← अनुक्रमणिका

ययाति

  • एक प्राचीन राजर्षि ( आदि० ९ । २२९ ) ।
  • (२) महाराज नहुषके द्वितीय पुत्र । इनके बड़े भाई यतिने राज्यका त्यागकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये; अतः ये ही भूमण्डलके सम्राट् हुए । इन्होंने इस पृथ्वीका पालन और बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ( आदि० ७५ । २०-२२ ) ।
  • (३) ये अपराजित मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले और भक्तिभावसे देवताओं तथा पितरोंका पूजन करनेवाले थे ( आदि० ७५ । २३ ) ।
  • (४) देवयानी और शर्मिष्ठाने इनके पाँच पुत्रोंकी उत्पत्ति, पुत्रोंसे इनकी यौवन-याचना, कनिष्ठ पुत्रकी युवावस्थासे दोनों पत्नियों और विश्वाची अप्सराके साथ इनके विहार तथा कामभोगसे तृप्त न होनेपर इनके द्वारा वैराग्यपूर्ण गाथा-गान आदिकी संक्षिप्त कथा ( आदि० ७५ । ३४-५८ ) ।
  • (५) कुएँमें गिरी हुई देवयानीका इनके द्वारा हाथ पकड़कर उद्धार ( आदि० ७८ । १९-२३ ) ।
  • (६) देवयानीद्वारा इनसे विवाहके लिये प्रार्थना ( आदि० ७८ । २३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • (७) ब्राह्मणकन्या होनेके कारण इनका देवयानीकी प्रार्थनाको अस्वीकार करना और उसकी अनुमति ले अपने नगरको जाना ( आदि० ७८ । २३ के बाद दाक्षिणात्य पाठसहित २४ तक ) ।
  • (८) सखियोंके साथ विचरण करती हुई देवयानीसे इनकी वनमें भेंट ( आदि० ८१ । १-७ ) ।
  • (९) ययाति और देवयानीका संवाद—दोनोंका एक दूसरेसे परिचय पूछना और अपना परिचय देना; देवयानीका इनके साथ विवाहका प्रस्ताव, ययातिका शुक्राचार्यके शापसे भय बताना, देवयानीका धात्रीको भेजकर अपने पिताको बुलवाना और उनसे अपनी राजा नहुषके हाथमें देना; शुक्राचार्यका अपनी पुत्रीको बुलाना और उन्हें वर्णसङ्करजनित अधर्मके विषयमें सावधान करना; साथ ही शर्मिष्ठाको अपनी शय्यापर न बुलानेके लिये सावधान करना । ययातिका देवयानीके साथ शास्त्रोक्त रीतिसे विवाह तथा दो हजार सखियों-सहित देवयानीको साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरको जाना ( आदि० ८१ । ८-३६ ) ।
  • (१०) ययातिसे देवयानीको पुत्रोंकी प्राप्ति ( आदि० ८२ । ४ ) ।
  • (११) ययातिको एकान्तमें देखकर शर्मिष्ठाका
  • इनके पास जाना और अपने ऋतुकालके लिये प्रार्थना करना; इस विषयमें ययाति-शर्मिष्ठा-संवाद । शर्मिष्ठाके कथनकी यथार्थताको स्वीकार करके ययातिका धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाना और इनके साथ सहवास करके शर्मिष्ठाका पुत्रको जन्म देना ( आदि० ८२ । १—२० ) ।
  • ययातिको देवयानीसे यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठाके गर्भसे द्रुह्यु, अनु तथा पूरु नामक तीन पुत्रोंको जन्म देना ( आदि० ८३ । १—१० ) ।
  • वनमें शर्मिष्ठाके पुत्रोंको खेलते देख देवयानीका ययातिसे उनके विषयमें पूछना । ये ययातिके ही पुत्र हैं—यह पता लगनेपर देवयानीका इनसे रूठकर पिताके पास जाना और ययातिका भी उसे मनानेके लिये उसके पीछे पीछे जाना ( आदि० ८३ । ११—२० ) ।
