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मरुत

  • (१) एक सुप्रसिद्ध सम्राट्, जो प्राचीनकालमें इस
  • पृथ्वीके शासक थे ( आदि० १ । २२७ ) ।
  • ये यमराजकी सभामें रहकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १६ ) ।
  • पाँच सम्राट्‌मेंसे एक हैं ( सभा० १५ । १६ ) ।
  • ये महाराज अविभिक्षत्‌के पुत्र थे । बृहस्पतिजीके साथ स्पर्धा रखनेके कारण इनके भाई मरुत्तने इनका यज्ञ कराया था । साक्षात् भगवान् शङ्करने प्रचुर धन-राशिके रूपमें इन्हें हिमालयका एक सुवर्णमय शिखर प्रदान किया था । प्रतिदिन यज्ञकार्य के अन्तमें इनकी सभामें इन्द्र आदि देवता और बृहस्पति आदि समस्त प्रजापतिगण समासीद् रूपमें बैठा करते थे । इनके यज्ञमण्डपकी सारी सामग्रियाँ सोनेकी बनी हुई थीं । इनके घरमें मरुद्गण रसोई परोसनेका काम किया करते थे । विश्वेदेव इनकी राजसभाके सभासद् थे । इन्होंने अपनी समस्त प्रजाको नीरोग बना दिया था । इन्होंने देवताओं, ऋषियों और पितरोंको संतुष्ट किया था । ब्राह्मणोंको शय्या, आसन, सवारी और दुरस्थ स्वर्णराशि प्रदान की थी । इन्द्र सदा इनका शुभचिन्तन करते थे । इन्होंने युवावस्थामें रहकर प्रजा, मन्त्री, धर्मपत्नी, पुत्र और भाइयोंके साथ एक हजार वर्षोतक राज्यशासन किया था ( द्रोण० ५५ । ३०-४५ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा नारद-संजय संवादके रूपमें इनके प्रभाव एवं यज्ञका वर्णन ( शान्ति० २६ । १५-२४ ) ।
  • इनका दण्डविषयक विधान ( शान्ति० ५० । १७ ) ।
  • इन्हें महाराज मुचुकुन्द से खड्गकी प्राप्ति हुई और इन्होंने रैवतको खड्ग प्रदान किया ( शान्ति० १६६ । १० ) ।
  • इनके द्वारा अङ्गिरा को कन्यादान और स्वर्गकी प्राप्ति ( शान्ति० २३४ । २६ ) ।
  • अनु० १३० । १६ ) ।
  • ये करम्भकके पौत्र थे । बृहस्पतिजीसे अपना यज्ञ करानेके लिये इनकी प्रार्थना और उनके अस्वीकार करनेपर लज्जित एवं दुखी होकर इनका लौटना ( आश्व० ६ । ४ - १० ) ।
  • लौटते समय मार्गमें नारदजीसे भेंट और उनसे अपने शोकका कारण बताना ( आश्व० ६ । १५-१६ ) ।
  • नारदजीके बताये अनुसार संवर्तसे इनकी भेंट और उनके पीछे-पीछे जाना ( आश्व० ६ । ३०-३३ ) ।
  • संवर्तके साथ वार्तालाप और उनका साथ न छोड़नेके लिये इनका शपथ खाना ( आश्व० ७ । २-२३ ) ।
  • शिवजी की कृपासे इन्हें धनकी प्राप्ति ( आश्व० ८ । ३२ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रद्वारा लाये हुए इन्द्रके संदेशका उत्तर देना ( आश्व० १० । ६-७ ) ।
  • इन्द्रके भयसे भीत होना ( आश्व० १० । १६ ) ।
  • यज्ञ समाप्त करके राजधानीको लौटना ( आश्व० १० । ३४-३५ ) ।
  • (२) एक महर्षि, जिन्होंने शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर जाते हुए श्रीकृष्णको मार्गमें परिक्रमा की थी ( उद्योग० ८३ । २७ ) ।
  • ये इन्द्रसभा में विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । १७ ) ।

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