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भृगु

  • एक महर्षि, जो ब्रह्माजीके द्वारा वरुणके यज्ञमें अग्निसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ५ । ८ ) ।
  • इनकी प्यारी पत्नी का नाम पुलोमा था ( आदि० ५ । १३ ) ।
  • पुलोमा राक्षसके हरण करते समय इनकी पत्नी पुलोमाका गर्भ च्युत पड़ा, जिससे च्यवन नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ( आदि० ६ । १—२४; आदि० ६६ । ४४—४५ ) ।
  • पत्नी पुलोमाद्वारा अपने हरणका रहस्य बतलानेपर इनका अग्निदेवको सर्वभक्षी होनेका शाप देना ( आदि० ६ । १४ ) ।
  • इनके दूसरे पुत्रका नाम ‘कवि’ था ( आदि० ६६ । ४२ ) ।
  • च्यवनके अतिरिक्त इनके छः पुत्र और हुए, जो व्यापक तथा इन्हींके समान गुणवान् थे; जिनके नाम इस प्रकार हैं—वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्र, वरेण्य तथा सवन । सभी भृगुवंशी सामान्य रूपसे वारुण जगत्की उत्पत्ति और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन ( शान्ति० १८२ अध्याय ) ।
  • आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन ( शान्ति० १८३ अध्याय ) ।
  • पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन ( शान्ति० १८४ अध्याय ) ।
  • शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन ( शान्ति० १८५ अध्याय ) ।
  • जीवकी सत्ता तथा नित्यताको नाना प्रकारकी युक्तियोंसे सिद्ध करना ( शान्ति० १८७ अध्याय ) ।
  • वर्णविभाग-पूर्वक मनुष्यकी तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन ( शान्ति० १८८ अध्याय ) ।
  • चारों वर्णोंके ब्रह्मा-अब्रह्मा कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्तिका निरूपण ( शान्ति० १८९ अध्याय ) ।
  • सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दुःखका विवेचन ( शान्ति० १९० अध्याय ) ।
  • ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमके धर्मोंका वर्णन ( शान्ति० १९१ अध्याय ) ।
  • वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तरपार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट जोकका माहात्म्य एवं महत्ताका प्रतिपादन ( शान्ति० १९२ अध्याय ) ।
  • इनका हिमवान्‌को रत्नोंका भण्डार न होनेका शाप देना ( शान्ति० ३४२ । ६२ ) ।
  • इनके द्वारा राजा वीतहव्यको शरण देकर ब्राह्मणत्व प्रदान करना ( अनु० ३० । ५८ ) ।
  • ये अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न हुए थे; अतः इनका नाम 'भृगु' पड़ा ( अनु० ८५ । १०५-१०६ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर इनका शाप करना ( अनु० ९४ । १६ ) ।
  • अगस्त्यजीसे नहुषको गिरानेका उपाय पूछना ( अनु० ९९ । १५ ) ।
  • इनका अगस्त्यजी-को नहुषके पतनका उपाय बताना ( अनु० ९९ । २२-२८ ) ।
  • इनके द्वारा नहुषको शाप ( अनु० १०० । २४-२९ ) ।
  • नहुषके प्रार्थना करनेपर उनके शापका उद्धार बताना ( अनु० १०० । ३० ) ।

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