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अश्वत्थामा-

  • ( १ ) कृपीके गर्भसे उत्पन्न द्रोणाचार्यका पुत्र ( आदि० ६३ । १०७; १२१ । ४७ )।
  • इसका जन्म शिव, यम, काम तथा क्रोधके सम्मिलित अंशसे हुआ था ( आदि० ६७ । ७२ )।
  • इसका अश्वत्थामा नाम होनेका कारण ( आदि० १२९ । ४८-४९ )।
  • इसका आटेके पानीको दूध समझकर पीना और प्रसन्न होना ( आदि० १३० । ५४ )।
  • कौरवराजकुमारोंके साथ इसका भी अपने पितासे अध्ययन ( आदि० १३१ अध्याय )।
  • युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें इसका पदार्पण ( सभा० ३४ । ८ )।
  • कर्ण और दुर्योधनको फटकारते हुए इसका अर्जुनके विषयमें अपना उद्गार प्रकट करना ( विराट० ५० अध्याय )।
  • अर्जुनके साथ युद्ध और वाणोंके खाली हो जानेपर इसका उनके समक्ष नीचा देखना ( विराट० ५१ । १-१५ )।
  • दुर्योधनसे दस दिनमें पाण्डवसेनाको नष्ट करनेकी शक्तिका कथन ( उद्योग० १३ । ११ )।
  • प्रथम दिनके युद्धमें इसका शिखण्डीके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ४४ । ४६-४८ )।
  • दूसरे दिनके युद्धमें शल्य और कृपाके साथ रहकर इसका धृष्टद्युम्न और अभिमन्युसे युद्ध करना ( भीष्म० ५५ । १-७ )।
  • अर्जुनके साथ जूझना ( भीष्म० ७३ । १६-३६ )।
  • इसके द्वारा शिखण्डीकी पराजय ( भीष्म० ८२ । ३४-३८ )।
  • अनूप-नरेश नीलकी पराजय ( भीष्म० ९४ । ३५-३६ )।
  • सात्यकिके प्रहारसे इसका मूर्च्छित होना ( भीष्म० १०१ । ४६-४७ )।
  • विराट और द्रुपदके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० १११ । १९-२१ )।
  • विराट और द्रुपदके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० १११ । २२-२७ )।
  • सात्यकिके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० १११ । २६-३१ )।
  • प्रतिविन्ध्यके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । २९-३१ )।
  • इसके द्वारा राजा नीलका वध ( द्रोण० ३१ । २४-२५ )।
  • इसका अभिमन्युको घायल करना ( द्रोण० ३७ । २४- ३१ )।
  • इसके ध्वजका वर्णन ( द्रोण० १०५ । १०-११ )।
  • अर्जुनके वाणोंसे व्याकुल होकर अश्वत्थामाका भागना ( द्रोण० १२९ । १२१-१२३ )।
  • अर्जुनके साथ युद्ध ( द्रोण० १४५ अध्याय )।
  • अर्जुनके साथ युद्ध और इसकी पराजय ( द्रोण० १४७ । ११ )।
  • इसके द्वारा अंजनपर्वाका वध ( द्रोण० १५६ । ८९-९० )।
  • इसके द्वारा सुरथ, शत्रुंजय, बलानिक, जवानिक और जयाश्व- का वध ( द्रोण० १५६ । १८०-१८१ )।
  • इसके द्वारा राजा श्रुतायुका वध ( द्रोण० १५६ । १८२ )।
  • इसके द्वारा हेममाली, प्रश्न और चन्द्रसेनका वध ( द्रोण० १५६ । १८३ )।
  • इसके द्वारा कुन्तिभोजके दस पुत्रोंका वध ( द्रोण० १५६ । १८३ )।
  • घटोत्कचके साथ युद्धमें उसे पराजित करना ( द्रोण० १५६ । १८४-१८४)।
  • इसका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना ( द्रोण० १५९ । ३-९ )।
  • अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये उद्यत दुर्योधनको रोकना ( द्रोण० १५९ । ८४-८५ )।
  • दुर्योधनको उपालाम्भपूर्ण आश्वासन ( द्रोण० १६० । ३-१० )।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्धमें सेनासहित उसे पराजित करना ( द्रोण० १६० । ४१-४३ )।
  • इसके द्वारा घटोत्कचकी पराजय ( द्रोण० १६६ । १८ )।
  • दुर्योधनसे कौरव सेनाके भागनेका कारण पूछना ( द्रोण० १६३ । ३१-३३ )।
  • कृपाचार्यसे अपने पिताके वधका समाचार सुनकर कुपित होना ( द्रोण० १६३ । ६८-७० )।
  • इसका दुर्योधनके समक्ष क्रोधपूर्ण उद्गार और नारायणास्त्रको प्रकट करना ( द्रोण० १९४ अध्याय )।
  • दुर्योधनको अपनी प्रतिज्ञा सुनाना ( द्रोण० १९९ । ५-७ )।
  • इसके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग ( द्रोण० १९९ । १५ )।
  • पुनः नारायणास्त्र प्रकट करनेमें अश्वत्थामाका अपनी असमर्थता दिखाना ( द्रोण० २०० । २०-२१ )।
  • धृष्टद्युम्नको परास्त करना ( द्रोण० २०० । ४३-४४ )।
  • इसके द्वारा मालवनरेश सुदर्शनका वध ( द्रोण० २०० । ८३ )।
  • इसके द्वारा पौरव दृढक्षत्रका वध ( द्रोण० २०० । ८४ )।
  • इसके द्वारा चेदिदेशके युवराजका वध ( द्रोण० २०० । ८५ )।
  • भीमसेनके साथ घोर युद्ध और उनको पराजित करना ( द्रोण० २०० । ८७-१२८ )।
  • इसके द्वारा आग्नेयास्त्रका प्रयोग ( द्रोण० २०९ । १६-१७ )।
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनको आग्नेयास्त्रसे मुक्त देखकर मन कुछ मिथ्या कहते हुए उसका युद्धस्थलसे भागना ( द्रोण० २०९ । ४५-४७ )।
  • मार्गमें व्यासजीसे भेंट और उनसे श्रीकृष्ण तथा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रभाव न होनेका कारण पूछना ( द्रोण० २०९ । ५०-५५ )।
  • कर्णको सेनापति बनानेकी सलाह देना ( कर्ण० १० । १२-१७ )।
  • भीमसेनके साथ घोर युद्ध और मूर्च्छित होना ( कर्ण० १५ अध्याय )।
  • अर्जुनके साथ घोर युद्ध और पराजित होना ( कर्ण० ३९ । १६-१७ अन्ततक )।
  • पाण्ड्यनरेश मल्यध्वजका वध ( कर्ण० २० । ४६ )।
  • पाण्डव महारथियोंको परास्त करके युधिष्ठिरको भय देना ( कर्ण० ५५ अध्याय )।
  • अर्जुनके साथ युद्धमें पराजित होना ( कर्ण० ५६ । १२१-१२३ )।
  • धृष्टद्युम्नके वधकी प्रतिज्ञा करना ( कर्ण० ५७ । १०-१२ )।
  • धृष्टद्युम्नको दमन करके उसे जीते-जी खींचना ( कर्ण० ५९ । ३९-५३ )।
  • अर्जुनद्वारा पराजित होना ( कर्ण० ५९ । ६०-६१ )।
  • अर्जुनद्वारा पराजित होना ( कर्ण० ६४ । ३१-३२ )।
  • पाण्डवोंके साथ संधि करनेके लिये दुर्योधनसे अनुरोध ( कर्ण० ८८ । २१-२९ )।
  • दुर्योधनके पूछनेपर सेनापतिके लिये शल्यका नाम प्रस्तावित करना ( शल्य० ६ । ११ - २१ )
  • अर्जुनके साथ युद्ध ( शल्य० १४ अध्याय)।
  • इसके द्वारा पाञ्चाल-महारथी सृजयका वध ( शल्य० १४।४३ )।
