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राम ( रामचन्द्र )

  • अविनाशी महाबाहु भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप दशरथनन्दन श्रीराम । जगत्की प्रसन्नता बढ़ाने और धर्मकी स्थापनाके लिये श्रीहरिने अपने-आपको चार रूपोंमें विभक्त करके चैत्र शुक्ला नवमीको इस भूतलपर अवतार लिया था; श्रीरामको साक्षात् भूतनाथ श्रीहरिका स्वरूप बताया जाता है । इनका विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्न डालनेके कारण सुबाहुका वध करना और मारीचको भी चोट पहुँचाना । विश्वामित्रद्वारा इन्हें देवताओंके लिये दुर्जय दिव्यास्त्रोंका दान । जनकके धनुषयज्ञमें इनके द्वारा शिवजीके धनुषका भञ्जन । सीता-जीके साथ इनका विवाह । पिताकी आज्ञासे इनका चौदह वर्षके लिये वनवास । इनके द्वारा जनस्थानमें रहकर देवताओंके कार्यका साधन और वहीं जनहितके लिये चौदह हजार राक्षसोंका वध । राक्षसोंके षड्यन्त्रसे इनकी पत्नी सीताका अपहरण । सुग्रीवके साथ इनकी मित्रता । इनके द्वारा वानरराज वालीका वध और सुग्रीवका राज्याभिषेक । इनका समुद्रपर सेतु बाँधकर लङ्कामें प्रवेश और इनके द्वारा रावणका वध । विभीषणका लङ्काके राज-
  • पदपर अभिषेक और उन्हें अमरत्वबलसहित पुष्पकविमानद्वारा अयोध्यामें आकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन । इनकी आज्ञासे शत्रुघ्नद्वारा मधुरानिवासी मधुपुत्र लवणासुरका वध । इनके द्वारा दस अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान । इनके राज्यकी विशेषता ( सभा० २८ । २९ के बाद, पृष्ठ ७९४ से ७९५ तक ) ।
  • सरयूके गोप्रतार तीर्थमें सेवकों-वाहनोंके साथ स्नानकर श्रीराम अपने नित्यधामको पधारे थे ( वन० ८४ । १०-११ ) ।
  • लोमशजीका युधिष्ठिरको इनके संक्षिप्त चरित्रका वर्णन ( वन० ९९ । ४५-७१ ) ।
  • हनुमान्‌द्वारा भीमसेनके प्रति इनके संक्षिप्त चरित्रका वर्णन ( वन० १४८ अध्याय ) ।
  • इनके पिताका नाम दशरथ, माताका नाम कौसल्या तथा पत्नीका नाम सीता था ( वन० २७४ । ६-९ ) ।
  • ये अपने चार भाइयोंमें ज्येष्ठ थे और बुद्धिमान् थे । अपने मनोहर रूप एवं सुन्दर स्वभावसे समस्त प्रजाको आनन्दित करते थे । सबका मन इन्हींमें रमता था । इनके सिवा ये पिताके मनमें भी आनन्द बढ़ानेवाले थे । पिताके मनमें इन्हें युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी इच्छा हुई; अतः इस विषयमें उन्होंने मन्त्रियों और धर्मज्ञ पुरोहितोंमें सलाह ली । सबने एक स्वरसे उनके इस समयोचित प्रस्तावका अनुमोदन किया ( वन० २७७ । ६-८ ) ।
  • श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र सुन्दर और कुछ-कुछ लाल थे । भुजाएँ बड़ी एवं घुटनोंतक लम्बी थीं । ये मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे । इनकी ग्रीवा शङ्खके समान सुन्दर, छाती चौड़ी और गिरधर काळे-काळे घुँघराले बाल थे । इनकी देह दिव्य दीप्तिसे दमकती रहती थी । युद्धमें इनका पराक्रम देवराज इन्द्रसे कम नहीं था । ये समस्त धर्मोंके पारंगत विद्वान् और वृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे । सम्पूर्ण प्रजाका इनमें अनुराग था । ये सभी विद्याओंमें प्रवीण तथा जितेन्द्रिय थे । इनका अद्भुत रूप देखकर शत्रुओंके भी नेत्र और मन लुभा जाते थे । ये दुष्टोंका दमन करनेमें समर्थ, धर्मात्माओंके संरक्षक, धैर्यवान्, दुर्धर्ष, विजयी तथा अपराजित थे । कौसल्यानन्दन श्रीरामको देखकर पिता दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता होती थी ( वन० २७७ । ९-१३ ) ।
  • मन्थराके बहकानेसे कैकेयीका राजा दशरथसे भरतके राज्याभिषेक और श्रीरामके वनवासका वर माँगना ( वन० २७७ । १६-२६ ) ।
