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मय

  • एक दानव, जिसने कुछ कालतक खाण्डववनमें निवास किया था । अर्जुनने इसे वहाँ जलनेसे बचाया था; अतः इसने उनके लिये एक दिव्य सभामवनका निर्माण किया, जिसे दुर्योधन ले लेना चाहता था ( आदि० २१९ । ४०- ४२ ) ।
  • यह खाण्डवदाहके समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर भागा । श्रीकृष्णने इसे भागते देखा । अग्निदेव मूर्तिमान् होकर गर्जने और इस राक्षसको माँगने लगे । श्रीकृष्णने इसे मारनेके लिये चक्र उठाया । तब यह अर्जुनकी शरणमें गया और उन्होंने इसे अभय दे दिया । यह देख न तो श्रीकृष्णने इसे मारा और न ही ( आदि० २२७ । ३९-४५ ) ।
  • यह दानवोंका श्रेष्ठ शिल्पी तथा नमुचिका भाई था ( आदि० २२७ । ४१-४५ ) ।
  • मयासुरका श्रीकृष्ण और अग्निसे अपनी रक्षा हो जानेपर अर्जुनको इस उपकारके बदलेमें अपनी ओरसे कुछ सेवा अर्पित करनेकी इच्छा प्रकट करना । अर्जुनका बदलेमें कोई सेवा लेनेसे इनकार करनेपर मयासुरका अपनेको दानवोंका विश्वकर्मा बताना और उनके लिये प्रसन्नतापूर्वक किसी वस्तुका निर्माण करनेकी इच्छा प्रकट करना ( सभा० १ । ३-६ ) ।
  • अर्जुनका मयासुरसे श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार कोई कार्य करनेके लिये कहना और श्रीकृष्णका इसे धर्मराज युधिष्ठिरके लिये एक दिव्यसभामवनका निर्माण करनेके लिये आदेश देना ( सभा० १ । ७-१३ ) ।
  • मयासुरका प्रसन्नतापूर्वक उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करना, युधिष्ठिर- द्वारा इसका स्वीकार, इसका पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाना और उनके दिव्य सभा बनानेके लिये भूमिको नपवा ( सभा० १ । १४-२१ ) ।
  • मयासुरका भीमसेनको गदा एवं शङ्ख लाकर देना और पाण्डवोंके अद्भुत सभा का निर्माण करना ( सभा० ३ अध्याय ) ।
  • सभा का निर्माण करके मयका अर्जुनको उसे दिखाना और एक मायामय ध्वजका निर्माण करके देना ( सभा० ४ । १० पाठ, पृष्ठ ६०२ ) ।
  • दक्षिणसमुद्रके निकट सह्य, मलय और दुर्दुर नामक पर्वतोंके आसपास एक विशाल गुफाके भीतर बने हुए दिव्य भवनमें भीमासुरका निवास करता था। वहीं प्रभावती नामकी एक तपस्विनी तपस्या करती थी, जिसने हनुमान् आदि वानरोंको नाना प्रकारके भोज्य पदार्थ और भाँति-भाँतिके पीने योग्य रस दिये थे ( वन० २८१ । ४०-४३ ) ।
  • इसके द्वारा त्रिपुरसंज्ञक तीन पुरोंका निर्माण ( कर्ण० ३३ । १७ ) ।

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