कुरुक्षेत्रके मैदानमें पाण्डवोंके शिविरमें आना ( उद्योग० १५० । १० ) ।
  • इनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान करना ( उद्योग० १५० । ३५ ) ।
  • दुर्योधन और भीमसेनके गदायुद्धके प्रारम्भमें इनका आगमन और वहाँ उपस्थित नरेशोंद्वारा सत्कार ( शल्य० ३४ अध्याय ) ।
  • इनकी
  • तीर्थयात्राका वर्णन ( शल्य० अध्याय ३५ से ५४ तक ) ।
  • इनका नारदजीसे कौरवोंके विनाशके विषयमें पूछना ( शल्य० ५४ । २४-२५ ) ।
  • भीमसेन और दुर्योधनके गदायुद्धके लिये सबको समन्तपञ्चकमें ले जाना शल्य० ५५ । ६-१० ) ।
  • अन्यायसे दुर्योधनके मारे जानेपर इनका कुपित होकर भीमसेनको मारनेके लिये उद्यत होना ( शल्य० ६० । १-१० ) ।
  • भीमसेनके इस कर्मकी निन्दा करके द्वारकाको प्रस्थान करना ( शल्य० ६० । २१-३० ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( शल्य० १२६ । १०-११ ) ।
  • शिवजी द्वारा इनके रूपमें भगवान् अनन्तके भावी अवतार तथा महिमाका कथन ( अनु० १४७ । ५४-६० ) ।
  • इनके द्वारा अभिमन्युका श्राद्ध ( आश्व० ६२ । ६ ) ।
  • युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें इनका हस्तिनापुर आना ( आश्व० ६६ । ४ ) ।
  • इनके आदेशसे द्वारकापुरीमें मद्यपान निषेधकी आज्ञा जारी होना ( मौसल० १ । २९ ) ।
  • समाधि लगाकर बैठे हुए बलरामजीके मुखसे निकलते हुए विशालकाय श्वेत सर्पका श्रीकृष्णद्वारा दर्शन तथा इनके स्वागतके लिये अनेकानेक नागों और सरिताओंका आगमन ( मौसल० ४ । १३-१७ ) ।
  • ( २ ) एक महाबली नाग ( अनु० ३२ । ८ ) ।

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