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भरणी

  • ( सत्ताईस नक्षत्रोंमेंसे एक ) जो भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको तिलमयी धेनुका दान करता है, वह इस लोकमें बहुत-सी गौओंको तथा परलोकमें महान् यशको प्राप्त करता है ( अनु० ६४ । ३५ ) ।
  • इस नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे उत्तम आयुकी प्राप्ति होती है ( अनु० ८९ । १४ ) ।
  • चन्द्र-व्रतमें भरणी नक्षत्रको चन्द्रमाका सिर मानकर पूजा आदि करनेका विधान है ( अनु० ११० । ९ ) ।
  • (१) दुष्यन्तके द्वारा शकुन्तलाके गर्भसे उत्पन्न एक राजा । इन्हींसे भरतवंशकी प्रवृत्ति हुई तथा इन्हींसे शासित होनेके कारण इस देशका नाम भारत हुआ ( आदि० ७१ । १५-१६; आदि० ७३ । १२१ ) ।
  • इनका उत्पत्तिका वृत्तान्त ( आदि० ७१ । १५ से आदि० ७४ । २ तक ) ।
  • इन्होंने बड़े-बड़े दानवों, राक्षसों, सिंहों आदिका दमन करनेके कारण ऋषियोंने इनका नाम 'सर्वदमन' रखा था ( आदि० ७४ । ८ ) ।
  • (२) ये संयु नामक अग्निके द्वितीय पुत्र हैं । समस्त पौर्णमासयागोंमें सुवासे हविष्यके साथ घी उठाकर इन्हींके प्रथम आधार अर्पित किया जाता है । इनका नामान्तर 'पुष्टि' है ( वन० २२१ । ७ ) ।
  • (३) ये भरत नामक अग्निके पुत्र हैं ( वन० २२१ । ७ ) ।
  • ये संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं; इसलिये इनका एक नाम पुष्टिमान् है ( वन० २२३ । ७ ) ।
  • (४) ये अद्भुत नामक अग्निके पुत्र हैं, जो मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं । इनका अग्निहोत्रमें नित्य निवास है; अतः इन्हें 'नियत' भी कहते हैं ( वन० २२२ । ६ ) ।
  • (५) महाराज दशरथके पुत्र, जो कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे; श्रीराम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न इनके भाई थे ( वन० २७४ । ७-८ ) ।
  • श्रीरामके वनमें चले जानेपर कैकेयीका इन्हें ननिहालसे बुलवाकर और अकण्टक राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना ( वन० २७७ । ३१-३२ ) ।
  • इनका अपनी माताको फटकारना और उसके कुकृत्यपर फूट-फूटकर रोना ( वन० २७७ । ३३-३४ ) ।
  • इनकी चित्रकूट यात्रा ( वन० २७७ । ३५-३६ ) ।
  • श्रीरामके लौटनेपर उन्हें राज्य समर्पण करना ( वन० २७७ । ६५ ) ।

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