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भीमसेन

  • ( १ ) ये महाराज पाण्डुके पुत्र तथा जनमेजयके भाई थे । इन्होंने कुरुक्षेत्रके यज्ञमें देवताओंकी कृतिया करायीं; भेंटोंके गीत गा ( आदि० ३ । १-२ ) ।
  • ( २ ) कश्यपपत्नी मुनिके गर्भसे उत्पन्न एक देवगन्धर्व ( आदि० ४५ । ४३ ) ।
  • ये अर्जुनके जन्मोत्सवमें पधारे थे ( आदि० १२१ । ५५ ) ।
  • ( ३ ) ये सोमवंशीय महाराज अविक्षित्के पौत्र तथा परीक्षित्के पुत्र थे । इनकी माताका नाम सुयशा था । इनके द्वारा केकय देशकी राजकुमारी 'कुमारी'के गर्भसेप्रतिश्रवाका जन्म हुआ ( आदि० ९४ । ५२-५५; आदि० ९५ । ४२-४३ ) ।
  • ( ४ ) ये महाराज पाण्डुके क्षेत्रज पुत्र हैं । वायुदेवके द्वारा कुन्तिके गर्भसे इनका जन्म हुआ था । इनके जन्मकालमें आकाशवाणी हुई कि यह कुमार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है ( आदि० १२२ । १५-१५ ) ।
  • जन्मके दसवें दिन ये माताकी गोदसे एक शिलाखण्डपर गिर पड़े और इनके शरीरकी चोटसे वह शिला चूर-चूर हो गयी ( आदि० १२२ । १५ के बाद दाक्षिणात्य पाठसे १८ तक ) ।
  • इनके जन्मकालीन ग्रहोंकी स्थिति ( आदि० १२२ । १६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंद्वारा इनका नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । १९-२० ) ।
  • वसुदेवके पुरोहित काश्यपके द्वारा इनके उपनयनादि-संस्कार सम्पन्न हुए तथा इन्होंने राजर्षि शुकसे गदायुद्धकी शिक्षा प्राप्त की ( आदि० १२३ । २१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ३६९ ) ।
  • द्रोणाचार्यने इन ( पाण्डवों ) को अस्त्र-शस्त्रकी शिक्षा देना ( आदि० १२९ । ४, ९ ) ।
  • इनके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे सुतसोमका जन्म ( आदि० ९५ । ७५ ) ।
  • इनके द्वारा काशिराजकी पुत्री वलन्धराके गर्भसे 'सर्वग' की उत्पत्ति ( आदि० ९५ । ७७ ) ।
  • इनके द्वारा बाल-क्रीडाओंमें धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी पराजय ( आदि० १२७ । १४-२४ ) ।
  • दुर्योधनका इन्हें विष मिला हुआ भोजन कराना और मूर्च्छित होकर लताओंसे बाँधकर गङ्गाजलमें फेंकना ( आदि० १२७ । ४५-५४ ) ।
  • मूर्च्छितावस्थामें इनका नागलोकमें पहुँचता और वहाँ सर्पोंके डँसनेसे खाये हुए विषके दूर होनेपर अपना पराक्रम प्रकट करना ( आदि० १२७ । ५५-५९ ) ।
  • नागलोकमें आर्यक नाग- द्वारा आलिङ्गन और आर्यककी प्रेरणासे नागराज वासुकि की आज्ञासे इनके द्वारा आठ कुण्डोंका दिव्य रसपान, जिससे इन्हें एक हजार हाथियोंके बलकी प्राप्ति हुई ( आदि० १२७ । ६२-७१ ) ।
  • आठवें दिन रसके पच जानेपर इनका जागना और नागोंद्वारा इनका मङ्गला- चारपूर्वक स्वागत-सत्कार तथा दस हजार हाथियोंके समान बलशाली होनेका वरदान देकर इन्हें पुनः ऊपर पहुँचा देना ( आदि० १२८ । २०-२८ ) ।
  • इनका नागलोकसे लौटकर माताको प्रणाम करना तथा भाइयोंसे मिलना ( आदि० १२८ । २९-३० ) ।
  • गदायुद्धमें इनका प्रवीण होना ( आदि० १३१ । ६१ ) ।
  • हस्तिनापुरकी रङ्गभूमिमें परीक्षाके समय दुर्योधनके साथ गदायुद्ध एवं अश्वत्थामा- द्वारा उस युद्धका निवारण ( आदि० १३४ । १-५ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णका तिरस्कार ( आदि० १३६ । ६-७ ) ।
  • कर्णका पक्ष लेकर दुर्योधनका इनपर आक्षेप करना ( आदि० १३६ । १०-१६ ) ।
  • इनके द्वारा द्रुपदकी गजसेनाका संहार ( आदि० १३७ । ३१-३५ ) ।
  • बलरामजीसे इनका गदायुद्धविषयक शिक्षा ( आदि० १३८ । ५ ) ।
  • इनके द्वारा लाक्षागृहका जलाया जाना ( आदि० १४१ । १० ) ।
