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मन्दपाल

  • एक विद्वान् महर्षि, जो धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे । ये ऊर्ध्वरेता मुनियों- के मार्गका आश्रय ले सदा वेदोंके स्वाध्याय, धर्मपालन और तपस्यामें संलग्न रहते थे । अपनी तपस्या पूर्ण करके जब ये पितृलोकमें गये, तब वहाँ इन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला । इन्होंने देवताओंसे इसका कारण पूछा । देवताओंने बताया कि आपने पितृ-ऋणको नहीं उतारा है; अतः संतान उत्पन्न करके अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये । यह सुनकर शीघ्र संतान उत्पन्न करनेके लिये इन्होंने शार्ङ्गिक पक्षी होकर जरिता नाम- वाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया । उसके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको जन्म देकर ये मुनि लपिता निवासको पत्नीके पास चले गये । बच्चे अपनी माँके साथ खाण्डववनमें ही रहे । जब अग्निदेवने उस वन- को जलाना आरम्भ किया, उस समय इन्होंने उनकी स्तुति की और अपने पुत्रोंकी जीवन-रक्षाके लिये वर माँगा । तब अग्निदेवने 'तथास्तु' कहकर इनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ( आदि० २२८ अध्याय ) ।
  • मन्दपालका लपितासे अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्ता प्रकट करना । लपिताके ईर्ष्यायुक्त वचन सुनकर मन्दपालका उससे अपने कथनकी यथार्थता बताना और अपने बच्चोंके पास जाना । बच्चोंद्वारा अभिनन्दित न होनेपर इनका जरितासे ज्येष्ठ आदि पुत्रोंका परिचय पूछना । जरिताका उन्हें फटकारना । मन्दपालका स्त्रियोंके सौतियाडाहरूपी दोषका वर्णन करके उनकी अविश्वसनीयता बताना । तत्पश्चात् अपने पास आए हुए पुत्रोंको इनका आश्वासन देना और उनको तथा जरिताको साथ लेकर देशान्तरको प्रस्थान करना ( आदि० २३३ । २ से आदि० २३३ । ४ तक ) ।

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