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ब्रह्मा

  • सृष्टि के प्रारम्भमें जब सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार था, किसी भी वस्तु या नाम-रूपका भान नहीं होता था, उस समय एक विशाल अण्ड प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण प्रजाओंका अविनाशी बीज था; उस दिव्य एवं महान् अण्डमें सत्यस्वरूप अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश हुआ । उस प्रजापालक देवगुरु पितामह ब्रह्माका आविर्भाव हुआ ( आदि० ११२९-३२ ) ।
  • महाभारतका निर्माण करके उसके अध्ययन और प्रचारके विषयमें विचार करते हुए कृष्णद्वैपायन व्यासके आश्रमपर इनका आगमन ( आदि० ११५० । ५५ ) ।
  • व्यासजीसे संस्कृत होकर इनका आगमनपर विराजमान होना ( आदि० ११५८-५९ ) ।
  • व्यासजीका अपने ग्रन्थके परिचय देते हुए उनका कोई योग्य लेखक न होनेके विषयमें चिन्ता प्रकट करना ( आदि० ११६१-६३ ) ।
  • इनका महाभारतको 'काव्य'की संज्ञा देना और उनकी प्रशंसा करके उसके लेखनके लिये गणेशजीका स्मरण करनेकी सलाह देना ( आदि० ११७१-७४ ) ।
  • इन्होंने वरुणके यज्ञमें महर्षि भृगुको अग्निसे उत्पन्न किया ( आदि० ५ । ८ ) ।
  • भृगुद्वारा ग्राम अग्निके शापका संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना ( आदि० ७ । १८-२५ ) ।
  • इनके द्वारा प्रजाके हितकी कामनासे सर्पोंको दिये गये कद्रूके शापका अनुमोदन ( आदि० २० । १० ) ।
  • इनसे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु—इन छः मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई ( आदि० ६५ । ५-७ आदि० ६५ । ४ ) ।
  • ब्रह्माजीके दाहिने अँगूठेसे दक्ष और बायेंसे दस पत्नियोंका प्रादुर्भाव ( आदि० ६६ । १०-११ ) ।
  • इनके दाहिने स्तनका भेदन करके मनुष्यरूपमें भगवान् धर्मका प्राकट्य ( आदि० ६६ । ३१ ) ।
  • इनके हृदयका भेदन करके मृगुका प्रकट होना ( आदि० ६६ । ४१ ) ।
  • इनकी प्रेरणासे शुक्राचार्य समस्त लोकोंका चक्कर लगाते रहते हैं ( आदि० ६६ । ४२ ) ।
  • इनके दो पुत्र और हैं, जो मनुके साथ रहते हैं; उनके नाम हैं—धाता और विधाता ( आदि० ६६ । ५० ) ।
  • मनुष्योंकी मृत्यु रुक जानेसे चिन्तित हुए देवताओंका इनका आश्वासन ( आदि० १६० । ७ ) ।
  • इनके द्वारा सुन्द और उपसुन्दको वरदान ( आदि० २०८ । १०-२५ ) ।
  • सुन्द और उपसुन्दके अत्याचारसे दुखी हुए महर्षियोंका इनके प्रति उनके अत्याचारोंका वर्णन ( आदि० २१० । ४-८ ) ।
  • तिलोत्तमाका निर्माण करनेके लिये इनका विश्वकर्माको आदेश ( आदि० २१० । ९-११ ) ।
  • तिलोत्तमाको इनका वरदान ( आदि० २११ । २३-२४ ) ।
  • अपने अजीर्ण रोगको मिटानेके लिये अग्निकी इनसे प्रार्थना ( आदि० २२१ । ६९-७१ ) ।
  • अग्निकी ग्लानिका कारण बताते हुए खाण्डववनको जलानेके लिये इनका उन्हें आदेश ( आदि० २२२ । ७२-७७ ) ।
  • खाण्डववनको जलानेके कार्यमें श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे सहायताकी प्रार्थना करनेके लिये इनकी अग्निको प्रेरणा ( आदि० २२३ । ११ ) ।
  • इनके द्वारा पूर्वकालमें गाण्डीव धनुषका निर्माण ( आदि० २२४ । १५ ) ।
  • एक सहस्र युग बीतनेपर ये हिरण्यश्रृङ्ग पर्वतपर बिन्दुसरके समीप यज्ञ करते हैं ( सभा० ३ । १५ ) ।
