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यमुना

  • ( सूर्यपुत्री यमुन ) जो परम पावन नदीके रूपमें विराज रही हैं; कलिन्द पर्वतसे निकलनेके कारण इन्हें कालिन्दी कहते हैं । ये यमुनोत्तरीसे निकलकर प्रयागमें आयी हैं; वहाँ गङ्गाजीके साथ इनका संगम हुआ है । भगवान् श्रीकृष्णकी परम पावन लीलास्थली इन्हींके तटपर है; ये आधिदैविकरूपसे भगवान् श्रीकृष्णकी पट्टमहिषी थीं । ) यमुनाजीके दोमेंसे पराशरजीने सत्यवतीके गर्भसे व्यासजीको उत्पन्न किया था ( आदि० ६० । २ ) ।
  • (२) ये गङ्गाकी सात धाराओंमेंसे एक हैं, जो इनका जल पीते हैं, वे पापमुक्त हो जाते हैं ( आदि० १९९ । १९-२१ ) ।
  • जरासंधके मन्त्री और सेनापति हंस तथा डिम्भक यमुनाजीमें कूदकर मर गये थे ( सभा० १४ । ४३-४४ ) ।
  • वनगमनके समय पाण्डव लोग यमुनाके जलका सेवन करके आगे बढ़े थे ( वन० ५ । २ ) ।
  • संजयपुत्र सहदेवने यमुनाटपर लाख स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा देकर अग्निकी उपासना की थी ( वन० १० । ७ ) ।
  • राजा भरतने यमुनाके तटपर पैंतीस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ( वन० १० । १८ ) ।
  • ये आर्चिक पर्वतके पास बहती हैं । ब्रह्मर्षिसेवित पुण्यमयी नदी हैं और पापके भयको दूर भगाती हैं । इनके तटपर मान्धाता और दानिशिरोमणि सहदेवकुमार सोमकने यज्ञ किया था ( वन० १२५ । २९-२६ ) ।
  • इनके तटपर नाभागपुत्र राजा अम्बरीषने यज्ञ किया था ( वन० १२९ । २ ) ।
  • अगस्त्यने यमुना-तटपर घोर तपस्या की थी ( वन० १६१ । १९ ) ।
  • राजा शान्तनुने यमुनाटपर सात बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ( वन० १६२ । २५ ) ।
  • ये भारतकी उन प्रमुख नदियोंमें से हैं, जिनका जल भारतीय प्रजा पीती है ( भीष्म० ९ । १५ ) ।
  • भरतने यमुनाटपर एक बार सौ अश्वमेध यज्ञ किये ( द्रोण० ६८ । ८ ) ।
  • इन्होंने ही इसी नदीके तटपर तीन सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किये थे ( शान्ति० २९ । ४६ ) ।

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