  • सुरंगसे निकल भागते समय इनके द्वारा मार्गमें थके हुए भाइयों एवं माताका परिवहन ( आदि० १४० । २०-२१ ) ।
  • धरतीपर सोये हुए भाइयों एवं माताको देखकर इनका विलाप करना ( आदि० १४० । २१-४५ ) ।
  • हिडिम्बवनमें इनका जागरण करना ( आदि० १४० । ४४-४५ ) ।
  • हिडिम्बाके साथ वार्ता- लाप करना ( आदि० १४१ । ३२-३६ ) ।
  • हिडिम्बासुर- के साथ इनका युद्ध ( आदि० १४२ । ३८-४५ ) ।
  • इनके द्वारा हिडिम्बाका वध ( आदि० १४३ । ३२ ) ।
  • हिडिम्बाको मारनेके लिये इनका उद्यत होना तथा युधिष्ठिरका इन्हें रोकना ( आदि० १४४ । १-२ ) ।
  • हिडिम्बाको पुत्र दान करनेके लिये इन्हें माताका आदेश प्राप्त होना ( आदि० १४४ । १८ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • हिडिम्बाके साथ इनकी शर्त ( आदि० १४४ । २० ) ।
  • हिडिम्बाके साथ इनका विहार ( आदि० १४४ । २१-३० ) ।
  • इनके द्वारा हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कचका जन्म ( आदि० १४४ । ३१ ) ।
  • एकचक्रामें निवास करते समय पूरी भिक्षाका आधा भाग इनके उपभोगमें आता था ( आदि० १४६ । ६ ) ।
  • ब्राह्मणका उपकार करनेके लिये इन्हें माता कुन्तीकी आज्ञा ( आदि० १६० । २० ) ।
  • इनका भोजन-सामग्री लेकर वकासुरके पास जाना और स्वयं ही भोजन करते हुए उसे पुकारना ( आदि० १६२ । ५-५ ) ।
  • वकासुरका आना और कुपित होकर इनके साथ युद्ध छेड़ना ( आदि० १६२ । ६-२८ ) ।
  • इनके द्वारा वकासुरका वध ( आदि० १६३ । १ ) ।
  • इनके द्वारा मनुष्योंकी हिंसा न करनेकी शर्तपर वकके परिवारको जीवनदान देना ( आदि० १६३ । २-४ ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें आये हुए राजाओंके साथ ब्राह्मणवेषमें युद्ध करते समय इनका श्रीकृष्णद्वारा बलरामजीको परिचय देना ( आदि० १६६ । १४-२१ ) ।
  • स्वयंवरके अवसर- पर शल्यके साथ इनका युद्ध और इनके द्वारा शल्यकी पराजय ( आदि० १६९ । २३-२९ ) ।
  • द्रौपदीके साथ इनका विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १७० । १३ ) ।
  • मयासुरद्वारा इनको गदाकी भेंट ( सभा० ३ । १८- २१ ) ।
  • जरासंधवधके विषयमें इनकी युधिष्ठिर और श्रीकृष्णके साथ बातचीत ( सभा० १५ । ११-१३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • जरासंधवधके लिये युधिष्ठिर और अर्जुनके साथ इनकी मगधयात्रा ( सभा० २० अध्याय ) ।
  • जरासंधके साथ इनका मल्लयुद्ध एवं श्री- कृष्णका जरासंधको चीरनेके लिये इन्हें संकेत करना ( सभा० २२ । १० से २४ । ६ तक ) ।
  • इनका जरासंधको वीर डालना ( सभा० २४ । ७ ) ।
  • जरासंधके पुनः जीवित हो जानेपर श्रीकृष्णद्वारा इन्हें पुनः संकेतकी प्राप्ति और उस संकेतके अनुसार इनका जरासंधको चीरकर दो दिशाओंमें फेंक देना ( सभा० २४ । ७ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनका पूर्वदिशाके प्रदेशोंको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना ( सभा० २९ अध्याय ) ।
  • भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों और राजाओंको जीतकर भारी धन- सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थ लौटना ( सभा० ३० अध्याय ) ।
  • प्रथम पूजाके अवसरपर भीष्म तथा श्रीकृष्णकी निन्दा करनेपर शिशुपालको मारनेके लिये इनका उद्यत होना और भीष्मजीका इन्हें शान्त करना ( सभा० ४२ अध्याय ) ।
  • राजसूय यज्ञकी समाप्तिपर ये भीष्म तथा धृतराष्ट्रको पहुँचाने गये थे ( सभा० ४५ । ४८ ) ।
  • दुष्ट कौरवोंद्वारा भरी सभामें द्रौपदीके अपमान किये जानेपर इनका कुपित होकर युधिष्ठिरकी भुजाओंको जलानेके लिये कहना ( आदि० ६८ । ६ ) ।
