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ब्रह्मध्वज

  • वचन बोलनेका उपदेश ( शान्ति० ८४ अध्याय ) ।
  • इनका इन्द्रको विजय-प्राप्तिके उपाय और दुष्टोंका लक्षण बताना ( शान्ति० १०३ । ७-५२ ) ।
  • इन्द्रको शुक्राचार्यके पास श्रेयःप्राप्तिके लिये भेजना ( शान्ति० १२४ । २४ ) ।
  • मनुसे ज्ञानविषयक विविध प्रश्न करना ( शान्ति० २०९ अध्यायसे २०६ अध्यायतक ) ।
  • उपरिचरके यज्ञमें भगवान्-पर कुपित होना ( शान्ति० ३३६ । १४ ) ।
  • मुनियोंके समझानेसे क्रोध शान्त करके यज्ञको पूर्ण करना ( शान्ति० ३३६ । १७-२३ ) ।
  • इनके द्वारा जलाभिमानी देवताकी स्तुति ( अनु० ३४२ । २० ) ।
  • इनके द्वारा इन्द्रसे भूमिविदानके महत्त्वका वर्णन ( अनु० ६२ । ५७-७२ ) ।
  • राजा मान्धाताके पूछनेपर उनको गोदानके विषयमें उपदेश ( अनु० ७० । ५-२३ ) ।
  • युधिष्ठिरके प्रति इनका प्राणियोंके जन्मान्तरका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नाना योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन ( अनु० १११ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरको अन्नदानकी महिमा बताना ( अनु० ११२ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा-का उपदेश देकर इनका स्वर्गगमन ( अनु० ११३ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा इन्द्रको धर्मोपदेश ( अनु० १२५ । ६०-६८ ) ।
  • इन्द्रके कहनेसे मनुष्यका यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना ( आश्रम० ५ । २५-२७ ) ।
  • मरुत्तसे उनका यज्ञ करानेसे इनकार करना ( आश्रम० ६ । ८-९ ) ।
  • मरुत्तको धन प्राप्त होनेसे इनका चिन्तित होना ( आश्रम० ८ । ३६-३७ ) ।
  • इन्द्रके पूछनेपर उनसे अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए, मरुत्त और संवर्तको कैद करनेके लिये कहना ( आश्रम० ९ । १७ ) ।
  • ये और सोम ब्राह्मणोंके राजा बताये गये हैं ( आश्रम० ९ । ८-१० ) ।
  • ( १ ) एक राजा जो जरासंधके भयसे अपने भाइयों और सेवकोंसहित दक्षिण दिशामें भाग गये थे ( सभा० ३४ । २९ ) ।
  • ( २ ) एक भारतीय जनपद ( भीष्म० ६ । ३५ ) ।

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