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मार्कण्डेय

  • (१) एक सुप्रसिद्ध महामुनि; जो युधिष्ठिरकी सभामें विराजमान होते थे ( सभा० ४ । १५ ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ११ । २२ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवोंको धर्मका आदेश ( वन० २५ । ८-९ ) ।
  • इन्होंने पर्युष्णाके तटपर उसकी महिमा तथा राजा नृगकी महत्ताके विषयमें गाथा गायी थी ( वन० ८८ । ५-७ ) ।
  • इनके द्वारा कर्मफल- भोगका विवेचन ( वन० १८३ । ६१-९५ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके प्रश्नोके अनुरूप मनुष्य तथा राजर्षियोंके जीवन- सम्बन्धी विविध उपदेशपूर्ण कथाएँ सुनाना ( वन० अध्याय १८६ से २३२ तक ) ।
  • मार्कण्डेयजीने हजार- हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयोंके दृश्य देखे हैं । संसारमें इनके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है । महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई इनके समान दीर्घायु नहीं है । जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदिसे शून्य हो जाता है, उस प्रलयकालमें केवल ये ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं । प्रलयकाल व्यतीत होनेपर ब्रह्माजीके द्वारा रची गयी जीव-सृष्टिको सबसे पहले ये ही अच्छी तरह देख पाते हैं । इन्होंने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सर्व- लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है और घोर तपस्याद्वारा मरीचि आदि प्रजापतियोंको भी जीत लिया है । ये भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । परलोकमें इनकी महिमाका सर्वत्र गान होता है । इन्होंने सर्वव्यापक परब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका निवास करनेवाले अजोनि उत्पन्न- कर वैराग्य और अध्यात्मसे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिपारा विश्व- स्वरूपिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है । इस- लिये इनकी मरणवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देने- वाली जरा इनका स्पर्श नहीं करती ( वन० १८८ । ९- ११ ) ।
  • इनके द्वारा बालमुकुन्दका दर्शन ( वन० १८८ । १२ ) ।
  • इनका बालमुकुन्दके उदरमें प्रवेश और उसमें ब्रह्माण्ड-दर्शन ( वन० १८८ । १००-१२५ ) ।
  • उदरसे बाहर निकलनेपर बालमुकुन्दके साथ इनका वार्तालाप ( वन० १८८ । १३० से १८९ । ४५ तक ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन ( वन० १८९ । ५३-५७ ) ।
  • इनके द्वारा कलियुगके समयके वर्तविका वर्णन ( वन० १९० । ७—१२ ) ।
  • कल्कि-अवतारका वर्णन ( वन० १९० । १३—१९ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको धर्मोपदेश ( वन० १९१ । २३—३० ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरको विविध धार्मिक विषयोंका उपदेश ( वन० २०० अध्याय ) ।
  • स्कन्दके नामोंका वर्णन तथा स्तवन ( वन० २३२ अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिर आदिको श्रीरामका उपाख्यान तथा सती सावित्रीका चरित्र सुनाना ( वन० अध्याय २०३ से २९९ तक ) ।
  • इन्होंने धृतराष्ट्रको त्रिपुरवधकी कथा सुनायी थी ( कर्ण० ३३ । १२ ) ।
  • शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मको देखनेके लिये अन्य ऋषियोंके साथ ये भी गये थे ( शान्ति० ४७ । १९ ) ।
  • इन्हें नाचिकेतोपदेश तथा इन्होंने उपमन्युको शिवसहस्रनामका उपदेश दिया ( अनु० १७ । ७९ ) ।
  • इनका नारदजीसे नाना प्रकारके प्रश्न करना ( अनु० २२ । २ ) ।
  • दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • प्रयाणकालके समय भीष्मजीके पास गये हुए ऋषियोंमें ये भी थे ( अनु० २६ । ६ ) ।
  • इन्होंने मांस-भक्षणके दोष बताये हैं ( अनु० ११५ । ३०—३१ ) ।
  • इनकी धर्मपत्नीका नाम धूम्रोर्णा था ( अनु० १४६ । ४ ) ।
  • युधिष्ठिरने महाप्रस्थानसे पूर्व अन्य ऋषियोंके साथ मार्कण्डेयजीका भी भगवद्बुद्धिसे पूजन किया था ( महाप्रस्था० १ । १३ ) ।
  • (२) एक प्रसिद्ध तीर्थ, जो गङ्गा और गोमतीके संगमपर है ( यह स्थान वाराणसीसे लगभग सोलह मील उत्तर है ) । इसमें जाकर मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ( वन० ८४ । ६०-६१ ) ।

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