  • नारदद्वारा इनकी दिव्य सभाका वर्णन ( सभा० ११ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा हिरण्यकशिपुको शाप या किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे न मरनेका वरदान ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७८५-७८६ ) ।
  • प्रजापति ब्रह्माके इन्द्रके लिये एक दिव्य शङ्ख प्राप्त किया था ( सभा० ५४ । १४-१५ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मारण्यमें ब्रह्मसरके समीप एक यूपकी स्थापना ( वन० ८४ । ६ ) ।
  • ब्रह्माके प्रयागमें यज्ञ किया था ( वन० ८७ । ११ ) ।
  • प्रजापति ब्रह्माजीने पुष्कर तीर्थके लिये एक गाथा गायी है ( वन० ८९ । १७-१८ ) ।
  • इनका देवताओंको दधीचिके पास उनकी हड्डियोंकी याचनाके लिये भेजना ( वन० १०० । ८ ) ।
  • प्रजापति ब्रह्माजीने कुरुक्षेत्रमें इष्टीकृत नामक सत्रका एक सहस्र वर्षोंतक अनुष्ठान किया था ( वन० १२९ । १ ) ।
  • वाराहरूपधारी विष्णुद्वारा पृथ्वीको ऊपर उठाये जानेसे क्षुब्ध हुए देवताओंको इनके द्वारा सान्त्वना-प्रदान ( वन० १४२ । ५४-५७ ) ।
  • ब्रह्माजीके द्वारा कालकेयोंके लिये हिरण्यपुर नामक नगरका निर्माण और मनुष्यके हाथसे उनके विनाशका निर्देश ( वन० १७३ । ११-१५ ) ।
  • भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे इनकी उत्पत्तिका वर्णन ( वन० २०३ । १०-१५ ) ।
  • इनके द्वारा धुनधुको वरदान ( वन० २०४ । २-४ ) ।
  • इन्द्रके प्रति देवसेना-के पतिका निर्धारण ( वन० २२४ । २४ ) ।
  • ये पुलस्त्य के पिता और रावणके पितामह थे ( वन० २७४ । ११-१२ ) ।
  • इनका देवताओंको वानर और रीछयोनियोंमें अपने अंशसे संतान उत्पन्न करनेके लिये आदेश ( वन० २७६ । ७ ) ।
  • इनके द्वारा सीताजीकी शुद्धिका समर्थन ( वन० २७९ । ३५ ) ।
  • ययातिसे अभिमानको अधःपतनका हेतु बताना ( उद्योग० १२३ । १४-१५ ) ।
  • इनके द्वारा भगवत्स्तुति ( भीष्म० ६५ । ४७-७४ ) ।
  • देवताओंको नर-नारायणका परिचय देना ( भीष्म० ६६ । ६-२३ ) ।
  • प्राणियोंके संहारके विषयमें उपाय सोचते समय इनका कोप ( द्रोण० ५२ । ४० ) ।
  • रुद्रसे अपने क्रोधका कारण बताना ( द्रोण० ५३ । ३-५ ) ।
  • इनके शरीरसे मृत्युकी उत्पत्ति ( द्रोण० ५४ । १०-१८ ) ।
  • मृत्युको जगत्के संहारका कार्य सौंपना ( द्रोण० ५५ । २१-२२ ) ।
  • मृत्युकी तपस्यासे प्रसन्न होकर उसे वर देना ( द्रोण० ५५ । ३३-३६ ) ।
  • मृत्युको आदेश ( द्रोण० ५५ । ३९-४३ ) ।
  • वृत्रासुरके भयसे भीत देवताओंको साथ लेकर शिवजीके पास जाना ( द्रोण० ५७ । ५३-५८ ) ।
  • त्रिपुरोंके संहारके समय ये भगवान् रुद्रके सारथि बने थे ( द्रोण० २०२ । ७६ ) ।
  • इन्द्र आदि देवताओंसहित त्रिपुरवधके लिये शिवजीके पास जाकर उनको प्रसन्न करना ( कर्ण० ३३ । ४१-६२ ) ।
  • शिवजीसे त्रिपुरवधके लिये याचना करना ( कर्ण० ३४ । २-५ ) ।
  • देवताओंकी प्रार्थनासे त्रिपुरवधके समय शिवजीका सारथि बनना ( कर्ण० ३४ । ७-१५ ) ।
  • कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धमें इन्द्रके पूछनेपर इनके द्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा ( कर्ण० ८७ । ६९-७५ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको पार्षद-प्रदान ( शल्य० ४५ । २४-२५ ) ।
