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मथुरा

  • ( पुराणानुसार सात मोक्षदायिनी पुरियोंमेंसे एक पुरीका नाम । यह ब्रजमें यमुनाके दाहिने किनारेपर है । रामायण ( उत्तरकाण्ड ) के अनुसार इसे मधु नामक दैत्यने बसाया था, जिसके पुत्र लवणासुरको पराजित करके शत्रुघ्नने इसको विजय किया था । पाली-भाषाके ग्रन्थोंमें इसे मधुरा लिखा है । महाभारतकालमें यहाँ शूरसेन-वंशियोंका राज्य था और इसी वंशकी एक शाखामें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका यहाँ जन्म हुआ था । शूरसेनवंशियोंके राज्यके अनन्तर अशोकके समयमें उनके आचार्य उपगुप्तने इसे बौद्धधर्मका केन्द्र बनाया था । यह जैनोंका भी तीर्थस्थान है । उनके उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथका यह जन्मस्थान है । मौर्यसाम्राज्यके अनन्तर यह स्थान अनेक यूनानी, पारसी और शक क्षत्रियोंके अधिकारमें रहा । महमूद गजनवीने सन् १०१७ ई० में आक्रमण करके इस नगरको नष्ट-भ्रष्ट कर डाला था । अन्य मुसलमान बादशाहोंने भी समय-समयपर आक्रमण करके इसे तहस-नहस किया था । यहाँ हिन्दुओंके अनेक मन्दिर हैं और अनेक कृष्णोपासक वैष्णव-सम्प्रदायके आचार्योंका यह केन्द्र है । मथुराका दूसरा नाम शूरसेनपुर है ( सभा० ३८ । दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८०४, कालम २ ) ।
  • यहाँ भगवान् श्रीकृष्णका अवतार हुआ और नवजात बालक श्रीहरिको वसुदेवजीने कंसके भयसे मथुरासे ले जाकर नन्दगोपके घरमें छिपा दिया ( सभा० ३८ । पृष्ठ ७९८ ) ।
  • मथुरामें ही श्री- कृष्णने आंध्रदेशीय मल्ल चाणूरका वध किया था । वहीं बलदेवने मुष्टिकको मारा था । उसी नगरमें श्रीकृष्णने कंसके भाई और सेनापति सुनामाका संहार किया । ऐरावत-कुलमें उत्पन्न कुवलयापीडको भी मारा । कंसको मारकर उग्रसेनको मथुराके राज्यपर अभिषिक्त किया और माता-पिताके चरणोंमें वन्दना की ( सभा० ३८ । पृष्ठ ८०१ ) ।
  • श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारका चले गये थे ( सभा० ३८ । पृष्ठ ८०४ ) ।
  • कंसके मारे जानेपर उसकी पत्नीका प्रेरणसे जरासंधने जब मथुरापर आक्रमण किया, तब अपने मन्त्री हंस और डिम्भकके आत्मघात कर लेनेपर उत्साहशून्य होकर वह लौट गया । इससे मथुरावासी यादव आनन्दपूर्वक वहीं रहने लगे । तदनन्तर अपनी पुत्रियोंकी प्रेरणासे जब जरासंधने पुनः आक्रमण किया, तब यादव वहाँसे भाग खड़े हुए और रैवतक पर्वतसे सुशोभित कुशस्थलीमें जाकर रहने लगे ( सभा० १४ । ३५—५० ) ।
  • जरासंधने गिरिव्रजसे एक गदा फेंकी थी, जो मथुरामें आकर एक स्थानपर गिरी, वह स्थान गदावसानके नामसे प्रसिद्ध हुआ ( सभा० १४ । २३-२४ ) ।
  • मथुराके योद्धा मल्लयुद्धमें निपुण होते हैं ( शान्ति० १०५ । ५ ) ।
  • साक्षात् नारायणने ही कंसका वध करनेके लिये मथुरामें श्रीकृष्णरूपसे अवतार लिया था ( शान्ति० ३३१ । ८९-९० ) ।

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