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मन्द्राचल

  • एक पर्वत, जिसकी ऊँचाई ग्यारह हजार योजन थी । वह पृथ्वीके भीतर भी उतनी ही गहराई तक धँसा हुआ था । इसका विशेष वर्णन ( आदि० १८ । १-३ ) ।
  • भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे शेषनागके द्वारा समुद्रमन्थनके लिये इसका उत्पादन ( आदि० १८ । ४-८ ) ।
  • समुद्रमन्थनके लिये इसे मथानी बनाया गया था ( आदि० १८ । १३ ) ।
  • समुद्रमन्थनके समय इसके द्वारा जलजन्तुओं एवं पातालवासी प्राणियोंका संहार ( आदि० १८ । १५-२१ ) ।
  • बहुसंख्यक तमोंने उपस्थित हो उनकी उपासना करना ( वन० ३ । ३१ ) ।
  • कैलासके पास मन्दराचलकी स्थिति है, जिसके ऊपर माणिवर यक्ष और यक्षराज कुबेर निवास करते हैं । वहाँ अठासी हजार गन्धर्व और उनसे चौगुने किन्नर एवं यक्ष रहते हैं ( वन० १३९ । ५-६ ) ।
  • स्वावस्थामें श्री- कृष्णके साथ कैलास जाते हुए अर्जुनने मार्गमें महामन्दराचल पर पदार्पण किया था, जो अप्सराओंसे व्याप्त और किन्नरों से सुशोभित था ( द्रोण० ८० । ३३ ) ।
  • भगवान्‌शंकरने त्रिपुरदाहके समय मन्दराचलको अपना धनुष एवं रथका धुरा बनाया था ( द्रोण० २०२ । ७६; कर्ण० ३४ । २० ) ।
  • उत्तरदिशाकी यात्रा करते समय अष्टावक्र मुनि इस पर्वतपर गये थे ( अनु० १९ । ५४ ) ।

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