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मातलि

  • इन्द्रका सारथि । ( १ ) इसका अर्जुनको स्वर्गलोकमें चलनेके लिये इन्द्रका संदेश सुनाना ( वन० ४२ । ११—१४ ) ।
  • इसका अर्जुनको इन्द्रके दिव्य रथपर बिठाकर गन्धमादनपर ले आना और पाण्डवोंको कर्तव्यकी शिक्षा देना ( वन० १६५ । १—५ ) ।
  • ( २ ) इसका रथ लेकर भीष्मकी सेवामें उपस्थित होना ( वन० २१० । १३—१४ ) ।
  • ( ३ ) इसका अपनी पुत्री गुणकेशीके निमित्त वर खोजनेके लिये निकलना ( उद्योग० ९७ । २०—२१ ) ।
  • मार्गमें नारदजीसे भेंट और उनके साथ पृथ्वीके नीचेके लोकमें जाकर वर खोजना ( उद्योग० अध्याय ९८ से १०३ तक ) ।
  • नागकुमार सुमुखके साथ अपनी कन्याको ब्याहनेका निश्चय करना ( उद्योग० १०३ । २५—२६ ) ।
  • आर्यकसे सुमुखको जमाता बनानेकी बात कहकर इन्द्रके पास चलनेके लिये प्रस्ताव करना ( उद्योग० १०४ । १८—२१ ) ।
  • सबके वन्दनीय पुरुषके विषयमें इसका इन्द्रके समक्ष प्रश्न उपस्थित करना ( अनु० ९६ । २२ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ५०८७ ) ।

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