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भरद्वाज

  • (१) एक प्राचीन ऋषि । सप्तर्षियोंमेंसे एक । ये अर्जुनके जन्मोत्सवमें पधारे थे ( आदि० १२२ । ५१ ) ।
  • इन्हींकी कृपासे भरतको भुमन्यु नामक पुत्र प्राप्त हुआ ( आदि० ७० । २२ ) ।
  • ये भगवान् भरतकी किसी समय सद्ग्राममें रहकर कठोर तपका पालन करते थे । एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था । इसलिये वे महर्षियोंको साथ लेकर गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये गये । वहाँ पहलेसे नहाकर वस्त्र बदलती हुई घृताची अप्सराको देखकर महर्षिका वीर्य स्खलित हो गया । महर्षिने उसे उठाकर द्रोण ( कलश ) में रख दिया । उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम द्रोण रखा गया ( किन्हीं-किन्हींके मतमें सप्तर्षि भरद्वाजसे द्रोणपिता भरद्वाज भिन्न हैं ) ( आदि० १२१ । ३३—३८ ) ।
  • इन्होंने अग्नि-वेशको आग्नेयास्त्रकी शिक्षा दी ( आदि० १२१ । ३० ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें बैठकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ११ । २२ ) ।
  • इनका अपने पुत्र यवक्रीतको अभिमान न करनेका उपदेश देना ( वन० १३५ । ४४ ) ।
  • इनका पुत्रशोकके कारण विलाप करना ( वन० १३७ । १०-१८ ) ।
  • इनके द्वारा अपने मित्र रैभ्यमुनिको शाप ( वन० १३७ । १५ ) ।
  • इनका पुत्रशोकसे अग्निमें प्रवेश ( वन० १३७ । १९ ) ।
  • रैभ्यपुत्र अर्वावसुके प्रयत्नसे इनका पुनरुज्जीवन ( वन० १३८ । २२ ) ।
  • इनका द्रोणाचार्यके पास आकर युद्ध बंद करनेको कहना ( द्रोण० १९० । ३५-४० ) ।
  • भृगुजीसे सृष्टि आदिके सम्बन्धमें पूछना और उनका उत्तर प्राप्त करना ( शान्ति० अध्याय १८४ से १९२ तक ) ।
  • इनका भगवान् विष्णुकी छातीमें जलसहित हाथसे प्रहार करना ( शान्ति० ३४२ । ५४ ) ।
  • राजा दिवोदासको शरण देकर पुत्रेष्टिद्वारा उन्हें पुत्र प्रदान करना ( अनु० ३० । १० ) ।
  • वृषादर्मिसे प्रतिग्रहके दोष बताना ( अनु० ९१ । ४१ ) ।
  • अरुन्धती-से अपने शरीरकी दुर्बलताका कारण बताना ( अनु० ९३ । ६६ ) ।
  • यातुधानियोंको अपने नामकी व्याख्या सुनाना ( अनु० ९३ । ८८ ) ।
  • मृणालकी चोरीके विषयमें शपथ खाना ( अनु० ९३ । ११८—११९ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शपथ खाना ( अनु० ९४ । ३५ ) ।
  • (२) ये रांगु नामक अग्निके प्रथम पुत्र हैं ।
  • ये ब्रह्माजीके भागके द्वारा इन भरद्वाज नामक अग्निकी ही पूजा की जाती है ( वन० २११ । ५ ) ।
  • (२) एक भारतीय जनपद ( भीष्म० ९ । ६८ ) ।

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