  • इनके द्वारा दुःशासनकी छाती फाड़कर उसके रक्त पीनेकी भीषण प्रतिज्ञा ( सभा० ६८ । ५२-५३ ) ।
  • इनके रोषपूर्ण उद्गार ( सभा० ७० । १२-१७ ) ।
  • दुर्योधनकी जाँघ तोड़ देनेके लिये इनकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७१ । १४ ) ।
  • इनका द्यूतसभामें समस्त शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत होना ( सभा० ७२ । १०-११ ) ।
  • दुःशासनके उपहास करनेपर उसे मारनेके लिये इनकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७७ । १६-१८ ) ।
  • दुःशासनका रक्त पीने तथा धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका वध करनेके लिये इनकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७७ । २०-२२ ) ।
  • दुर्योधनको मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना ( सभा० ७७ । २६-२८ ) ।
  • इनका अपनी भुजाओंकी ओर देखते हुए वन-गमन करना ( सभा० ८० । ४ ) ।
  • किर्मीरके साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा उसका वध ( वन० ११ । २२-२६ ) ।
  • इनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करते हुए युधिष्ठिरसे युद्ध छेड़नेके लिये अनुरोध ( वन० ३३ अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको युद्ध करनेके लिये उत्साहित करना ( वन० ३५ अध्याय ) ।
  • इनकी अर्जुनके लिये चिन्ता ( वन० ८० । १७-१९ ) ।
  • इनका गन्धमादन पर्वतपर चढ़नेका उत्साह प्रकट करना ( वन० १४० । १४-१७ ) ।
  • गन्धमादनकी यात्रा में इनके द्वारा घटोत्कचका स्मरण किया जाना ( वन० १४१ । २४ ) ।
  • इनका सौगन्धिक पुष्पके लानेके लिये प्रस्थान करना ( वन० १४६ । १ ) ।
  • कदलीवनमें इनकी हनुमान्‌जीसे भेंट ( वन० १४७ । ८६ ) ।
  • इनका हनुमान्‌जीके साथ संवाद ( वन० अध्याय १४७ से १५० तक ) ।
  • इन्हें हनुमान्‌जीका आश्वासन ( वन० १५१ । १६-१९ ) ।
  • भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना ( वन० १५२ अध्याय ) ।
  • इनका सौगन्धिक सरोवरके पास पहुँचना ( वन० १५३ । १० ) ।
  • इनका क्रोधवश नामक राक्षसके साथ युद्ध और उन्हें पराजित करके सौगन्धिक पुष्प तोड़ना ( वन० १५४ । १८-२३ ) ।
  • जटासुरके साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा उसका वध ( वन० १५५ । ५६-७० ) ।
  • हिमालयके शिखरपर यक्षों और राक्षसोंके साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा राक्षसराज मणिमान्‌का वध ( वन० १६० । ४९-७० ) ।
  • इनका गन्धमादनसे प्रस्थान करनेके लिये युधिष्ठिरसे वार्तालाप ( वन० १७१ । १-१६ ) ।
  • अजगरद्वारा इनका पकड़ा जाना ( वन० १७८ । २८ ) ।
  • अजगरद्वारा पकड़े जानेपर उससे संवाद-रूपमें इनका विलाप करना ( वन० १७९ । २५-३८ ) ।
  • अजगररूपधारी नहुषके चंगुलसे इनका छुटकारा पाना ( वन० १८१ । ४३ ) ।
  • चित्रसेनद्वारा दुर्योधनके पकड़े जानेपर इनकी कटु-उक्ति ( वन० २४२ । १५-२१ ) ।
  • इनके द्वारा कोटिकास्यका वध ( वन० २७१ । २६ ) ।
  • जयद्रथको पकड़ उसके बाल काटकर पाँच चोटियाँ रखना और महाराज युधिष्ठिरका दास घोषित करना ( वन० २७२ । ११-११ ) ।
  • द्वैतवनमें जल लानेके लिये जाना और सरोवरपर मूर्च्छित होना ( वन० ३१२ । ३३—४० ) ।
  • अज्ञातवासके लिये चिन्तित हुए युधिष्ठिरको उत्साहित करना ( विराट० ३ । २५-२६ ) ।
  • विराटनगरमें वल्लभ नामसे रहनेका बात बताना ( विराट० ४ । १ ) ।
  • राजा विराटसे अपने यहाँ रखनेके लिये प्रार्थना करना ( विराट० ८ । ७ ) ।
