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बृहस्पति

  • ( १ ) महर्षि अङ्गिराके पुत्र । उत्यथ और संवर्तके भाई ( आदि० ६६ । ५ ) ।
  • बृहस्पतीजीकी ब्रह्मवादिनी बहिन योगपरायण जो अनासक्त भावसे सम्पूर्ण जगत्में विचरती हैं । वह प्रभा नामके वसुकी पत्नी हुई ( आदि० ६६ । २६-२७ ) ।
  • इनके अंशसे द्रोणाचार्यकी उत्पत्ति हुई थी ( आदि० १३१ । ३१ ) ।
  • अङ्गिराद्वारा इनका पुरोहितके पदपर वरण ( आदि० ७६ । ६ ) ।
  • शुक्राचार्यके साथ इनकी स्पर्धा ( आदि० ७६ । ७ ) ।
  • इनके पुत्रका नाम 'कच' था ( आदि० ७६ । ११ ) ।
  • इन्होंने भरद्वाज मुनिको आग्नेयास्त्र प्रदान किया था ( आदि० १६१ । २१ ) ।
  • ये इन्द्रकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । २८ ) ।
  • ब्रह्माजीकी सभामें भी उपस्थित होते हैं ( सभा० ११ । २९ ) ।
  • इनके द्वारा चान्द्रमसी ( तारा ) नामक पत्नीसे छः अग्निरवरूप पुत्र उत्पन्न हुए; जिनमें शंयु सबसे बड़ा था । इनके सिवा, एक कन्या भी हुई थी ( वन० २१९ अध्याय ) ।
  • नहुषके भयसे भीत शचीको इनका आश्वासन देना ( उद्योग० ११ । २३-२५ ) ।
  • नहुषसे अवधि माँगनेके लिये शचीको सलाह देना ( उद्योग० ११ । २५ ) ।
  • अग्नि के साथ संवाद ( उद्योग० १५ । २८-३४ ) ।
  • इनके द्वारा अग्निका स्तवन ( उद्योग० १६ । १-८ ) ।
  • इनका इन्द्रकी स्तुति करना ( उद्योग० १६ । १७-१८ ) ।
  • इनके प्रति नहुषके बलका वर्णन ( उद्योग० १६ । २३-२४ ) ।
  • पृथ्वीदोहनके समय ये दोग्धा बने थे ( द्रोण० ६९ । २३ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको दण्डका दान ( शल्य० ४६ । ५० ) ।
  • कोसलनरेश वसुमनासे राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन ( शान्ति० ६८ । ८-६० ) ।
  • इन्द्रको सान्त्वनापूर्ण मधुर

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