← अनुक्रमणिका

रुक्मी

  • (१) एक श्रेष्ठ नरेश, जो क्रोधवश संरक्षक दैत्यके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ६२ ) ।
  • ( यह विदर्भदेशीय भोजकट नगरका राजा, भीष्मकका पुत्र और रुक्मिणीका भाई था । ) यह भोजकटका निवासी था, सहदेवके दिग्विजयके समय इसने प्रेमपूर्वक उनका शासन स्वीकार किया था ( सभा० ३१ । ६२-६३ ) ।
  • कर्णकी दिग्विजयके समय इसका उसे कर देना ( वन० २५४ । १४ ) ।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इसको रणनिमन्त्रण भेजनेका निश्चय किया गया था ( उद्योग० ५ । १६ ) ।
  • इसके पिता दाक्षिणात्य देशके अधिपति और साक्षात् इन्द्रके सखा महामना भीष्मक थे, जिन्हें हिरण्यरोमा भी कहते हैं । रुक्मी सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात था । इसने गन्धमादननिवासी किंपुरुषवर द्रुमका शिष्य होकर चारों वेदोंमें गुप्त सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी । इसे इन्द्रदेवताका तेजस्वी विजय नामक उत्तम धनुष प्राप्त हुआ था, जो गाण्डीव और शार्ङ्गधनुषके समान ही तेजस्वी था । यह धनुष उसे अपने गुरुदेव द्रुमसे ही प्राप्त हुआ था । इसने पूर्वकालमें श्रीकृष्णद्वारा किये गये अपनी बहन रुक्मिणीके अपहरणको सहन न कर सकनेके कारण यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं श्रीकृष्णको मारे बिना अपने नगरको नहीं लौटूंगा । परंतु भगवान् श्रीकृष्णके पास पहुँचकर यह उनसे पराजित हो गया, अतः लज्जावश पुनः कुण्डिनपुरको नहीं लौटा । जहाँ उसकी पराजय हुई, वहीं उसने भोजकट नामक नगर बसाया और उसीमें वह समस्त परिवारके साथ रहने लगा ( उद्योग० १५८ । १-१६ ) ।
  • यह एक अक्षौहिणी सेनासे घिरा हुआ पाण्डवोंके पास आया । इसके मनमें श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छा थी । पाण्डवोंको इसकी सूचना मिली और युधिष्ठिरने आगे बढ़कर इनकी अगवानी की । आदर-सत्कारके पश्चात् इसने विश्राम किया । तदनन्तर इसने अर्जुनसे कहा—'यदि तुम डरे हुए हो तो मैं तुम्हारी सहायताके लिये आ पहुँचा हूँ ।' अर्जुनने हँसकर इसकी सहायता लेनेसे इनकार कर दिया । तब इसने दुर्योधनके पास जाकर वहाँ भी यही बात कही । वीर मानी दुर्योधनने इसकी सहायताको ठुकरा दिया और यह सकुशल अपने घरको लौट गया ( उद्योग० १५८ । १७-३१ ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in