← अनुक्रमणिका

यदु

  • (१) राजा ययातिके प्रथम पुत्र, जो देवयानीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ७५ । ३५; आदि० ८३ । ९ ) ।
  • इनका अपने पिताको युवावस्था देनेसे अस्वीकार करना ( आदि० ७५ । ४३; आदि० ८४ । ५ ) ।
  • ययातिका इनकी संतानको राज्याधिकारसे वंचित होनेका शाप देना ( आदि० ८४ । ९ ) ।
  • यदुकी ही संतानें यादव कहलायीं ( आदि० १५ । १० ) ।
  • भगवान् नारायणने अपने मस्तकसे दो केश निकाले, जिनमेंसे एक श्वेत था, एक श्याम । वे दोनों केश यदुकुलकी दो स्त्रियों रोहिणी तथा देवकीके भीतर प्रविष्ट हुए । रोहिणीसे बलदेवजी प्रकट हुए, जो भगवान् नारायणके श्वेत केश-रूप थे और देवकीके गर्भसे श्याम केशस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव हुआ ( आदि० १९६ । ३२-३३ ) ।
  • यदु देवयानीके पुत्र और शुक्राचार्यके दौहित्र थे, वे बलवान्, उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न एवं यादववंशके प्रवर्तक थे । इनकी बुद्धि बड़ी मन्द थी । इन्होंने धर्ममें आकर समस्त क्षत्रियोंका अपमान किया था । ये पिताके आदेशपर नहीं चलते थे । भाइयों और पिताका अपमान करते थे । उन दिनों भूमण्डलमें यदु ही सबसे अधिक बलवान् थे और समस्त राजाओंको वशमें करके हस्तिनापुरमें निवास करते थे । इनके पिता ययातिने अत्यन्त कुपित हो इन्हें शाप दे दिया और राज्यसे भी उतार दिया । जिन भाइयोंने इनका अनुसरण किया, उनको भी पिताका शाप प्राप्त हुआ ( उद्योग० १४ । ६-११ ) ।
  • इन्हें यदुके वंशमें देवमीढ़ नामसे विख्यात एक यादव हो गये हैं, जिनके पुत्रका नाम शूर था ( द्रोण० १४४ । ६-७ ) ।
  • यदुके पुत्रका नाम क्रोष्टा था ( अनु० १४७ । २८ ) ।
  • (१) समस्त प्राणियोंका नियमन करनेवाले यमराज, जो भगवान् सूर्यके पुत्र तथा सबके शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी हैं ( आदि० ७० । ३०; आदि० ७५ । २२ ) ।
  • इन्हें भू-लोकमें जन्म लेनेके लिये माण्डव्य ऋषिका शाप ( आदि० १०७ । १५-१६ ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरको देखनेके लिये इनका आगमन ( आदि० १८६ । ६ ) ।
  • नैमिषारण्यमें इनके द्वारा देवताओंके यज्ञमें शामित्र-कर्म-सम्पादन ( आदि० १९६ । १ ) ।
  • खाण्डवदाहके समय श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये इन्द्रकी ओरसे ये भी कालदण्ड लेकर आये थे ( आदि० २२३ । ३३ ) ।
  • ये एक हजार युग बीतनेपर बिन्दुसरोवरपर यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ( सभा० ३ । १५ ) ।
  • नारदजीके द्वारा इनकी दिव्य सभाका वर्णन ( सभा० ८ अध्याय ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ११ । ५१ ) ।
  • इनके द्वारा अर्जुनको दण्डका दान ( वन० ४१ । २५ ) ।
  • दमयन्ती-स्वयंवरमें इनके द्वारा राजा नलको वर-प्रदान ( वन० ५० । ३० ) ।
  • सावित्रीको अनेक वर देनेके पश्चात् इनका सत्यवान्को जीवित करना ( वन० २६७ । ११-६० ) ।
  • इन्द्रने इन्हें तिरोदका राजा बनाया था ( उद्योग० १६ । १४ ) ।
  • पितरोंद्वारा पृथ्वी-दोहनके समय ये बछड़ा बने थे ( द्रोण० ६९ । २६ ) ।
  • त्रिपुर-दाहके समय ये भगवान् शिवके बाणके पृष्ठभागमें प्रतिष्ठित हुए थे ( द्रोण० २०२ । ७७ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको उन्माथ और प्रमाथ नामक दो पार्षदोंका दान ( शल्य० ४५ । ३० ) ।
  • महर्षि गौतमके साथ इनका धर्मविषयक संवाद ( शान्ति० १२९ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा जापक ब्राह्मणको वरदान ( शान्ति० १९९ । ३० ) ।
  • इनको नारायणसे शिवसहस्रनामका उपदेश मिला और इन्होंने नाचिकेताको इसका उपदेश किया ( अनु० १७ । १७८-८१ ) ।
  • इनका अपने दूतोंकी शर्मा नामक ब्राह्मणको लानेका आदेश ( अनु० ६८ । ६-९ ) ।
  • ब्राह्मणकी तिल, जल और अन्नके दानकी महिमा बतलाना ( अनु० ६८ । १६-२२ ) ।
  • नाचिकेताके साथ संवादमें गोदानकी महिमा बतलाना ( अनु० ७१ । १८-२६ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन स्कन्दको दिये गये दो पार्षदोंमेंसे एक, दूसरेका नाम था अति यम ( शल्य० ४५ । ४५ ) ।
  • एक देश और जातिके लोग—यहाँके राजा, राजकुमार और निवासी भी युधिष्ठिरके अश्वमेध यज्ञमें भेंट लेकर आये थे ( सभा० ५२ । १९-२० ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in