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मेरु

  • सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित एक दिव्य पर्वत, जो उपरसे नीचेतक सोनेका ही माना जाता है; यह तेजका महान् पुञ्ज है और अपने शिखरोंसे सूर्यकी प्रभाको भी तिरस्कृत किये देता है । इसपर देवता और गन्धर्व निवास करते हैं । इसका कोई माप नहीं है । मेरुपपर सब ओर भयंकर सर्प भरे पड़े हुए हैं । दिव्य ओषधियाँ इसे प्रकाशित करती रहती हैं । यह महान् पर्वत अपनी ऊँचाईसे स्वर्गलोकको घेरकर खड़ा है । वहाँ किसी समय देवताओंने अमृत-प्राप्तिके लिये परामर्श किया था; इस पर्वतपर भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे कहा था कि देवता और असुर मिलकर महासागरका मन्थन करें, इससे अमृत प्रकट होगा ( आदि० १७ । ९—१३ ) ।
  • इसी मेरु पर्वतके पार्श्वभागमें वसिष्ठजीका आश्रम है ( आदि० ९९ । ६ ) ।
  • यह दिव्य पर्वत अपने चिन्मय स्वरूपसे कुबेरकी सभामें उपस्थित हो उनके उपासना करता है ( सभा० १० । ३३ ) ।
  • यह पर्वत इलावृत्तखण्डके मध्यभागमें स्थित है । मेरुके चारों ओर मण्डलाकार इलावृत्तवर्ष बसा हुआ है । दिव्य सुवर्णमय महामेरु गिरिमें चार प्रकारके रंग दिखायी पड़ते हैं । यहाँतक पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है । इसकी लंबाई एक लाख योजन है । इसके दक्षिण भागमें विशाल जम्बूवृक्ष है; जिसके कारण इस विशाल द्वीपको जम्बूद्वीप कहते हैं ( सभा० २८ । ६ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७४० ) ।
  • अत्यन्त प्रकाशमान महामेरु पर्वत उत्तर दिशामें उदित और प्रतिष्ठित होता है । इसपर ब्रह्मा देवताओंकी ही पहुँच हो सकती है । इसी पर्वतपर ब्रह्मा-जीकी सभा है, जहाँ समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हुए ब्रह्माजी निवास करते हैं । ब्रह्माजीके मानस पुत्रोंका निवास-स्थान भी मेरु पर्वत ही है । वसिष्ठ आदि सप्तर्षि भी यहीं उदित और प्रतिष्ठित होते हैं । मेरुका उत्तम शिखर रजोगुणसे रहित है । इसपर आत्मतृप्त देवताओंके साथ पितृगण ब्रह्मा रहते हैं । यहाँ ब्रह्मलोकसे भी ऊपर भगवान् नारायणका उत्तम स्थान प्रकाशित होता है । परमात्मा विष्णुका यह धाम सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है तथा अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है । जो दिशामें एक पर्वतपर ही भगवान् नारायणका स्थान धुँधला होता है । यहाँ यत्नशील ज्ञानी महात्माओंकी ही पहुँच हो सकती है । उन नारायणधाममें ब्रह्मर्षियोंकी भी गति नहीं है; फिर महर्षियोंकी तो बात ही क्या है । भक्तिके प्रभावसे ही यत्नशील महात्मा यहाँ भगवन् नारायणको प्राप्त होते हैं । यहाँ जाकर मनुष्य फिर इस लोकमें नहीं लौटते हैं । यह परमेश्वरका नित्य अविनाशी और अविकारी स्थान है । नक्षत्रोंसहित सूर्य और चन्द्रमा मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं । अस्ताचलको पहुँचकर संध्याकालकी सीमाको लाँघकर भगवान् सूर्य उत्तर दिशाका आश्रय लेते हैं; फिर मेरुपर्वतका अनुसरण करके उत्तर दिशाकी सीमातक पहुँचकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले सूर्य पुनः पूर्वाभिमुख होकर चलते हैं ( वन० १६३ । १२—४२ ) ।
  • माल्यवान् और गन्धमादन—इन दोनों पर्वतोंके बीचमें मण्डलाकार सुवर्णमयमेरुपर्वत है । इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है । नीचे भी चौरासी हजार योजनतक पृथ्वीके भीतर घुसा हुआ है । इसके पार्श्व भागमें चार द्वीप हैं—भद्राश्व, केतुमाल, जम्बूद्वीप और उत्तरकुरु । इस पर्वतके शिखरपर ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र एक होकर ही नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं । उस समय तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु आदि गन्धर्व यहाँ आकर इनकी स्तुति करते हैं । महात्मा सप्तर्षिगण तथा प्रजापति कश्यप प्रत्येक पर्वके दिन इस पर्वतपर पधारते हैं । दैत्योंसहित शुक्राचार्य मेरु पर्वतके ही शिखर-पर निवास करते हैं । यहाँके सब रत्न और रत्नमय पदार्थ उन्हींके अधिकारमें है । भगवान् कुबेर उन्हींसे धनका चतुर्थ भाग प्राप्त करके उसका सदुपयोग करते हैं । सुमेरु पर्वतके उत्तर भागमें दिव्य एवं रमणीय कर्णिकारवन है। वहाँ भगवान् शंकर कनेरकी दिव्य माला धारण करके भगवती उमाके साथ विहार करते हैं। इस पर्वतके शिखरसे धारवाली पुण्यमयी भागीरथी गङ्गा गिरती है। मेरुके पश्चिम भागमें केतुमाल वर्ष है, जहाँ जम्बूखण्ड नामक प्रदेश है। वहाँके निवासियोंकी आयु दस हजार वर्षोंकी होती है। वहाँके पुरुष सुवर्णके समान कान्तिमान् और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान सुन्दरी होती हैं। उन्हें कभी रोग-शोक नहीं होता। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है ( भीष्म० ६ । १०-३३ ) ।
  • पृथ्वी-द्वारा पृथ्वीदोहनके समय यह मेरु पर्वत दोग्धा ( दुहने-वाला ) बना था ( द्रोण० ६९ । १८ ) ।
  • त्रिपुर-दाहके लिये जाते हुए भगवान् शिवने मेरु पर्वतको अपने रथकी ध्वजाका दण्ड बनाया था ( द्रोण० २०२ । ७८ ) ।
  • मेरुने स्कन्दको काञ्चन और मेघमाली नामक दो पार्षद प्रदान किये ( शल्य० ४५ । ४८-४९ ) ।
  • इसने पृथुको सुवर्णराशि दी थी ( शान्ति० ५९ । ९ ) ।
  • यह पर्वतों-का राजा बनाया गया था ( शान्ति० २२२ । २६ ) ।
  • व्यासजी अपने शिष्योंके साथ मेरु पर्वतपर निवास करते हैं ( शान्ति० २३१ । २२-२३ ) ।
  • स्थूलशिरा और बड़वा-मुखने यहाँ तपस्या की थी ( शान्ति० ३४२ । ५९-६० ) ।

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