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अग्नि -

  • पाँच महाभूतोंमेंसे एक तथा उसके अभिमानी देवता । ये भगवान्के मुखसे उत्पन्न हैं । भृगुपत्नी पुलोमाके सम्बन्धमें इनका निर्णय देना ( वन० ०५।३९-४४ ) महर्षि भृगुने इनको सर्वभक्षी होनेका शाप दिया ( वन० ६।१४ )।
  • झूठी गवाही देने तथा सत्य बात न बोलनेपर सात पीढ़ियों-तकके नाशके सम्बन्धमें इनका वचन ( वन० ७।३-४ )।
  • भृगुके शापसे कुपित होकर इनका अन्तर्धान होना एवं ब्रह्माजीका इनको आश्वासन देना ( वन० ७।१२ -२५ )।
  • राजा श्वेतकिके द्वादशवर्षीय यज्ञमें निरन्तर घृतपान करनेसे इनको अजीर्णताका रोग होना ( वन० २२२। ६७ )।
  • अपने अजीर्णको मिटानेके लिये इनकी ब्रह्माजीसे प्रार्थना ( वन० २२२।६९ )।
  • खाण्डववन जलानेके लिये इनको ब्रह्माका आदेश ( वन० २२२।७० )।
  • खाण्डववनको जलानेके कार्यमें श्रीकृष्ण और अर्जुनसे प्रार्थना करनेके लिये इनको ब्रह्माजीकी प्रेरणा ( वन० २२२।१० )।
  • खाण्डववनको दग्ध करनेमें सहायताके लिये इनकी श्रीकृष्ण और अर्जुनसे प्रार्थना ( वन० २२२।१० )।
  • गाण्डीव धनुष, चक्र एवं दिव्य रथके लिये इनकी वरुणसे प्रार्थना ( वन० २२४।१४ )।
  • इन्होंने अर्जुनको गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा दिव्य रथ प्रदान किये और श्रीकृष्णको सुदर्शनचक्र दिया ( आदि० २२४।१४ )।
  • इनके द्वारा खाण्डववनका दाह (आदि० १२४ । ३४-३७)।
  • मन्दपालद्वारा इनकी स्तुति (आदि० १२८ । २३)।
  • शार्ङ्गकद्वीपमें इनकी स्तुति (आदि० २२१ में)।
  • इनके द्वारा सहदेवके विरुद्ध राजा नीलकी सहायता तथा सहदेवसैनिकोंका जलना (सभा० ३१ । १२-१४)।
  • माहिष्मतीनरेश नीलकी पुत्री सुदर्शनाकी ओर इनका आकृष्ट होना (सभा० ३१ । २७)।
  • इनका ब्राह्मणरूपसे जाकर सुदर्शनाके प्रति काम- भाव प्रकट करना और राजा नीलद्वारा इनपर शासन (सभा० ३१ । ३१)।
  • नीलद्वारा इनकी अपनी कन्या सुदर्शनाका दान (सभा० ३१ । ३३)।
  • राजा नीलपर अग्निकी कृपा। राजाको वर माँगनेके लिये प्रेरित करना। राजाका अग्निदेवसे अपनी सेनाके लिये अभयदान माँगना (वन० ३१ । ३४-३७)।
  • माहिष्मतीकी स्त्रियोंको अग्निदेवका वरदान (वन० ३१ । ३८)।
  • सहदेवद्वारा अग्निदेवकी स्तुति (सभा० ३१ । ४१-४९)।
  • अग्निदेव की आज्ञासे नीलद्वारा सहदेवका सत्कार (सभा० ३१ । ५०-५१)।
  • इन्होंने बाणासुरकी राजधानीकी रक्षा की (सभा० २८ । २९ के बाद दक्षिणात्य पाठ)।
  • दमयन्ती-स्वयंवरमें राजा नलको वर प्रदान किया (वन० ५० । २६ई)।
  • ये कबूतर बनकर राजा उसीनरकी गोदमें छिपे (वन० १३० । २४ और १३० । ३)।
