← अनुक्रमणिका

मनस्विनी

  • प्रजापति दक्षकी पुत्री, धर्मराजकी पत्नी और चन्द्रमाकी माता ( आदि० ६६ । १९ ) ।
  • (१) मानव-सृष्टिके प्रवर्तक आदि मनु, जो विराट्-अण्डसे प्रकट हुए ( आदि० १ । ३२ ) ।
  • इनकी पुत्री आकूती मनुकी व्यवनकी पत्नी थी ( आदि० ६६ । ४६ ) ।
  • इन्हें ही स्वयंभूका पुत्र मानकर 'स्वायम्भुव' कहा गया है । इन्होंने धर्मसम्मतविवाहके विषयमें अपना निर्णय दिया है ( आदि० ७३ । ९ ) ।
  • इन्होंने सोमको चाक्षुषी विद्या प्रदान की थी ( आदि० १६१ । ४३ ) ।
  • मगध देशोंको मेघोंके लिये अपरिहार्य कर दिया था; जिससे मेघ सदा समयपर वहाँ जल बरसाते थे ( सभा० २९ । १० ) ।
  • ये इन्द्रके विमानपर बैठ-कर कौरवोंके साथ अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये आये थे ( विराट० ५६ । १० ) ।
  • इनकी पत्नीका नाम सरस्वती था ( उद्योग० ११७ । १४ ) ।
  • ( पुराणान्तरोंमें शतरूपा नाम आता है ) ।
  • (२) बिन्दुसरोवरके तटपर ये सदा स्थित रहते हैं ( भीष्म० ७ । ४६ ) ।
  • ये पृथ्वी-दोहनके समय बछड़ा बने थे ( द्रोण० ६९ । २१ ) ।
  • ये स्कन्दके उन प्रमुखोंमेंसे भी थे ( शल्य० ४५ । १० ) ।
  • (३) इनका सिद्धोंके साथ संवाद, इनके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओं-का वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन ( शान्ति० ३६ अध्याय ) ।
  • ये मनुष्योंके आदि राजा थे ( शान्ति० ७७ । २१-२२ ) ।
  • इन्हें प्रजापति मनु भी कहते हैं । इन्होंने बृहस्पति के प्रश्नोंके उत्तरमें ज्ञान और त्यागकी प्रशंसा करते हुए उन्हें परमात्म-तत्त्वका उपदेश दिया तथा उनके अन्य प्रश्नोंका भी विवेचन किया ( शान्ति० अध्याय २०१ से २०६ तक ) ।
  • पाञ्चरात्र आगमके अनुसार ही स्वायम्भुव मनुने धर्म- शास्त्रका निर्माण एवं धर्मोपदेश किया ( शान्ति० ३३५ । ४४-४५ ) ।
  • जिस समय उपमन्यु सर्वाङ्गकार तथा परिवारगणोंसे घिरे हुए महादेवजीका दर्शन कर रहे थे, उस समय उन्होंने देखा कि स्वायम्भुव मनु वहाँ पधारे हुए हैं ( अनु० १७ । २८० ) ।
  • पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानके माहात्म्य-प्रसङ्गमें तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद ( अनु० १८ अध्याय ) ।
  • ( २ ) कश्यपकी 'प्राधा' नामवाली पत्नीसे उत्पन्न हुई ( आदि० ६५ । १७-१८ ) ।
  • ( ३ ) विवस्वान्के पुत्र, जो वैवस्वत मनुके नामसे प्रसिद्ध हुए ( आदि० ७५ । १२ ) ।
  • इनके वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, इला, पृषध्र, नाभागारिष्ट—ये दस पुत्र थे ( आदि० ७५ । १५-१६ ) ।
  • वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा ( वन० १८७ अध्याय ) ।
  • इन्हें विवस्वान्से योगकी प्राप्ति हुई और इन्होंने वही योग इक्ष्वाकुको प्रदान किया ( भीष्म० १२२ । ३८-४२ ) ।
  • त्रेतायुगके आरम्भमें सूर्यने मनुको और मनुने सम्पूर्ण जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्र इक्ष्वाकुको सात्वत धर्मका उपदेश किया ( शान्ति० ३४८ । ५१ ) ।
  • महर्षि गौतमसे इन्हें शिवसहस्रनामकी प्राप्ति हुई और इन्होंने समाधिनिष्ठ एवं ज्ञानी नारायण नामक किसी साध्य देवताको यह स्तोत्र प्रदान किया ( अनु० १७० । १७७-१७८ ) ।
  • ( ४ ) ये तपनामधारी पाञ्चजन्य नामक अग्निके पुत्र थे । इनका एक नाम भानु भी था । इनके तीन पत्नियाँ थीं—सुप्रभा, बृहद्भासा और निशा । प्रथम दोसे छः पुत्र और तीसरीसे एक कन्या तथा सात पुत्र उत्पन्न हुए ( वन० २२१ । १४-१५ ) ।
  • ( ५ ) प्राचेतस नामसे प्रसिद्ध मनु, जिन्होंने छः व्यक्तियों- को त्याज्य बताया है ( शान्ति० ५७ । ४३-४५ ) ।
  • ( ६ ) स्वायंभुव नामसे प्रसिद्ध एक मनु, जिन्हें ब्रह्माजीने सात्वत धर्मका उपदेश दिया था । फिर स्वारो- चिषने अपने पुत्र शङ्खपदको इसका उपदेश दिया ( शान्ति० ३४८ । ३६-३७ ) ।
  • ( ७ ) चाक्षुष नामक मनु, जिनके पुत्र भगवान् वरूके नामसे प्रसिद्ध हैं ( अनु० १८ । २० ) ।
  • ( ८ ) सौवर्ण नामक मनु, जिनके समयमें वेदव्यास सत्रहवें पदपर प्रतिष्ठित होंगे ( अनु० १८ । ४३ ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in