  • पिताके सत्यकी रक्षाके लिये इनका लक्ष्मण और सीताके साथ वन-गमन ( वन० २७७ । २८-२९ ) ।
  • इनके वियोगमें राजा दशरथका देहत्याग ( वन० २७७ । ३० ) ।
  • श्रीराम लक्ष्मणके वनमें चले जानेसे कैकेयीका अयोध्याके राज्यको निष्कण्टक मानकर उसे भरतके हाथोंमें
  • सौंपना । भरतका कैकेयीको फटकारकर भाई श्रीरामका अनुसरण करना और उन्हें लौटानेकी इच्छासे ऋषियों, ब्राह्मणों तथा नगर और जनपदके लोगोंके साथ चित्रकूट जाकर श्रीरामका दर्शन करना ( वन० २७७ । ३१-३८ ) ।
  • श्रीरामकी आज्ञासे भरतका वहाँसे लौटना और इनकी चरण-पादुकाओंको आगे रखकर नन्दिग्राममें रहते हुए राज्यकी देख-भाल करना ( वन० २७७ । ३९ ) ।
  • नगर और जनपदके लोगोंके पुनरागमनकी आज्ञासे इनका खरदूषण आदि चौदह सहस्र राक्षसोंका वध ( वन० २७७ । ४४ ) ।
  • श्रीरामके कहनेसे मारीचकी तपस्या ( वन० २७८ । १-८ ) ।
  • मारीचका रावणको श्रीरामसे भिड़नेका निषेध करना और श्रीरामको ही अपने संन्यासीपनका कारण बताना ( वन० २७८ । ६-८ ) ।
  • मारीचका मृगरूप धारण करके सीताके सामने जाना, सीताका उसे मार लानेके लिये श्रीरामको प्रेरित करना और सीताका प्रिय करनेके लिये लक्ष्मणको उनकी रक्षामें नियुक्त करके श्रीरामका धनुष-बाण ले उस मृगके पीछे जाना ( वन० २७८ । १०-२० ) ।
  • श्रीरामद्वारा मृगरूपधारी मारीचका वध ( वन० २७८ । २१-२२ ) ।
  • रावणद्वारा इनकी पत्नी सीताका अपहरण ( वन० २७८ । ४२-४४ ) ।
  • श्रीरामका सीताको अकेली छोड़कर चले आनेके कारण लक्ष्मणको कोमना और आश्रमकी ओर शीघ्रतापूर्वक जाना । मार्गमें पर्वताकार जटायुको गिरा देख उन्हें राक्षस समझकर लक्ष्मणसहित श्रीरामका धनुष खींचकर उनपर धावा करना और उनके द्वारा अपना परिचय देनेपर उनके निकट जा उनकी दुर्दशा प्रत्यक्ष देखना, 'भ्राताओ! युद्ध करते हुए मुझे रावणने मारा है और वह दक्षिण दिशाको गया है'—यह संकेतसे बताकर जटायुका श्रीरामके सामने ही प्राणत्याग करना । इनके द्वारा जटायुका अन्त्येष्टि-संस्कार ( वन० २७९ । १४-२४ ) ।
  • इनके द्वारा कबन्धकी बायीं भुजाका छेदन ( वन० २७९ । ३६-३७ ) ।
  • कबन्धका विश्वावसु गन्धर्वके रूपमें परिणत हो श्रीरामको अपना परिचय देना और पम्पा सरोवरके निकट ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करनेवाले सुग्रीवके साथ मैत्री स्थापित करनेकी सलाह देकर उनका वहाँसे अन्त-
  • धीन हो जाना ( वन० २७१ । ४०-४८ ) ।
  • पंपा-सरोवरपर जाकर श्रीरामका सीताके लिये विलाप और लक्ष्मणका उन्हें सान्त्वना देना ( वन० २७० । १-६ ) ।
  • इनका पंपा-सरोवरमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करना और ऋष्यमूकके पास जा उसके शिखरपर बैठे हुए पाँच वानरोंको देखना ( वन० २८० । ८-९ ) ।
  • हनुमान्‌जीसे भेंट और वार्तालापके पश्चात् इनकी सुग्रीवके साथ मित्रता और उनसे अपना कार्य निवेदन करना । सुग्रीवका मीताके गिराये हुए वस्त्रको इन्हें दिखाना ( वन० २८० । १०-१२ ) ।
  • श्रीरामका सुग्रीवको वानरराजके पदपर अभिषिक्त करना तथा वालीको मार गिरानेकी प्रतिज्ञा करना । सुग्रीवका भी सीताको ढूँढ़ लानेका विश्वास दिलाना ( वन० २८० । १३-१४ ) ।
  • इनके द्वारा वालीका वध ( वन० २८० । १५-१८ ) ।
  • इनका वर्षाके चार मासतक माल्यवान्‌के सुन्दर पृष्ठ-भागपर निवास करना ( वन० २८० । १९ ) ।
  • इनका सुग्रीवपर कोप ( वन० २८२ । ५-११ ) ।
  • लक्ष्मणका सुग्रीवको साथ लेकर माल्यवान् पर्वतके शिखरपर श्रीरामके पास आना और उनके द्वारा किये जानेवाले सीताके अनुसंधान-कार्यकी सूचना देना ( वन० २८२ । २२ ) ।
  • श्रीहनुमान्‌जीका लंकासे लौटकर श्रीरामको वहाँका वृत्तान्त एवं सीताका कुशल-समाचार सुनाना ( वन० २८२ । ३७-४१ ) ।