  • जीमूत नामक मल्लके साथ कुश्ती लड़ना और उसका वध करना ( विराट० १२ । २४-२६ ) ।
  • द्रौपदीसे रातमें पाकशालामें आनेका कारण पूछना ( विराट० १७ । १७-२१ ) ।
  • प्राचीन पर्वतकेतुका उदाहरणद्वारा द्रौपदीको समझाना ( विराट० २१ । १—१७ के बादतक ) ।
  • कीचकको मारनेके लिये द्रौपदीको विश्वास दिलाकर नृत्यशालामें प्रवेश करना ( विराट० २२ । १३ ) ।
  • कीचकके साथ इनका युद्ध और उसका वध करना ( विराट० २२ । ५२—८२ ) ।
  • इनके द्वारा एक सौ पाँच उपकीचकोंका वध और द्रौपदीको बन्धनमुक्त करना ( विराट० २२ । २७-२८ ) ।
  • युधिष्ठिरके आदेशसे सुशर्माको जीते-जी पकड़ लेना ( विराट० ३३ । १८ ) ।
  • युधिष्ठिरके आदेशसे सुशर्माको छोड़ना और उसे विराट्‌का दास घोषित करना ( विराट० ३३ । ५९ ) ।
  • संजयद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । १९—२५ ) ।
  • श्रीकृष्णसे इनका शान्तिविषयक प्रस्ताव करना ( उद्योग० ७५ अध्याय ) ।
  • अपने बलका वर्णन करते हुए श्रीकृष्णको उत्तर देना ( उद्योग० ७६ अध्याय ) ।
  • शिखण्डीको प्रधान सेनापति बनानेका प्रस्ताव करना ( उद्योग० १५१ । २९-३२ ) ।
  • उल्लूकसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर देना ( उद्योग० १६० । २७-२९ ) ।
  • उल्लूकसे दुर्योधनके संदेशका उत्तर देना ( उद्योग० १६३ । ३२—३६ ) ।
  • कवच उतार-कर पैदल ही कौरव-सेनाकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरसे उसका कारण पूछना ( भीष्म० ४३ । १७ ) ।
  • इनकी विकट गर्जनाका भयंकर रूप ( भीष्म० ४४ । ८—१३ ) ।
  • प्रथम दिनके युद्धारम्भमें दुर्योधनके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । १९-२० ) ।
  • कलिंगोंके साथ युद्ध करते समय इनके द्वारा शक्रदेवका वध ( भीष्म० ५४ । ३५ ) ।
  • इनके द्वारा भानुमान्‌का वध ( भीष्म० ५४ । ३५ ) ।
  • कलिंगराज श्रुतायुके चक्ररक्षक सत्यदेव और सत्यका इनके द्वारा वध ( भीष्म० ५४ । ७६ ) ।
  • इनके द्वारा केतुमान्‌का वध ( भीष्म० ५५ । ७७ ) ।
  • गज-सेनाका संहार करके रक्तनदीका निर्माण करना ( भीष्म० ५४ । १०३ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय ( भीष्म० ५८ । १६—१९ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी राजसेनाका संहार ( भीष्म० ६२ । ४९—६५ ) ।
  • इनका अद्भुत पराक्रम और भीष्मके साथ युद्ध ( भीष्म० ६३ । १—१६ ) ।
  • धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ इनका युद्ध और इनके द्वारा सेनापति, जलसंध, सुषेण, उग्र, वीरबाहु, भीम, भीमरथ और सुलोचन—इन आठ धृतराष्ट्रपुत्रोंका वध ( भीष्म० ६४ । ३२—३६ ) ।
  • इनका घमासान युद्ध ( भीष्म० ७० अध्याय ) ।
  • भीष्मके साथ इनका घोर युद्ध ( भीष्म० ७२ । २१—२४ ) ।
  • दुर्योधनके साथ इनका युद्ध ( भीष्म० ७३ । १०—२३ ) ।
  • धृत- राष्ट्रपुत्रोंपर आक्रमण करके घोर पराक्रम प्रकट करना ( भीष्म० ७७ । ६—३६ ) ।
  • इनके द्वारा कृत- वर्माकी पराजय ( भीष्म० ८२ । ६०—६१ ) ।
  • इनका अद्भुत पुरुषार्थ ( भीष्म० ८५ । ३२—४० ) ।
  • भीष्मके सारथिको मारकर उन्हें युद्ध मैदानसे विलग कर देना ( भीष्म० ८८ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रके आठ पुत्रोंका वध ( भीष्म० ८८ । १९—२९ ) ।
  • इनके द्वारा गजसेनाका संहार ( भीष्म० ९१ । २६— ३१ ) ।
  • इनके प्रहारसे द्रोणाचार्यका मूर्च्छित होना ( भीष्म० ९४ । १८—१९ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रके नौ पुत्रोंका वध ( भीष्म० ९६ । २३—२७ ) ।
  • इनके द्वारा गजसेनाका संहार ( भीष्म० १०२ । २९—३९ ) ।