  • पुत्रीके मुखसे ययातिका अपराध सुनकर शुक्राचार्यद्वारा इनको जराग्रस्त होनेका अभिशाप ( आदि० ८३ । २६—३१ ) ।
  • ययातिका अपनी सफाई देना और शुक्राचार्यसे जरा-वस्थाकी निवृत्तिके लिये प्रार्थना करना ( आदि० ८३ । ३२—३८ ) ।
  • शुक्राचार्यका ययातिको दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल देनेकी सुविधा देना और जो पुत्र अपनी युवावस्था दे, उनके लिये राजा होनेका वर प्रदान करना ( आदि० ८३ । ३९—४२ ) ।
  • इनका यदुसे उनको युवावस्था माँगना और उनके अस्वीकार करनेपर इनका उनसे राज्याधिकारसे वञ्चित होनेका शाप देना ( आदि० ८४ । १—५ ) ।
  • इनका तुर्वसुसे युवावस्था माँगना और उनके द्वारा स्वीकार न करनेपर उनको म्लेच्छोंमें राजा होनेका शाप देना ( आदि० ८४ । १०—१२ ) ।
  • इनका द्रुह्युसे यौवन माँगना और न देनेपर उन्हें कभी भी उनके मनोरथ सिद्ध न होने, अति दुर्गम देशोंमें रहने तथा राज्याधिकारसे वञ्चित होकर 'भोज' कहलानेका शाप देना ( आदि० ८४ । १६—२२ ) ।
  • इनका अनुसे उनकी जवानी माँगना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें जराग्रस्त होने, युवा होते ही उनको सेनानीका मरने तथा अग्निहोत्रत्यागी बननेका शाप देना ( आदि० ८४ । २३—२६ ) ।
  • इनका पूरुसे उनकी युवावस्था माँगना, पूरुका इनकी आज्ञाको सहर्ष स्वीकार करना तथा उनके आज्ञापालनसे संतुष्ट हो इनका पूरुको वर-दान देना ( आदि० ८४ । २७—३४ ) ।
  • इनका सहस्र वर्षोंतक विषयसेवन करनेसे भी उस पूरुमें वैराग्यपूर्ण उत्तर; पूरुको इनकी जवानी लौटाकर वृद्धावस्था ग्रहण करना और पूरुके राज्याधिकारका विरोध करनेवाली प्रजाओंको इनका उद्दण्ड
  • राज्य न देनेका कारण बताकर पूरुके राज्याभिषेकके लिये उनसे अनुमति लेना । प्रजावर्गका अनुमति मिल जानेपर पूरुका राज्याभिषेक करना; इनका वनमें जाना ( आदि० ८५ । १—३३ ) ।
  • इनके पुत्रोंमें यदुसे यादव, तुर्वसुसे यवन ( तुर्क ), द्रुह्युसे भोज, अनुसे म्लेच्छ जातिके लोग और पूरुसे पौरव हुए ( आदि० ८५ । ३४—३५ ) ।
  • इनका स्वर्गसे नीचे गिरना, वहाँसे गिरने, आकाशमें ही ठहरने, वसुमान्, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर सत्संगके प्रभावसे पुनः स्वर्गलोक जानेकी संक्षिप्त कथा ( आदि० ८६ । १—९ ) ।
  • एक हजार वर्षोंतक इनकी घोर तपस्या और स्वर्गगमन ( आदि० ८६ । १२—१७ ) ।
  • इन्द्रके पूछनेपर इनका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना ( आदि० ८७ अध्याय ) ।
  • आत्मप्रशंसा और अन्य सत्पुरुषोंकी निन्दारूप दोषके कारण पुण्य क्षीण होनेसे इन्द्रकी प्रेरणासे इनका स्वर्गसे नीचे गिरना और सत्पुरुषोंके समीप ही गिरनेके लिये इन्द्रसे वर प्राप्त करना ( आदि० ८८ । १—५ ) ।
  • इन्हें आकाशसे गिरते देख राजर्षि अष्टकका इनको आश्वासन देते हुए इनका परिचय पूछना ( आदि० ८८ । ६—१३ ) ।
  • ययातिका अष्टकको अपना परिचय देना तथा ययाति और अष्टकका संवाद ( आदि० अध्याय ८९ से ९० तक ) ।
