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रुचि

  • यह कलिंगराज चित्राङ्गदकी कन्याके स्वयंवरमें गया था ( शान्ति० ४ । ७ ) ।
  • (१) अलकापुरीकी एक अप्सरा, जिसने अष्टावक्रके स्वागतके अवसरपर कुबेर-भवनमें नृत्य किया था ( अनु० १७ । ४४ ) ।
  • (२) महर्षि देवशर्माकी पत्नी, जो अनुपम सुन्दरी थी । इन्द्र इसपर आसक्त हो गये थे ( अनु० ४० । १७-१८ ) ।
  • इसकी रक्षाका भार अपने शिष्य विपुलको सौंपकर देवशर्माका यज्ञके लिये बाहर जाना ( अनु० ४० । २१-४१ ) ।
  • विपुलका योगद्वारा रुचिमें शरीरमें प्रवेश करना ( अनु० ४० । ५८-६० ) ।
  • कामासक्त इन्द्रका रुचिके पास आना और अपना परिचय देना ( अनु० ४१ । २-८ ) ।
  • विपुलद्वारा इन्द्रसे रुचिकी रक्षा और देवशर्माके लौटनेपर रुचिको उन्हें सौंपना ( अनु० ४१ । २०-२१ ) ।
  • उनका अपनी वहिन प्रभावतीके यहाँ जो अङ्गराजकी पत्नी थी, जाते समय मार्गमें किसी देवसुन्दरीकी वेणीसे गिरे हुए सुगन्धित पुष्पको अपनी वेणीमें गूँथकर जाना और उस पुष्पको देखकर प्रभावतीका वैसे ही पुष्प मँगवा देनेके लिये इससे अनुरोध करना ( अनु० ४२ । ५-१० ) ।
  • इसका आश्रमपर लौटकर देवशर्मासे वैसे ही पुष्प मँगा देनेके लिये आग्रह करना ( अनु० ४२ । ११ ) ।
  • रुचिके साथ इसका स्वर्गलोकमें जाना ( अनु० ४३ । १७ ) ।

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