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भीष्म

  • इनके द्वारा अप्सरा ही गङ्गाका भागका अवरोध करके अम्बिकाका अपहरण करना ( आदि० १०० । २६ ) ।
  • सत्यवतीका परिचय देना एवं प्रशंसा करना ( आदि० १०० । ३३-४० ) ।
  • इनका युवराज पदपर अभिषेक ( आदि० १०० । ४३ ) ।
  • पिताकी दुखी देख कर उनके लिये सत्यवतीसे मत्स्यवतीकी याचना करना ( आदि० १०० । ७५ ) ।
  • पिताके मनोरथकी पूर्तिके लिए 'मत्स्यवतीकुमार ही राजा होगा' इस प्रकारकी इनकी दुष्कर प्रतिज्ञा ( आदि० १०० । ८७ ) ।
  • समस्त देवताओं तथा ऋषियोंको साक्षी देते हुए इनकी आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य रहनेकी भीषण प्रतिज्ञा ( आदि० १०० । ९४-९६ ) ।
  • इनके ऊपर देवताओंद्वारा पुष्प वर्षा और इनका 'भीष्म' नाम रखा जाना ( आदि० १०० । ९८ ) ।
  • पिताद्वारा इनको स्वच्छन्द-मृत्युका वरदान ( आदि० १०० । १०२ ) ।
  • इनके द्वारा चित्राङ्गदका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना ( आदि० १०१ । ११ ) ।
  • स्वयंवरमें आये हुए शाल्व आदि विभिन्न राजाओंको जीतकर इनका काशीराजकी कन्याओंका विचित्रवीर्यके लिये अपहरण करना ( आदि० १०२ । ११—१८ ) ।
  • इनके द्वारा अष्टविध विवाहोंके स्वरूपका वर्णन ( आदि० १०२ । १९—२५ ) ।
  • विचित्रवीर्यका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना ( आदि० १०२ । २३ ) ।
  • सत्यवतीका इनसे राज्यासनपर आरूढ़ होने, वंशरक्षाके लिये अम्बिका आदिके गर्भसे पुत्रोत्पादन करने एवं विवाहके लिये अनुरोध करना ( आदि० १०३ । १०—११ ) ।
  • किसी भी परिस्थितिमें किसी भी मूल्यपर सत्यको न छोड़ने तथा स्त्री-सहवास न करनेकी इनकी घोषणा ( आदि० १०३ । १२—१८ ) ।
  • विचित्रवीर्यके क्षेत्र ( पत्नियों ) से ब्राह्मणद्वारा संतानोत्पत्तिके लिये सत्यवतीको परामर्श देना ( आदि० १०४ । १२ ) ।
  • इनके प्रति सत्यवतीकी ( व्यास-जन्मसम्वन्धी ) आत्मकथा ( आदि० १०४ । ५—१६ ) ।
  • विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंसे व्यासद्वारा संतानोत्पत्तिके लिये इनकी सत्यवतीको सलाह ( आदि० १०४ । १८—१९ ) ।
  • इनके द्वारा सत्यवतीके इस प्रस्तावका अनुमोदन ( आदि० १०४ । २२—२३ ) ।
  • धृतराष्ट्रके प्रति गांधारीका समर्पित करनेके लिये इनका सुबलके पास दूत भेजना ( आदि० १०५ । ११ ) ।
  • मद्रराजके नगरमें जाकर इनका शल्यसे पाण्डुके लिये माद्रीकी याचना करना ( आदि० ११२ । २—७ ) ।
  • मद्रराजद्वारा इनसे शुल्क लेकर माद्रीको पाण्डुके लिये समर्पण करना ( आदि० ११२ । १४—१६ ) ।
  • इनके द्वारा राजा देवककी कन्या को लाकर विदुरका विवाह सम्पन्न कराना ( आदि० ११३ । १२—१३ ) ।
  • शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंद्वारा इनको पाण्डुके परलोकवासी तथा माद्रीके सती होनेका समाचार बताकर पाण्डवोंके जन्मका वृत्तान्त सुनाना ( आदि० १२५ । २२—२३ ) ।
  • पाण्डुके निधनपर इनका शोक प्रकट करना तथा उन्हें जलाञ्जलि देना ( आदि० १२६ । २०—२८ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डुका श्राद्ध सम्पन्न होना ( आदि० १२७ । १ ) ।