  • इन्होंने राजा उसीनरको अपना परिचय तथा वर दिया (वन० १३० । २५-२८)।
  • महर्षि अङ्गिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार किया (वन० २१० । १८)।
  • सहनामक अग्निकी अद्भुत नामक अग्निकी उत्पत्ति (वन० २२२ । १९)।
  • सर्पविषोंकी भीष. ल्गि प्रतिहत होकर ये वनमें चले गये (वन० २२२ । ३३-३८)।
  • इन्होंने स्कन्दकी रक्षा की (वन० २२५ । २८)।
  • सीताजीकी शुद्धिका समर्थन किया (वन० २९९ । २८)।
  • अर्जुनने अस्त्रप्राप्तिके लिये अग्निदेवका आश्रय लिया था (विराट० ४५ । ४०)।
  • इन्द्रकी खोजके लिये बृहस्पतिके साथ अग्निका संवाद (उद्योग० ३५ । २८ से ३४ तक)।
  • इन्होंने बृहस्पतिको इन्द्रका पता बताया (उद्योग० ३६ । १६)।
  • ब्रह्माजीके रोषसे प्रकट हुए, अग्निदेवके द्वारा चराचर जगत्का दाह (द्रोण० ५२ । ४९)।
  • स्कन्दको पार्षद प्रदान किया (शल्य० ४५ । ३३)।
  • कार्तवीर्य अर्जुनसे भिक्षा माँगकर उसकी सहायतासे अग्निने ग्राम, वन एवं पर्वतोंके साथ अपना मुनिका आश्रम भी जलाया (शान्ति० ४९ । ३६ से ४९ तक)।
  • ब्रह्माके कहनेसे इन्द्रका ब्रह्महत्याका एक चतुर्थांश स्वीकार किया (शान्ति० २८२ । ३५)।
  • इन्होंने मेढकों, हाथियों और तोतोंको शाप दिया (अनु० ८५ । २८, ३६, ४०)।
  • देवताओंको आह्वान दिया (अनु० ८५ । ५०)।
  • ब्रह्माजीके गर्भमें शिवजीका वीर्य स्थापित किया (वन० ८५ । ५६)।
  • प्रजापतियोंको अपनी संतान माना (अनु० ८५ । १९८)।
  • कार्तिकेयको वशमें दिया (अनु० ८६ । २४)।
  • पितरों और देवोंके अर्द्धर्ज्जनिवारणका उपाय बतलाया (अनु० ९३ । १०)।
  • इन्द्रादि देवताओंके समक्ष धर्मके रहस्यका वर्णन किया (अनु० ९९ । २२-२३)।
  • इन्द्रका संदेश लेकर मरुतके पास गये (आश्र० १ । १४-१५)।
  • इन्होंने मरुतका उत्तर इन्द्रको सुनाया (आश्र० १ । २२-२३)।
  • ब्राह्मणवत्की श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया (आश्र० १ । ३१-३७)।
  • कुण्डलकोंका अपहरण हो जाने- पर नागलोकमें गये हुए उत्तङ्कको अभयद्वारा अग्निदेवने सहायता दी; नागोंको क्षुब्ध करके कुण्डल लौटानेको विवश कर दिया (आश्र० ५८ । ४५-५५ तथा आदि० ३ । १५१-१५४)।
  • कुण्डलकोंका अपहरण हो जाने- पर नागलोकमें गये हुए उत्तङ्कको अभयद्वारा अग्निदेवने सहायता दी; नागोंको क्षुब्ध करके कुण्डल लौटानेको विवश कर दिया (आश्र० ५८ । ४५-५५ तथा आदि० ३ । १५१-१५४)।
  • इन्होंने महाप्रस्थानके समय अर्जुनसे गाण्डीव धनुष वापस लिया (महाप्रस्थान० १ । ३५ -४३)।

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