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माद्री

  • मद्रदेशके राजाकी पुत्री, मद्रराज शल्यकी बहिन, पाण्डुकी द्वितीय पत्नी तथा नकुल-सहदेवकी माता । ये अश्विनीकुमारके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ( आदि० ९५ । ६० ) ।
  • ( १ ) माद्रीकी यशस्विनी माद्रीकी प्रशंसा सुन-कर भीष्मजीका शल्यके यहाँ जाकर पाण्डुके लिये इनका वरण करना, शल्यके कुलधर्मके अनुसार कन्याके शुल्क-रूपमें इन्हें बहुत धन देना, शल्यका अपनी बहिनको पाण्डुके हाथमें सौंप देना और भीष्मजीका माद्रीको साथ लेकर हस्तिनापुरमें आना ( आदि० ११२ । १—१० ) ।
  • ( २ ) शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें पाण्डु द्वारा माद्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण ( आदि० ११२ । १८ ) ।
  • ( ३ ) माद्रीका अपने पतिके साथ वनमें निवास ( आदि० ११३ । ६ ) ।
  • ( ४ ) शापग्रस्त होनेपर संन्यास लेनेका निश्चय करके पाण्डुका कुन्तीसहित माद्रीको हस्तिनापुरमें जानेकी आज्ञा देना । इनका पतिके साथ रहकर वानप्रस्थ-धर्मके पालनकी इच्छा प्रकट करना; अन्यथा प्राणत्यागका निश्चय बताना ( आदि० १९८ । १-३० ) ।
  • पुत्र-प्राप्तिके हेतु मुझपर भी कुन्तीदेवी अनुग्रह करें—इस प्रकार इनकी पाण्डुसे प्रार्थना ( आदि० १२३ । १-६ ) ।
  • अश्विनीकुमारोंद्वारा इनके गर्भसे नकुल तथा सहदेवका जन्म ( आदि० १२३ । १६ ) ।
  • पाण्डुके निधनपर इनका विलाप ( आदि० १२४ । १७ के बाद दा० पाठ ) ।
  • पाण्डुके साथ सती होनेके लिये अपनेको आज्ञा प्रदानके निमित्त इनकी कुन्तीसे प्रार्थना ( आदि० १२४ । २५-२८ दा० पाठसहित ) ।
  • धृतराष्ट्रनिवासी ऋषियोंद्वारा इनको आश्वासन तथा सती न होनेके लिये अनुरोध ( आदि० १२४ । २८ के बाद ) ।
  • अपने अन्तिम समयमें इनके द्वारा पाण्डवोंको शिक्षा ( आदि० १२४ । २८ के बाद दा० पाठ ) ।
  • कुन्तीसे आज्ञा लेकर इनका चितारोहण ( आदि० १२४ । ३१ ) ।
  • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुर आदिद्वारा पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका राजोचित ढंगसे दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा इनके लिये जलाञ्जलि-दान ( आदि० १२५ अध्याय ) ।
  • माद्रीका अपने पतिके साथ महेन्द्रभवनमें निवास ( स्वर्गा० ५ । २० स्वर्गा० ५ । १५ ) ।

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