  • श्रीरामके पास विभिन्न देशोंसे विशाल वानर-सेनापतियोंका वानर-यूथ-पतियोंका आगमन ( वन० २८३ । १-१३ ) ।
  • शुभ-मुहूर्तमें सेनासहित श्रीरामका लंकाको प्रस्थान ( वन० २८३ । १४-१५ ) ।
  • श्रीरामका समुद्रसे पार होनेके लिये वानरोंसे उपाय पूछना और समुद्रकी आराधनाका निश्चय करके उसके तटपर धरना देना ( वन० २८३ । २३-३२ ) ।
  • स्वप्नमें समुद्रका श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन देकर उन्हें नलके द्वारा सेतु बाँधकर उनसे सेनासहित पार जानेका परामर्श देना ( वन० २८३ । ३३-४२ ) ।
  • श्रीरामका नलको आदेश देकर समुद्रपर सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा पुल तैयार कराना ( वन० २८३ । ४३-४५ ) ।
  • इनके पास सचिवोंसहित विभीषणका आगमन तथा श्रीरामका चरित्र और चेष्टाओंद्वारा उन्हें शुद्ध पाकर उनपर संतुष्ट होना, उन्हें राक्षसके राज्यपर अभिषिक्त करना; सलाहकार बनना और उन्हींकी रायसे महासागरको पार करना ( वन० २८३ । ४६-५० ) ।
  • इनका लंकाकी सीमामें पहुँचकर वहाँके उद्यानोंको नष्ट- भ्रष्ट करना; विभीषणकी कैदमें पड़े हुए शुक और सारणको अपनी सेनाका दर्शन कराकर छोड़ना और अङ्गदको रावणके दरबारमें दूत बनाकर भेजना ( वन० २८३ । ५१-५४ ) ।
  • अङ्गदका रावणके पास जाकर
  • श्रीरामका संदेश सुनाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामको वहाँकी सारी बातें बताकर इनके द्वारा प्रशंसित होना ( वन० २८४ । १-२२ ) ।
  • इनके द्वारा निशाचरोंका संहार ( वन० २८४ । ३१ ) ।
  • श्रीराम और रावणकी सेनाओंका द्वन्द्वयुद्ध ( वन० २८५ अध्याय ) ।
  • इन्द्रजित्- द्वारा किये गये मायामय युद्धमें लक्ष्मणसहित श्रीरामकी मूर्च्छा ( वन० २८८ अध्याय ) ।
  • इनका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना ( वन० २८९ । १-१२ ) ।
  • श्रीराम और रावणका युद्ध तथा इनके द्वारा रावणका वध ( वन० २९० अध्याय ) ।
  • सीताके प्रति श्रीरामका संदेह; इनके पास ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, कुबेर, स्वर्गीय महाराज दशरथका आगमन, सीताका इनके समक्ष आत्मशुद्धि के लिये शपथ खाना, वायु-अग्नि आदि देवताओंका इनके सामने सीताकी शुद्धिका समर्थन करना । दशरथका इन्हें अयोध्या जाकर राज्य- शासन करनेकी आज्ञा देना, श्रीरामका देवताओंको नमस्कार करके भरतको तथा सीतासे मिलना, अविघ्नको वरदान और त्रिजटाको धन एवं सम्मान देकर संतुष्ट करना ( वन० २९१ । १-४१ ) ।
  • ब्रह्माजीके दिये हुए वरसे श्रीरामका मरे हुए वानरोंको जिलाना, मातलिंका इन्हें रथ देना और श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा दलबलसहित किष्किन्धा में पधारकर सुग्रीवका राज्याभिषेक करके अङ्गदको युवराज-पदपर प्रतिष्ठित करना तथा अयोध्यामें लौट- कर भरतसे मिलना एवं राज्यपर अभिषिक्त होना ( वन० २९१ । ४२-६६ ) ।
  • राज्याभिषेकके बाद श्रीरामका सुग्रीव और विभीषणको सादर विदा करना, पुष्पकविमानको कुबेरके पास लौटा देना और गोमतीके तटपर ( नैमिषारण्यमें ) दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करना ( वन० २९१ । ६७-७० ) ।
  • संजयको समझाते हुए नारदजीका इनके चरित्रका वर्णन करना ( द्रोण० ५९ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा इनके राज्य आदिका वर्णन ( शान्ति० २९१ । ५९-६२ ) ।
  • गोदान-महिमाके प्रसंगमें इनका नाम-निर्देश ( अनु० ७६ । २६ ) ।
  • इनके द्वारा मांस-भक्षण-निषेध ( अनु० ११५ । ६४ ) ।
  • इनके यज्ञमें धन-दानका वर्णन ( अनु० १३० । १४ ) ।

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