  • इनके द्वारा बाह्लीकी पराजय ( भीष्म० १०४ । १८—२० ) ।
  • भूरिश्रवाके साथ द्वन्द्वयुद्ध करना ( भीष्म० ११७ । १०—११; भीष्म० १११ । ४४—४५ ) ।
  • इनका दस प्रमुख महारथियोंके साथ युद्ध करना और अद्भुत पराक्रम दिखाना ( भीष्म० अध्याय ११२ से ११३ तक ) ।
  • इनके द्वारा गजसेनाका संहार ( भीष्म० ११६ । ३०—३१ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । १३— १४ ) ।
  • विविंशतिके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० २७ । २९—३० ) ।
  • शल्यके साथ गदायुद्धमें उनको पराजित करना ( द्रोण० १५ । ८—३२ ) ।
  • इनके रथके घोड़ों- का वर्णन ( द्रोण० २२ । ३ ) ।
  • दुर्मर्षणके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० २५ । ५—७ ) ।
  • इनके द्वारा म्लेच्छ- जातीय राजा अङ्गका वध ( द्रोण० २६ । १७ ) ।
  • भगदत्त और उनके गजराजके साथ युद्धमें पराजित होकर भागना ( द्रोण० २६ । १९—२९ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णपर धावा करना और उसके पंद्रह योद्धाओंका एक साथ वध कर देना ( द्रोण० २९ । ६३—६४ ) ।
  • चक्रव्यूहमें साथ चलनेके लिये अभिमन्युको आश्वासन ( द्रोण० ३५ । २२—२३ ) ।
  • अर्जुनद्वारा की गयी जय- द्रथ-वधकी प्रतिज्ञाका अनुमोदन करना ( द्रोण० ७३ । ५३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • चित्रसेन, विविंशति और विकर्णके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० ९६ । ३१ ) ।
  • अलम्बुषके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० १०६ । १६— १७ ) ।
  • इनके द्वारा अलम्बुषकी पराजय ( द्रोण० १०८ । ४२ ) ।
  • माल्यविके साथ अर्जुनका समाचार लानेके लिये जाते समय सात्यकिके कहनेसे युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौट आना ( द्रोण० ११२ । १०० - ०६ ) ।
  • कृतवर्माके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० ११४ । ६७—८० ) ।
  • पराजय हुए युधिष्ठिरको सान्त्वना देना ( द्रोण० १२१ । ३२—३४ ) ।
  • वृष्टद्युम्नको युधिष्ठिरकी रक्षाका भार सौंपना ( द्रोण० १२७ । ४—९ ) ।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञासे अर्जुनके पास जानेके लिये प्रस्थान करना ( द्रोण० १२७ । १२९ ) ।
  • इनके द्वारा द्रोणा- चार्यकी पराजय ( द्रोण० १२७ । ४२—५४ ) ।
  • इनके द्वारा कुण्डभेदी, सुषेण, दीर्घलोचन, वृन्दारक, अभय, रौद्रकर्मा, दुर्विमोचन, विन्द, अनुविन्द, सुवर्मा और सुदर्शनका वध ( द्रोण० १२७ । ६०—६७ ) ।
  • इनके द्वारा रथसहित द्रोणाचार्यका आठ बार फेंका जाना ( द्रोण० १२८ । २८—२९ ) ।
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास पहुँचकर युधिष्ठिरको सूचना देनेके लिये सिंहनाद करना ( द्रोण० १२८ । ३२ ) ।
  • कर्णके साथ इनका युद्ध और उसे पराजित करना ( द्रोण० १२९ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा दुःशलाका वध ( द्रोण० १३१ । ३१ के बाद ) ।
  • कर्णके साथ युद्ध और उसे पराजित करना ( द्रोण० १३२ अध्याय ) ।
  • कर्णके साथ घोर युद्ध ( द्रोण० अध्याय १३३ से १३३ तक ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध ( द्रोण० १३३ । ४१—४२ ) ।
  • कर्णके साथ युद्ध और इनको परास्त करना ( द्रोण० १३४ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा धृत- राष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध ( द्रोण० १३४ । २०—२१ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्मर्षण, दुःसह, दुर्मद, दुर्धर ( दुराधर ) और जयका वध ( द्रोण० १३५ । ३०—३६ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णकी पराजय ( द्रोण० १३६ । १७ ) ।