  • स्कन्दके लिये काले मृगचर्मका दान ( शल्य० ४६ । ५३ ) ।
  • इनकी सृष्टि-रचनाका वर्णन ( सौप्तिक० १० । १०-२० ) ।
  • इनका चार्वाकको वर-प्रदान ( शान्ति० २९ । ५ ) ।
  • चार्वाककी मृत्युका उपाय बताना ( शान्ति० २९ । ८-१० ) ।
  • इनके नीतिशास्त्रका वर्णन ( शान्ति० ५९ । २९-६६ ) ।
  • इनका खड्ग उत्पन्न करके रुद्रदेवको देना ( शान्ति० १६६ । ४५-४६ ) ।
  • देवताओंको आश्वासन ( शान्ति० २०० । ३०-३१; शान्ति० २०९ । ३१-३६ ) ।
  • इन्द्रको वृत्रका पता बताना और वध करनेसे रोकना ( शान्ति० २२३ । ८—११ ) ।
  • प्रजाकी वृद्धि- पर इनका कोप ( शान्ति० २५६ । १६ ) ।
  • शिवजीकी प्रार्थनासे क्रोधका त्याग ( शान्ति० २५७ । १३ ) ।
  • मृत्युको संहारके लिये आदेश ( शान्ति० २५८ । २८—३६ ) ।
  • वृत्रासुरके वधसे इन्द्रको लगी हुई ब्रह्महत्याका विभाजन ( शान्ति० २६२ । ३१—५५ ) ।
  • दक्षयज्ञके समय कुपित हुए शिवजीका कोप शान्त करना ( शान्ति० २६३ । ४५—४८ ) ।
  • हंसस्वरूपे साध्यगणोंको उपदेश ( शान्ति० २९९ अध्याय ) ।
  • देवताओंके मान धारणकी शरणमें जाना ( शान्ति० ३४० । ४२— ४८ ) ।
  • इनके द्वारा नारायण-रुद्र-युद्धकी शान्ति ( शान्ति० ३४१ । १२४—१२९ ) ।
  • भगवान् हयग्रीवकी स्तुति ( शान्ति० ३४७ । ३८—४५ ) ।
  • वैजयन्तपर्वतपर शिवजीके साथ वार्तालापमें इनके द्वारा नारायणकी महिमाका वर्णन ( शान्ति० ३५० । २५ से ३५ अध्यायतक ) ।
  • देवताओंसे गरुड़-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना ( अनु० १३ । ६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ५४६७—५४७९ ) ।
  • इनके द्वारा ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन ( अनु० ३५ । ५—११के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • यज्ञके लिये देवताओंको भूमि देना ( अनु० ६६ । २१—२२ ) ।
  • इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमाका वर्णन ( अनु० ७३ अध्याय ) ।
  • गोदानके विषयमें इनका इन्द्रके प्रश्नका उत्तर देना ( अनु० ७४ । २—१० ) ।
  • इन्द्रको गोलोक और गौओंकी महिमा बताना ( अनु० ८३ । १५—४५ ) ।
  • सुरभीको वरदान देना ( अनु० ८३ । ३६—३९ ) ।
  • इनके द्वारा देवताओंको आश्वासन ( अनु० ८५ । ८—१८ ) ।
  • वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें इनका अपने वीर्यकी आहुति देना और उससे प्रजापतियोंका जन्म होना ( अनु० ८५ । ९९—१०२ ) ।
  • पितरों और देवोंके अजीर्ण-निवारणके लिये अग्निको उपाय बताना ( अनु० ९२ । ९ ) ।
  • नहुषके पतनके बाद शतक्रतुको इन्द्र बनानेके लिये देवोंको आदेश ( अनु० १०० । ३४— ३६ ) ।
  • राजा भगीरथको ब्रह्मलोकमें आया देख उनसे वहाँ पहुँचनेका साधन पूछना ( अनु० १०३ । ६—७ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १२६ । ४६— ५० ) ।
  • कप नामक दानवोंसे पराजित देवताओंको ब्राह्मणकी शरण लेनेका आदेश ( अनु० १५० । ५ ) ।
  • देवता, ऋषि, नाग और असुरोंको एकाक्षर ( ॐ ) का उपदेश ( आश्व० २६ । ८ ) ।
  • इनके द्वारा महर्षियोंको विविध ज्ञानका उपदेश ( आश्व० ३५ । ३२ से आश्व० ५१ । ४० तक ) ।

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