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बृहद्दन्त

  • कन्याओंके साथ इनका विवाह हुआ था । इन्होंने एकान्तमें अपनी दोनों पत्नियोंके साथ प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम दोनोंके साथ कभी विषम व्यवहार नहीं करूँगा । चिरजीवी होते हुए ही इनकी जवानी बीत चली; पर इनके कोई पुत्र नहीं हुआ ( सभा० १७ । १७—२१ ) ।
  • तब ये पुत्रहीनताके कारण पत्नियोंसहित चण्डकौशिक मुनिके पास गये और उन्हें सब प्रकारके रत्नोंसे संतुष्ट किया । मुनिके अपने पास आनेका कारण पूछनेपर इन्होंने अपना पुत्राभावजनित कष्ट बताया और मुनिने तपस्या करनेका विचार प्रकट किया । मुनिने इन्हें आमका एक फल दिया और इन्हें पुत्र होनेका विश्वास दिलाकर पुत्रको राज्यपदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् वनमें तपस्याके लिये जानेका आदेश दिया । मुनिने इनके भावी पुत्रके लिये आठ वरदान दिये थे । इसके बाद राजा मुनिको प्रणाम करके अपने घर गये ( सभा० १७ । २२—३१ ) ।
  • राजाने वह फल दो भागोंमें विभक्त करके एक-एक भाग पत्नियोंको खिला दिया । दोनोंके गर्भ रहा । प्रसवकाल आनेपर दोनोंके गर्भसे शरीरका आधा-आधा भाग उत्पन्न हुआ । उन निर्जीव टुकड़ोंको रानियोंने बाहर फेंकवा दिया । जरा नामक राक्षसीने उन दोनों टुकड़ोंको जोड़ दिया । उससे बलवान् कुमार सजीव हो उठा । राक्षसीने वह बालक राजाको अर्पित कर दिया । तब राजाने उससे परिचय पूछा । राक्षसी परिचय देकर अन्तर्हित हो गयी । राजा कुमारको लेकर महलमें आये । बालकका जातकर्म आदि किया और उनका नाम जरासंध रखा और मगधदेशमें राक्षसीपूजनका महान् उत्सव मनानेकी आज्ञा दी ( सभा० १७ । ३२ से १८ अध्यायतक ) ।
  • इनका जरासंधको अपने राज्यपर अभिषिक्त करके दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनको जाना ( सभा० १८ । १७—१८ ) ।
  • इन्होंने गृध्रप नामक राक्षसका वध करके उसकी खालसे तीन नगाड़े बनवाये थे, जिनपर चोट करनेसे महीनेभर आवाज होती रहती थी ( सभा० २१ । १६ ) ।
  • (३) एक राजा, जो 'सूक्ष्म' नामक दैत्यके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ५७ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८५ । २१ ) ।
  • (४) एक अग्नि, जो बालपुत्र होनेके कारण बालिश भी कहलाते हैं ( वन० २२० । १ ) ।
  • इनके प्रणिधि नामक पुत्र हुआ ( वन० २२० । १७५ । १० ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इनको रणनिमन्त्रण भेजनेका निश्चय हुआ था ( उद्योग० ४ । १३ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके प्रति भक्तिभावके कारण उनके पक्षमें चले आये थे । इनके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । ७६-७७ ) ।
  • इनके मारे जानेकी चर्चा ( कर्ण० ६ । १२-१३ ) ।
  • ( २ ) क्षेमधूर्त्तका भाई । कौरवपक्षका योद्धा । सात्यकिके साथ इसका युद्ध ( द्रोण० २७ । ४७-४८ ) ।
  • इसके मारे जानेकी चर्चा ( कर्ण० ५ । ४२ ) ।

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