  • इनके द्वारा चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, चित्रांगद और चित्रसेनका वध ( द्रोण० १३६ । २०—२२ ) ।
  • कर्णके साथ इनका घोर युद्ध ( द्रोण० १३७ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र ( चित्रवाण ), चित्रांगद ( अग्रायुध ), दृढ ( दृढवर्मा ), चित्रसेन ( उग्रसेन ) और विकर्णका वध ( द्रोण० १३७ । २९—३० ) ।
  • कर्णके साथ इनका भयंकर युद्ध ( द्रोण० १३८ अध्याय ) ।
  • कर्णके साथ इनका भयंकर युद्ध और उसे परास्त करना ( द्रोण० १३९ । ९ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णके बहुत-से धनुषोंका काटा जाना ( द्रोण० १३९ । १९—२२ ) ।
  • अस्त्रहीन होनेपर कर्णको पकड़नेके लिये इनका उनके रथपर चढ़ जाना ( द्रोण० १३९ । ७४—७५ ) ।
  • कर्णके प्रहारसे इनका मूर्च्छित होना ( द्रोण० १३९ । ९९ ) ।
  • अर्जुनसे कर्णको मारनेके लिये कदना ( द्रोण० १४८ । ३-६ ) ।
  • इनके द्वारा पूषा और धृष्टद्युम्नके कलिङ्गराजकुमारका वध ( द्रोण० १५५ । २४ ) ।
  • इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़से ध्रुवका वध ( द्रोण० १५५ । २७ ) ।
  • इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़से जयरातका वध ( द्रोण० १५५ । २८ ) ।
  • इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़से दुर्मद ( दुर्धर्ष ) और दुष्कर्णका वध ( द्रोण० १५५ । ४० ) ।
  • इनके परिघके प्रहारसे सोमदत्तका मूर्च्छित होना ( द्रोण० १५७ । १०-११ ) ।
  • इनके द्वारा बाह्रीकका वध ( द्रोण० १५७ । १२-१५ ) ।
  • इनके द्वारा नागदत्त, दृढरथ ( दृढादव ), महाबाहु, अयोभुज ( अयोबाहु ), दृढ ( दृढक्षत्र ), सुहस्त, विरजा, प्रमाथी, उग्र ( उग्रश्रवा ) और अनुयायी ( अग्रयायी ) का वध ( द्रोण० १५७ । १६-१९ ) ।
  • इनके द्वारा शतचन्द्रका वध ( द्रोण० १५७ । २३ ) ।
  • इनके द्वारा शकुनिके भाई गवाक्ष, शरभ, विभु, सुभग और भानुदत्तका वध ( द्रोण० १५७ । २३-२६ ) ।
  • इनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करते समय कौरवसेनाको खदेड़ना ( द्रोण० १६१ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनके साथ इनका युद्ध और उसे पराजित करना ( द्रोण० १६६ । ४३-४८ ) ।
  • अलायुधके साथ इनका घोर संग्राम ( द्रोण० १७० अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा अर्जुनको प्रोत्साहन-प्रदान ( द्रोण० १८६ । ९-११ ) ।
  • धृष्टद्युम्नको उपालम्भ देना ( द्रोण० १८६ । ५१-५४ ) ।
  • कर्णके साथ युद्धमें उसमें पराजित होना ( द्रोण० १८८ । १०-२२ ) ।
  • कर्णके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० १८९ । ५०-५५ ) ।
  • अश्वत्थामा नामक हाथीको मारकर द्रोणाचार्यको अश्वत्थामाके मारे जानेकी झूठी खबर सुनाना ( द्रोण० १९० । १५-१६ ) ।
  • द्रोणाचार्यको उपालम्भ देते हुए अश्वत्थामाकी मृत्यु बताना ( द्रोण० १९२ । ३०-४२ ) ।
  • अर्जुनसे अपना वीरोचित उद्गार प्रकट करना ( द्रोण० १९७ । ३-२२ ) ।
  • धृष्टद्युम्नसे बाणोंद्वारा लड़ते हुए सात्यकिको पकड़कर शान्त करना ( द्रोण० १९८ । ५०-५२ ) ।
  • इनका वीरोचित उद्गार और नारायणास्त्रके विरुद्ध संग्राम करना ( द्रोण० १९९ । ४५-६३ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ इनका घोर युद्ध और सारथिके मारे जानेपर युद्धसे हट जाना ( द्रोण० २०० । ८०-८६ ) ।