  • राजकुमारोंकी शिक्षाके लिये सुयोग्य आचार्यकी खोज करना ( आदि० १२९ । २४—२६ ) ।
  • राजकुमारोंकी शिक्षाके लिये इनका द्रोणाचार्यको अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना ( आदि० १३० । ७०—७१ ) ।
  • पाण्डवोंके जतुगृहमें जलनेका समाचार सुनकर इनका विलाप करना और पाण्डवोंको जलाञ्जलि देनेके लिये उद्यत हुए भीष्मको विदुरका उनके जीवित रहनेका रहस्य बतलाकर आश्वासन देना तथा जलाञ्जलि निषेध करना ( आदि० १४५ । १८ के बाद दा० पाठ ) ।
  • भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह ( आदि० २०३ अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके राजसूय-यज्ञमें पधारना ( सभा० ३४ । ५ ) ।
  • कौन काम हुआ और कौन नहीं हुआ—इसकी देख-रेखके लिये युधिष्ठिरद्वारा इनकी नियुक्ति ( सभा० ३५ । ६ ) ।
  • राजसूय-यज्ञमें अग्रपूजाके अग्रपूजाके लिये इनका युधिष्ठिरको आदेश देना ( सभा० ३६ । २८—२९ ) ।
  • इनके द्वारा शिशुपालके आक्षेपोंका खण्डन करते हुए श्रीकृष्णकी महिमाका विस्तारपूर्वक वर्णन ( सभा० ३८ अध्याय ) ।
  • शिशुपालके द्वारा उपद्रव मचानेपर चिन्तित हुए युधिष्ठिरको इनका आश्वासन ( सभा० ४० अध्याय ) ।
  • शिशुपालद्वारा इनकी निन्दा ( सभा० ४१ अध्याय ) ।
  • इनका शिशुपालको मारनेसे भीमसेनको रोकना ( सभा० ४२ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा शिशुपालके जन्मका वृत्तान्त सुनाना ( सभा० ४३ अध्याय ) ।
  • इन्हें शिशुपालकी फटकार ( सभा० ४४ । ६—२२ ) ।
  • शिशुपालके वचनोंका उत्तर देना ( सभा० ४४ । ३४ ) ।
  • श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेके लिये समस्त नरेशोंको इनकी चुनौती ( सभा० ४४ । ४१—४२ ) ।
  • इनके द्वारा द्रौपदीके वचनोंका उत्तर दिया जाना ( सभा० ६९ । १७—२१ ) ।
  • इनका पुलस्त्यजीसे तीर्थयात्राके विषयमें प्रश्न करना ( वन० ८२ । ४—७ ) ।
  • दुर्योधनको समझाते हुए पाण्डवोंसे संधि करनेके लिये कहना ( वन० २५३ । ४—१० ) ।
  • युधिष्ठिरको महिमा बताते हुए पाण्डवोंके अन्वेषणके लिये इनका विराट् ( विराट० २८ अध्याय ) ।
  • कर्णकी बातोंसे कुपित हुई सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा करना ( विराट० ५१ । १—१३ ) ।
  • पाण्डवोंके अज्ञातवास-कालकी पूर्तिके विषयमें इनका निर्णय ( विराट० ५२ । १—४ ) ।
  • दुर्योधनको हस्तिनापुरकी ओर भेजकर सेनाको व्यूहबद्ध करना ( विराट० ५२ । १६—२२ ) ।
  • अर्जुनके साथ इनका अद्भुत युद्ध और मूर्च्छित होकर सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना ( विराट० ६४ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनको सेनासहित हस्तिनापुर लौट चलनेकी सलाह देना ( विराट० ६६ । २१—२२ ) ।
  • इनके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातोंका समर्थन ( उद्योग० २९ । २—७ ) ।
  • इनका कर्णको फटकारते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना ( उद्योग० २९ । १६—१७ ) ।
