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युयुत्सु

  • (१) धृतराष्ट्रद्वारा वैश्यजातीय भार्याके गर्भसे उत्पन्न पुत्र। इसकी 'करण' संज्ञा थी ( आदि० ११३ । ११ ) ।
  • इसका उल्लेख ( आदि० ११३ । १३ ) ।
  • दुर्योधनकी प्रेरणासे भीमसेनके भोजनमें दिये हुए विषकी बात गुप्त रीतिसे ही सूचना ( आदि० १२८ । ३७-३८ ) ।
  • इसके द्वारा भीमसेनको सूचना ( आदि० १२८ । ३८ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८५ । २ ) ।
  • कुरुक्षेत्रके मैदानमें पाण्डवोंके पक्षमें आना ( भीष्म० ४३ । १०० ) ।
  • यह योद्धाओंमें श्रेष्ठ, धनुर्धरोंमें उत्तम, शौर्यसम्पन्न, सत्यप्रतिज्ञ और महाबली था । वारणावतनगरमें बहुत-से राजा क्रोधमें भरकर युयुत्सुपर चढ़ आये और उसे मार डालना चाहते थे; किंतु इसे परास्त न कर सके ( द्रोण० १० । ५८-५९ ) ।
  • इसके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । ३४-३५ ) ।
  • सुबाहु के साथ युद्ध करके उसकी दोनों भुजाएँ काटना ( द्रोण० २५ । १२ । १४ ) ।
  • भूरिश्रवाके हाथोद्वारा इसके रथके घोड़ोंका मारा जाना ( द्रोण० २६ । ५६ ) ।
  • अभिमन्युवधसे दर्पोन्मत्त हुए कौरवोंको इनका उपालम्भ देना ( द्रोण० ७२ । ६०-६३ ) ।
  • युद्धमें इसका पराजित होना ( कर्ण० २९ । ११ ) ।
  • श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरसे आज्ञा लेकर इनका राजतिलकके साथ हस्तिनापुर लौटना ( शल्य० २९ । ६६-६८ ) ।
  • विदुरजीके पूछनेपर उन्हें सब समाचार बताना ( शल्य० २९ । ९१-९५ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इसे धृतराष्ट्रकी सेवाका भार सौंपा जाना ( शान्ति० ४१ । १७-१८ ) ।
  • भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारके लिये चिता-निर्माण करनेमें पाण्डवोंके साथ यह भी था ( अनु० १६८ । ११ ) ।
  • मरुत्तका धन लानेके लिये पाण्डवोंके हिमालय जानेपर यह हस्तिनापुरकी रक्षा में नियुक्त था ( आश्रम० २३ । २४ ) ।
  • पाण्डवलोग जब वनमें घूमते फिरते थे, उस समय भी नगर-रक्षाका भार इसीपर था ( आश्रम० २३ । १५ ) ।
  • युयुत्सुको आगे करके पाण्डवोंके पुत्र-पौत्रके लिये जलाञ्जलि दी ( आश्रम० ३९ । १२ ) ।
  • महाप्रस्थानके समय बालक पराङ्कितको राज्यपर अभिषिक्त करके जब युधिष्ठिर जाने लगे, उस समय उन्होंने युयुत्सुको ही राज्यकी रक्षाका भार सौंपा था ( महाप्रस्थान० १ । ६ ) ।

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