  • इनके द्वारा कुरुक्षेत्रनरेश क्षेमपूर्तिका वध ( द्रोण० २०१ । २४-४४ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ इनका घोर युद्ध और उसके प्रहारसे मूर्च्छित होना ( कर्ण० १२ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध ( कर्ण० ४८ । २० ) ।
  • कर्णको पराजित करके उसकी जीभ काटनेको उद्यत होना ( कर्ण० ५० । ४७ के बादतक ) ।
  • कर्णके साथ इनका घोर युद्ध और गजसेना, रथसेना तथा घुड़सवारोंका वध ( कर्ण० ५१ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा त्रिविसु, विकट, सम, क्रथ ( क्रथन ), नन्द और उपनन्दका वध ( कर्ण० ५१ । १२-१५ ) ।
  • इनके द्वारा कौरवसेनाका महान् संहार ( कर्ण० ५६ । ७०-८१ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय और गजसेनाका संहार ( कर्ण० ६१ । ५३, ६२-७४ ) ।
  • युद्धका सारा भार अपने ऊपर लेकर अर्जुनको युधिष्ठिरके पास भेजना ( कर्ण० ६५ । १० ) ।
  • अपने सारथि विशोकके साथ इनका कौरवसेनाका भीषण संहार और शकुनिकी पराजय ( कर्ण० ७० । २४-७०; कर्ण० ८१ । २४-३५ ) ।
  • दुःशासनके साथ इनका घोर युद्ध ( कर्ण० ८२ । ३३ से कर्ण० ८३ । १० तक ) ।
  • दुःशासनका वध करके उसका रक्त पान करना ( कर्ण० ८३ । २८-२९ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रके दस पुत्रों ( निषङ्गी, कवची, पाशी, दण्डधार, धनुर्ग्रह, अलोलुप, शल, संघ ( सत्यसंध ), वातवेग और सुवर्चा ) का वध ( कर्ण० ८४ । २-६ ) ।
  • कर्णवधके लिये अर्जुनको प्रोत्साहन देना ( कर्ण० ८४ । ३७-४२ ) ।
  • इनके द्वारा पचीस हजार पैदल सेनाका वध ( कर्ण० ९३ । २८ ) ।
  • इनके द्वारा कृतवर्माकी पराजय ( शल्य० ११ । ४५-४७ ) ।
  • इनका शल्यको पराजित करना ( शल्य० ११ । ६१-६२ ) ।
  • शल्यके साथ इनका गदायुद्ध ( शल्य० १२ । १२-२७ ) ।
  • शल्यके साथ इनका घोर युद्ध ( शल्य० १३ अध्याय; शल्य० १५ । १६-२७ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय ( शल्य० १६ । ४२-४४ ) ।
  • इनके द्वारा शल्यके सारथि और घोड़ोंका वध ( शल्य० १७ । २७ ) ।
  • इनके द्वारा इक्कीस हजार पैदल सेनाका वध ( शल्य० १७ । ४९-५० ) ।
  • इनके द्वारा गजसेनाका संहार ( शल्य० २५ । ३०-३६ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रों ( दुर्भर्षण, श्रुतान्त ( चित्राङ्ग ), जैत्र, भूरीबल ( भीमबल ), रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विग्रह ( दुर्विषाह ), दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष ( दुष्प्रधर्षण ), श्रुतवाँ ) का वध ( शल्य० २६ । ३-२२ ) ।
  • धृतराष्ट्रपुत्र सुदर्शनका इनके द्वारा वध ( शल्य० २७ । ४९-५० ) ।
  • गदायुद्धके प्रारम्भमें दुर्योधनको चेतावनी देना ( शल्य० ३३ । ४३-४५ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरसे अपना उत्साह प्रकट करना ( शल्य० ५६ । १६-२७ ) ।
  • दुर्योधनको चेतावनी देना ( शल्य० ५६ । २९-३६ ) ।
  • दुर्योधनके माथ भयंकर गदायुद्ध ( शल्य० ५७ अध्याय ) ।
  • गदाप्रहारमें दुर्योधनकी जंघ तोड़ देना ( शल्य० ५८ । ४७ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनका तिरस्कार करके उसके मस्तकको पैरसे ठुकराना ( शल्य० ५१ । १४-१२ ) ।
  • युधिष्ठिरके साथ विजयसूचक वार्तालाप करना ( शल्य० ६० । ४३-४६ ) ।
  • दुर्योधनको गिरानेके पश्चात् पाण्डवोंकेद्वारा इनकी प्रशंसा ( शल्य० ६१ । ७-१६ ) ।
  • अश्वत्थामाको मारनेके लिये इनका प्रस्थान करना ( मौसल० ११ । २८-३८ ) ।
  • ब्रह्मास्त्रपर व्यंग्यके साथ पैद हुए अश्वत्थामाका ललकारना ( मौसल० १३ । १६-१७ ) ।
  • अश्वत्थामाका मणि और द्रोणका देह इन शमन करना ( मौसल० १३ । २६-३३ ) ।
