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रुक्मिणी

  • नारायण-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करनेके लिये भूतकालमें विद्यमान भीष्मकके कुलमें उत्पन्न हुई लक्ष्मी ( आदि० ६७ । ६३ ) ।
  • शिशुपाल इन्हें चाहता था, परंतु न पा सका ( सभा० ४५ । १५ ) ।
  • इनका लक्ष्मीसे उनके निवासयोग्य स्थान पूछना ( अनु० ११४ । ४ ) ।
  • इनके पुत्रोंके नाम—चारुदेष्ण, सुचारु, चारुयोध, चारुनेत्र, चारुयश, चारुवर्मा, प्रद्युम्न, शम्भु ( अनु० १४१ । ३३-३४ ) ।
  • ऋषि दुर्वासाद्वारा इनका रमण ( अनु० १५० । ७७-७८ ) ।
  • प्रद्युम्न हुए दुर्वासाद्वारा इन्हें वरदान ( अनु० १५९ । ४५-४७ ) ।
  • श्रीकृष्णरहित द्वारका और श्रीकृष्णपत्नियोंको देखकर फूट-फूटकर रोते हुए अर्जुन जब मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, तब रुक्मिणा आदि रानियाँ वहाँ दौड़ी आयीं और अर्जुनको उच्चस्वरसे विलाप करने लगीं । उन्होंने अर्जुनको उठाकर उन्हें सोनेकी चौकीपर बिठाया । उन्हें घेरकर वे चुपचाप बैठ गयीं ( मौसल० १ । १२-१४ ) ।
  • रुक्मिणीने पतिलोककी प्राप्तिके लिये अग्निमें प्रवेश किया था ( मौसल० ७ । ७३ ) ।
  • महाबाहु विश्वकर्मानीने इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् पद्मनाभके लिये जिस
  • मनोहर प्रासादका निर्माण किया है, उसका विस्तार सब ओरसे एक योजनका है, उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया है, जिससे वह मेरु पर्वतके उत्तुङ्ग शृङ्गकी शोभा धारण कर रहा है । वह प्रासाद महात्मा विश्वकर्माने महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया है । यह इनका सर्वोत्तम निवास है ( सभा० ३८ । २८ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ८१४, कालम २ ) ।

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