  • दुर्योधनको समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना ( उद्योग० ४९ । २—२८ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णका उपहास किया जाना ( उद्योग० ४९ । ३४—४२ ) ।
  • इनका कर्णपर आक्षेप करना ( उद्योग० ६२ । ७—११ ) ।
  • श्रीकृष्णको कैद करनेके सम्बन्धमें दुर्योधनकी बात सुनकर कुपित हो सभासे उठ जाना ( उद्योग० ८८ । १९—२३ ) ।
  • दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि कर लेनेके लिये समझाना ( उद्योग० १२५ । २-८ ) ।
  • दुर्योधनको पुनः समझाना ( उद्योग० १२६ अध्याय ) ।
  • सभासे उठकर जाते समय दुर्योधनकी उद्दण्डताका वर्णन करना ( उद्योग० १२८ । ३०-३२ ) ।
  • दुर्योधनको युद्ध न करनेके लिये समझाना ( उद्योग० १३८ अध्याय ) ।
  • भीष्मकी पाण्डवोंको न मारने और उनके दस हजार योद्धाओंको प्रतिदिन मारनेकी प्रतिज्ञा करके कर्णको साथ लेकर युद्ध न करनेकी बात करना ( उद्योग० १५६ । २१-२४ ) ।
  • दुर्योधनके कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका परिचय देना ( उद्योग० अध्याय १५५ से १६८ तक ) ।
  • इनका कर्णको फटकारना ( उद्योग० १६८ । ३०-३८ ) ।
  • दुर्योधनको पाण्डवपक्षके अतिरथी आदिका परिचय देना ( उद्योग० अध्याय १६९ से १७२ तक ) ।
  • दुर्योधनसे शिखण्डी और पाण्डवोंका वध न करनेको कहना ( उद्योग० १७२ । २०-२१ ) ।
  • दुर्योधनको अम्बोपाख्यान सुनाना ( उद्योग० १७३ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण ( उद्योग० १७३ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा परशुरामजीका पूजन ( उद्योग० १७८ । २७ ) ।
  • अम्बाको ग्रहण करनेके विषयमें परशुरामजीकी आज्ञा न मानना ( उद्योग० १७९ । ४२ ) ।
  • नारदजीके पास परशुरामजीकी रोषपूर्ण उत्तर देना ( उद्योग० १७८ । ४३-४४ ) ।
  • परशुरामजीके साथ युद्ध करनेके लिये कुरुक्षेत्रमें जाना ( उद्योग० १७८ । ८० ) ।
  • युद्धके अवसरपर परशुरामजीने युद्धकी आज्ञा माँगना ( उद्योग० १७९ । १४ ) ।
  • परशुरामजीके साथ इनका युद्ध ( उद्योग० १७९ । २० से १८५ अध्यायतक ) ।
  • वसुओं- द्वारा इन्हें प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति ( उद्योग० १८५ । १३ ) ।
  • देवताओं और नारदजीके मना करनेपर प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करना ( उद्योग० १८५ । ९ ) ।
  • देवता, पितर तथा गङ्गाके आग्रहसे युद्ध बंद करके परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम करना ( उद्योग० १८५ । ३५ ) ।
  • दुर्योधनको शिखण्डीके जन्मका वृत्तान्त सुनाना ( उद्योग० अध्याय १८८ से १९२ तक ) ।
  • दुर्योधनसे एक मासमें पाण्डव-सेनाका नाश करनेकी अपनी शक्तिका कथन ( उद्योग० १९३ । १४ ) ।
  • युधिष्ठिरको युद्धकी आज्ञा देकर उनकी मङ्गल कामना करना ( भीष्म० ४३ । ४४-४८ ) ।
  • प्रथम दिनके युद्धमें अर्जुनके साथ इनका द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ४५ । ८-११ ) ।
  • युद्धमें इनके द्वारा विराट्-पुत्र श्वेतका वध ( भीष्म० ४८ । ३-११५ ) ।