  • अपनी भलाई देते हुए गांधारीके समक्ष माँगना ( स्त्री० १५ । २-११; १५-२० ) ।
  • संन्यासका विरोध करके कर्तव्यपालनपर जोर देते हुए युधिष्ठिरको समझाना ( शान्ति० १० अध्याय ) ।
  • भीमसेनका पुनः दुःखोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये युधिष्ठिरको प्रेरित करना ( शान्ति० १६ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा युवराजपदपर इनकी नियुक्ति ( शान्ति० ४१ । १ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इन्हें दुर्योधनका महल रहनेके लिये दिया गया ( शान्ति० ४४ । ६-७ ) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर भीमसेनका चित्रधर्ममें कामकी प्रधानता बताना ( शान्ति० १६० । २७-४० ) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर शंकरजीको आराधनाद्वारा मृतकके छोड़ हुए धनको लेनेके दो सलाह देना ( आश्रम० १३ । ११-१५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञामें राज्य और नगरकी रक्षाके लिये नकुलादिको सहित भीमसेनकी नियुक्ति ( आश्रम० ३२ । १९ ) ।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञामें भीमसेनका ब्राह्मणोंके साथ जाकर यज्ञभूमिको नपवाना और वहाँ यज्ञमण्डप, सैकड़ों निवासस्थान तथा ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये उत्तम भवनोंका शिल्पशास्त्रके अनुसार निर्माण कराना, साथ ही राजाओंको निमन्त्रण करनेके लिये दूत भेजना ( आश्रम० ८० । १-११ ) ।
  • युधिष्ठिरका भीमसेनको समागत राजाओंकी पूजा करनेका आदेश ( आश्रम० ८६ । १-३ ) ।
  • वज्रवाहनका इनके चरणोंमें प्रणाम करना और भीमसेनका उसे सत्कारपूर्वक प्रचुर धन देना ( आश्रम० ८८ । ६-११ ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा जाते समय भीमसेनका उनके रथपर चढ़कर उनके ऊपर छत्र लगाना ( आश्रम० ९२ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ६३८ ) ।
  • भीमसेनका राजा धृतराष्ट्रके प्रति अमर्ष और दुर्भाव, अपने कृतज्ञ पुरुषों द्वारा धृतराष्ट्रकी आज्ञाको भंग कराना, उग्र दुःशासन, दुर्योधन और दुःशासन आदिका दमन करनेवाले इन्हीं चन्दनचर्चित भुजाओंके बलकी प्रशंसा करना तथा धृतराष्ट्र और गान्धारीके मनमें उद्वेग पैदा करना ( आश्रम० ९३ । ३-१२ ) ।
  • धृतराष्ट्रके द्वारा श्राद्धके लिये धन माँगे जानेपर भीमसेनद्वारा विरोध ( आश्रम० ११ । ७-२४ ) ।
  • अर्जुनका भीमसेनको समझाना ( आश्रम० १२ । १-२ ) ।
  • भीमसेनके साथ वनमें जाते समय कुन्तीका युधिष्ठिरको भीमसेन आदिके साथ मनोरंजक बर्ताव करनेका आदेश देना ( आश्रम० १४ । १ ) ।
  • भीमसेनका गजारोहणकी सेनाके साथ गङ्गा तटपर पहुँचकर और कुन्ती आदिसे मिलनेके लिये भाइयों सहित वनको जाना ( आश्रम० २३ । १ ) ।
  • भीमसेन आदिका देख कुन्तीका उतावलेके साथ आगे बढ़ना ( आश्रम० २४ । ११ ) ।
  • संजयका धृतराष्ट्रसे भीमसेन और उनकी पत्नियोंका परिचय देना ( आश्रम० २४ । ६-१२ ) ।
  • भीमसेनका अपने भाइयोंसे महाप्रस्थानका निश्चय करके जानेके लिये अपने आभूषण उतारना और उनके साथ महाप्रस्थान करना ( महाप्रस्थान० १ । २०-२५ ) ।
  • मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल और अर्जुनके क्रमशः गिरनेपर इनका युधिष्ठिरसे कारण पूछना; फिर इनका स्वयं भी गिरना और युधिष्ठिरसे अपने पतनका कारण पूछना ( महाप्रस्थान० २ अध्याय ) ।
  • स्वर्गमें इनका मरुद्गणोंसे घिराकर वसुदेवके सम विराजमान दिखायी देना ( स्वर्ग० ४ । ७-८ ) ।

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