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भगदत्त

  • प्राग्ज्योतिषपुरका अधिपति, बाष्कल नामक असुर- के अंशसे उत्पन्न ( आदि० ६७ । १७ ) ।
  • यह द्रौपदी- के स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८४ । १३ ) ।
  • यह राजा पाण्डुका मित्र था । जरासंधसे मिला होनेपर भी युधिष्ठिरके प्रति पिताकी भाँति स्नेह रखता था । इसे यवनाधिप कहा गया है ( सभा० १४ । १६—१६ ) ।
  • राजसूय-दिग्विजयके समय अर्जुनके साथ इसका घोर युद्ध हुआ और अर्जुनकी वीरतासे प्रसन्न होकर इसने उनकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की । यह इन्द्रका मित्र था और इन्द्रके समान ही पराक्रमी था । अर्जुनके पिता पाण्डुसे भी इसकी मैत्री थी । इसने अर्जुनके प्रति वात्सल्य दिखाया । यह किरात, चीन आदि समुद्रतटवर्ती सैनिकोंके साथ युद्धमें गया था ( सभा० २६ । १७—१६ ) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें यह यवनराज नाना और अच्छी जातिके वेगशाली अश्व एवं बहुत-सी भेंट-सामग्री लेकर खड़ा था । बहुत-से हीरे और पद्मरागमणिके आभूषण एवं विशुद्ध हाथी-दाँतकी बनी नतवाले खड्ग देकर यह राजसभामें गया था ( सभा० ५१ । १४-१६ ) ।
  • दिग्विजयके समय कर्णद्वारा इनकी पराजय ( वन० २५४ । ५ ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इसके पास रणनिमन्त्रण भेजनेका विचार किया गया था ( उद्योग० ५ । ११ ) ।
  • दुर्योधनकी सहायतामें सेनासहित इनका आना ( उद्योग० ५ । १९ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें विराटके साथ द्वन्द्व युद्ध ( भीष्म० ४५ । ४९-५० ) ।
  • घटोत्कचके साथ युद्ध और पराजय ( भीष्म० ४८ । ५१-६२ ) ।
  • भीमसेनको मूर्च्छित करना ( भीष्म० ५४ । ५३-५४ ) ।
  • इसके द्वारा घटोत्कचकी पराजय ( भीष्म० ८३ । ४० ) ।
  • इसका अद्भुत पराक्रम ( भीष्म० ९५ अध्याय ) ।
  • इसके द्वारा दशार्णराजकी पराजय ( भीष्म० ९५ । ४८-४९ ) ।
  • इसके द्वारा क्षत्रदेवकी दाहिनी भुजाका विदारण ( भीष्म० ९५ । ७३ ) ।
  • भीमसेनके सारथि विशोककी मूर्च्छा ( भीष्म० ९५ । ७३ ) ।
  • सात्यकिके साथ इसका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० १११ । ७-१३ ) ।
  • भीमसेन और अर्जुनके साथ युद्ध ( भीष्म० अध्याय ११३ से ११५ ) ।
  • अर्जुनके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११६ । ५६-६० ) ।
  • द्रुपदके साथ युद्ध ( द्रोण० ४० । ४०-४२ ) ।
  • हाथीसहित अदृश्य रूप धारण करके इनके द्वारा दशार्णराजका वध ( द्रोण० २६ । ३८-३९ ) ।
  • रुचिपर्वाका वध ( द्रोण० २६ । ५२-५३ ) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध ( द्रोण० २८ । १४ से २९ अध्यायतक ) ।
  • अर्जुनपर वैष्णवास्त्रका प्रयोग ( द्रोण० २९ । १७ ) ।
  • अर्जुनद्वारा इसका वध ( द्रोण० २९ । ४८-५० ) ।
  • भगदत्तके बाद इसका पुत्र वृहद्बल राजा हुआ, जो अर्जुनद्वारा जीता गया था ( आश्रम० २५ । १९-२० ) ।
  • इसके पितामह शैललय तपस्यामें इन्द्रलोकमें गये थे ( आश्रम० २० । १० ) ।

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