  • प्रथम दिनके युद्धमें इनका प्रचण्ड पराक्रम ( भीष्म० ४९ । ४१-५१ ) ।
  • अर्जुनके साथ इनका घोर युद्ध ( भीष्म० ५२ अध्याय ) ।
  • सात्यकिके द्वारा सारथिके मारे जानेपर घोड़ोंद्वारा रणक्षेत्रसे बाहर ले जाया जाना ( भीष्म० ५४ । ११४-११५ ) ।
  • अर्जुनकी मारसे भागी हुई सेनाको देखकर दूसरे दिनका युद्ध बंद करनेका आदेश देना ( भीष्म० ५५ । ४२ ) ।
  • दुर्योधनके उलाहना देनेपर सेनासहित पाण्डवोंको रोक देनेकी प्रतिज्ञा करना ( भीष्म० ५८ । ४२-४४ ) ।
  • भीष्मका अद्भुत पराक्रम ( भीष्म० ५९ । ५१-७४ ) ।
  • मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णका इनके द्वारा आह्वान ( भीष्म० ५९ । ९६-९८ ) ।
  • अर्जुनके साथ इनका द्वन्द्व युद्ध ( भीष्म० ६० । २५-२९ ) ।
  • भगदत्तको संकटमें पड़ा हुआ देखकर द्रोणाचार्य और दुर्योधनकी उसकी रक्षाके लिये आदेश देना ( भीष्म० ६४ । ६४-६९ ) ।
  • पाण्डवोंके पराक्रमके विषयमें पूछनेपर उसके वर्णनमें दुर्योधनको नारायणावतार श्रीकृष्ण और नरवतार अर्जुनकी महिमा बताना ( भीष्म० ६५ । ३५ से ६८ अध्यायतक ) ।
  • इनके द्वारा ब्रह्मस्तुतिरूप कथन ( भीष्म० ६८ । २-११ ) ।
  • शिखण्डीका सामना पड़नेपर युद्ध बंद कर देना ( भीष्म० ६९ । २९ ) ।
  • भीमसेनके साथ इनका समासान युद्ध ( भीष्म० ७० अध्याय ) ।
  • अर्जुन आदि योद्धाओंके साथ इनका घमासान युद्ध ( भीष्म० ७१ अध्याय ) ।
  • भीमसेनको घायल करके सात्यकिको पराजित करना ( भीष्म० ७२ । २१-२८ ) ।
  • विराटको घायल करना ( भीष्म० ७३ । २ ) ।
  • भीमसेनके पराक्रमसे भयभीत दुर्योधनको आश्वासन देना ( भीष्म० ८० । ८-१३ ) ।
  • युधिष्ठिरको रथहीन कर देना ( भीष्म० ८१ । १ ) ।
  • भीमसेनद्वारा सारथिके मारे जानेपर घोड़ोंका इनका रथ लेकर भागना ( भीष्म० ८२ । १२ ) ।
  • भगदत्तको घटोत्कचसे युद्ध करनेके लिये आज्ञा देना ( भीष्म० ९३ । १९-२० ) ।
  • दुर्योधनसे अर्जुनके पराक्रमका वर्णन करके शिखण्डीको छोड़कर शेष सोमकों और पाञ्चालोंके वधकी प्रतिज्ञा करना ( भीष्म० ९८ । १८-२३ ) ।
  • इनका सात्यकिके साथ युद्ध ( भीष्म० ९९ । २४-२६ ) ।
  • इनके द्वारा चेदि, काशि और करुष देशके चौदह हजार महारथियोंका एक साथ वध ( भीष्म० १०६ । १८-२० ) ।
  • मारनेके लिये आते हुए श्रीकृष्णका इनके द्वारा स्वागत ( भीष्म० १०६ । ६४-६७ ) ।
  • युधिष्ठिरको अपने वधका उपाय बताना ( भीष्म० १०७ । ७६-८८ ) ।
  • शिखण्डीसे उसके साथ युद्ध न करनेके लिये कहना ( भीष्म० १०८ । ४३ ) ।
  • दुर्योधनको उत्तर देना तथा पाण्डवसेनाका संहार करना ( भीष्म० १०९ । २४-३१ ) ।
  • युधिष्ठिरको अपने ऊपर आक्रमण करनेके लिये आदेश देना ( भीष्म० ११५ । १३-१५ ) ।
  • इनका अद्भुत पराक्रम ( भीष्म० ११६ । ६२-७८ ) ।
  • अर्जुनके प्रहारसे मूर्च्छित होना ( भीष्म० ११० । ६४ ) ।
  • इनके द्वारा विराटके भाई शतानीकका वध ( भीष्म० ११६ । २० ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवसेनाका भीषण संहार ( भीष्म० अध्याय ११६ से ११६ । १-५४ तक ) ।