  • ययाति और अष्टकका आश्रम-धर्मसम्बन्धी संवाद ( आदि० ९१ अध्याय ) ।
  • अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना ( आदि० ९२ अध्याय ) ।
  • इनका वसुमान् और शिबिके पुण्यदानको भी अस्वीकार करना; इनकी पुत्री माधवीका आकर इन्हें प्रणाम करना और अपने अष्टक आदि चारों पुत्रोंको इनका परिचय देना तथा दौहित्रोंके पुण्यको अपना ही पुण्य बताकर ययातिसे उसको ग्रहण करनेके लिये कहना तथा पुत्री और दौहित्रोंने मेरा उद्धार कर दिया—ऐसा कहकर ययातिका उस पुण्यको ग्रहण करना और अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना, इनके द्वारा शिबिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन और सत्यकी महिमाका वर्णन ( आदि० ९३ अध्याय ) ।
  • इनके दो पत्नियाँ थीं—शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा । इनके वंशका परिचय देनेवाले एक श्लोकका भाव इस प्रकार है—देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ( आदि० ९४ । ७—९ ) ।
  • ये यमसभामें रहकर पूरुकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । ८ ) ।
  • इनके द्वारा गुरुदक्षिणा देनेके लिये एक ब्राह्मणको हजार गौओंका दान ( वन० १९५ अध्याय ) ।
  • ये
  • अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये इन्द्रके साथ उनके विमानमें बैठकर आये थे ( विराट० ५६ । ९-१० ) ।
  • गरुड और गालवका राजा ययातिके यहाँ जाकर गुरुको देनेके लिये आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ोंकी याचना करना ( उद्योग० ११४ अध्याय ) ।
  • ये सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, दाता, दानपति, प्रभावशाली, राजोचित तेजसे प्रकाशित होनेवाले तथा सम्पूर्ण नरेशोंके स्वामी ( सम्राट् ) थे ( उद्योग० ११५ । १-२ ) ।
  • इनका गालवको कृपाण देनेके लिये अपनी कन्या माधवीको समर्पित करना ( उद्योग० ११५ । ५-१४ ) ।
  • इनके द्वारा अभिमानवश स्वर्गमें देवताओं, मनुष्यों और महर्षियोंकी अवहेलना ( उद्योग० १२० । १५-१६ ) ।
  • इनका स्वर्गलोकसे पतन ( उद्योग० १२१ । ११ ) ।
  • दौहित्रोंके पुण्यदानसे इनका पुनः स्वर्गारोहण ( उद्योग० १२२ । १५ ) ।
  • इनका ब्रह्मासे अपने अधःपतनका कारण पूछना ( उद्योग० १२३ । १२-१३ ) ।
  • सूक्ष्माको समझाते हुए नारदद्वारा इनके दान-यज्ञ आद सत्कार्योंका वर्णन ( द्रोण० ६३ अध्याय ) ।
  • इनके यज्ञ-वैभवका वर्णन ( शल्य० ४१ । ३३-३९ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा नारद-सञ्जय-संवादके रूपमें इनके यज्ञका वर्णन ( शान्ति० २९ । १४-१९ ) ।
  • इन्हें नहुषसे खड्गकी प्राप्ति हुई और इन्होंने पूरुको वह खड्ग प्रदान किया ( शान्ति० १६६ । ७४ ) ।
  • बोध्य ऋषिस शान्तिके विषयमें इनका प्रश्न ( शान्ति० १७८ । ५ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर इनका शाप खाना ( अनु० १४ । २७ ) ।
  • इनके द्वारा मांस-भक्षणका निषेध ( अनु० ११५ । ५८-६१ ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in