  • द्रोणवधपर होकर दुर्योधनके सामने सोमकोंके वधकी प्रतिज्ञा करना ( शल्य० ३० । १९- २२ )।
  • सेनासहित युधिष्ठिरके वहाँ पहुँचनेपर हट जाना ( शल्य० ३० । ६३ )।
  • दुर्योधनकी अवस्थापर विषाद करना (शल्य० ५३।२५-२७)।
  • पाञ्चालोंके रक्षा प्रतिज्ञा करना (शल्य० ६५।१३-२०)।
  • सेनापति-पदपर अभिषिक्त हो दुर्योधनको हृदयसे लगाकर युद्धके लिये प्रस्थित होना (शल्य० ६५।४४ )।
  • उल्लूका कौरवोंपर आक्रमण देखकर इसके मनमें क्रूर संकल्पका उदय होना ( सौप्तिक० १ । ४५-४६ )।
  • कृतवर्मा और कृपाचार्यसे सलाह लेना ( सौप्तिक० १ । ५९-६९ )।
  • कृतवर्मा और कृपाचार्यको अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना ( सौप्तिक० २ अध्याय )।
  • कृपाचार्यके समझानेपर उन्हें उत्तर देना ( सौप्तिक० ४।२२-३० )।
  • कृपाचार्यके समझानेपर उन्हें उत्तर देना ( सौप्तिक० ५ । १८-२१ )।
  • कृपाचार्य और कृतवर्माको अपना निश्चय बताना ( सौप्तिक० ५ । ३४- ३७ )।
  • पाण्डवोंके शिविरद्वारपर एक अद्भुत पुरुषसे युद्ध और शस्त्रोंके अभावमें चिन्तित होकर भगवान् शिवकी शरण लेना ( सौप्तिक० ६ अध्याय )।
  • इसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति (सौप्तिक० ७ । १२-१९)।
  • इसके सामने अग्निदेवी और भूतगणोंका प्राकट्य (सौप्तिक० ७ । १३-१५)।
  • इसके द्वारा भगवान् शिवको आत्म- समर्पण (सौप्तिक० ७ । ५२ )।
  • भगवान् शिवद्वारा इसे खड्गकी प्राप्ति (सौप्तिक० ७ । ६६)।
  • इसके द्वारा रातमें सोये हुए पाञ्चालों, सोमकों और द्रौपदी-पुत्रोंका संहार (सौप्तिक० ८ । १७-१२२)।
  • दुर्योधनकी दशा देखकर विलाप करना (सौप्तिक० ९ । १९-४६)।
  • दुर्योधनको पाञ्चालों और द्रौपदी-पुत्रोंके मारे जानेकी खबर सुनाना (सौप्तिक० ९ । ४८-५२)।
  • श्रीकृष्णका इसके द्वारा अपने सुदर्शनचक्र माँगनेकी चर्चा करना (सौप्तिक० १२ अध्याय)।
  • पाण्डवोंके वधके लिये ऐषीकास्त्रका प्रयोग (सौप्तिक० १३ । १९-२२)।
  • व्यासजीसे अपना अस्त्र लौटानेमें अपनी असमर्थता बताना (सौप्तिक० १४।१३-१७)।
  • व्यासजीके कहनेसे अपनी मणि अलग रखकर पाण्डवोंके गर्भपर अस्त्र छोड़ना (सौप्तिक० १४।२८-३५)।
  • अपने अस्त्रको उत्तराके गर्भमें गिरनेका संकल्प करना (सौप्तिक० १४।६-७)।
  • श्रीकृष्णके अभिषापसे हो पाण्डवोंको मणि देकर अश्वत्थामा- का वनको प्रस्थान (सौप्तिक० १४ । २०)।
  • धृतराष्ट्रसे मिलकर इसका व्यासाश्रमकी ओर जाना (स्त्री० ११।२१)।
  • महाभारतमें आये हुए अश्वत्थामाके नाम-आचार्य- नन्दन, आचार्यपुत्र, आचार्यसुत, आचार्यतनय, आचार्य- सत्तम, द्रोणि, द्रोणायनि, द्रोणपुत्र, द्रोणसुत, गुरूपुत्र, गुरुसुत, भारद्वाजपुत्र।
  • ( २ ) मालवनरेश इन्द्रवर्माका हाथी, जो भीमसेनद्वारा मारा गया था (द्रोण० ११७।१५)।

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