  • जीवनसे उदास होकर मृत्युका चिन्तन करना ( भीष्म० ११६ । ३४-३५ ) ।
  • अर्जुनके बाणोंसे घायल होनेपर दुःशासनसे अर्जुनके पराक्रमका वर्णन करना ( भीष्म० ११६ । ५६-६० ) ।
  • अर्जुनके द्वारा रथसे गिराया जाना ( भीष्म० ११६ । ८० ) ।
  • हँसते हुए सूर्यके उत्तरायण होनेतक प्राण धारण करनेकी बात बताना ( भीष्म० ११६ । १०१-१०८ ) ।
  • संजयद्वारा धृतराष्ट्रके प्रति इनकी महत्ताका वर्णन ( भीष्म० १२० । १०-१५ ) ।
  • बाणशय्यापर सोते समय राजाओंसे तकिया माँगना ( भीष्म० १२० । ३४ ) ।
  • राजाओंसे अपने अनुरूप तकिया न मिलनेपर अर्जुनसे माँगना ( भीष्म० १२० । ३८ ) ।
  • राजाओंको समझाते हुए युद्ध बंद कर देनेके लिये अनुरोध करना ( भीष्म० १२० । ५१-५५ ) ।
  • इनका अर्जुनसे पानी माँगना ( भीष्म० १२१ । १८-१९ ) ।
  • इनके द्वारा अर्जुनकी प्रशंसाका कथन ( भीष्म० १२१ । ३०-३७ ) ।
  • दुर्योधनको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना ( भीष्म० १२१ । ३८-५५ ) ।
  • कर्णसे रहस्यपूर्वक वार्तालाप करना ( भीष्म० १२२ । ८-२२ ) ।
  • कर्णको स्वर्गप्राप्तिकी इच्छासे युद्ध करनेके लिये अनुमति देना ( भीष्म० १२२ । ३४-३८ ) ।
  • कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना ( द्रोण० ४ । २-१४ ) ।
  • धर्मका रहस्य जाननेके निमित्त युधिष्ठिरको भीष्मके पास जानेके लिये व्यासजीकी प्रेरणा ( शान्ति० २७ । ५-७ ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति ( भीष्मस्तवराज ) ( शान्ति० ४७ । ५२ । १-१३ तथा शान्ति० ५२ । १-७ ) ।
  • धर्मोपदेश करनेके लिये श्रीकृष्णके सम्मुख अपना असमर्थता प्रकट करना ( शान्ति० ५२ । २-१३ ) ।
  • युधिष्ठिरके गुणकथनपूर्वक उनको प्रश्न करनेके लिये आदेश देना ( शान्ति० ५५ । २-१० ) ।
  • भयभीत और लज्जित युधिष्ठिरको आश्वासन देना ( शान्ति० ५५ । १९ ) ।
  • युधिष्ठिरको नाना प्रकारके दृष्टान्तों और उपाख्यानोंद्वारा राजधर्म, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्मका उपदेश देना ( शान्ति० ५६ । १२ से अनु० १६५ अध्यायतक ) ।
  • श्रीकृष्णसे भगवान् शिवकी महिमाका वर्णन करनेके लिये कहना ( अनु० १६० । १८-२१ ) ।
  • युधिष्ठिरको हस्तिनापुर जानेके लिये आदेश और उपदेश देना ( अनु० १६४ । १७-१९ ) ।
  • धृतराष्ट्रको कर्तव्यका उपदेश देना ( अनु० १६० । ३०-३५ ) ।
  • श्रीकृष्णसे देहत्यागकी अनुमत माँगना ( अनु० १६१ । ३०-४५ ) ।
  • इनका प्राणत्याग करना ( अनु० १६२ । २-७ ) ।
  • कौरवोंद्वारा इनका दाहसंस्कार और इन्हें जलाञ्जलिदान ( अनु० १६८ । १०-२० ) ।
  • रोती हुई गङ्गादेवीका इनके लिये शोक इनकी वीरगाथाकी प्रशंसा तथा इनके शिखण्डीके हाथसे मारे जानेके कारण दुःख प्रकट करना ( अनु० १६८ । २१-२९ ) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर इनका गङ्गाके जलसे प्रकट होना ( आश्रम० ३२ । ७ ) ।
  • स्वर्गमें जाकर भीष्मका वसुओंके स्वरूपमें मिलना ( स्वर्गा० ५ । ११-१२ ) ।

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