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रुमण्वात्

  • जमदग्निद्वारा रेणुकाके गर्भसे उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र, इनके चार भाई और थे । जिनके नाम हैं—सुषेण, वसु, विश्वावसु और परशुराम । इन्हें माताका वध करनेके लिये पिताने आज्ञा दी; परंतु इन्होंने उसका पालन नहीं किया; जिससे कुपित होकर महर्षि जमदग्निने इन्हें शाप दे दिया । शापवश ये मृग-पक्षियोंकी भाँति जड़-बुद्धि हो गये ( वन० ११६ । १०-१२ ) ।
  • परशुरामजीने पिताको प्रसन्न करके इन्हें शापमुक्त कराया ( वन० ११६ । १७-१८ ) ।
  • एक ऋषिकुमार, जो महर्षि च्यवनके पौत्र तथा प्रमतिके पुत्र थे । घृताची नामकी अप्सराके गर्भसे इनका जन्म हुआ था ( आदि० ५ । ९; अनु० ३० । ६४ ) ।
  • सर्पदंशनसे मरी हुई अपनी प्रेयसी प्रमद्वराके लिये इनका विलाप करना । उसे अपनी आधी आयु देकर जीवित करना तथा उसके साथ इनका विवाह होना ( आदि० ८ । २६ से ९ । १८तक ) ।
  • इनका सर्पजातिसे द्वेष; डुण्डुभके साथ संवाद एवं इनके प्रति डुण्डुभके द्वारा अहिंसा एवं वर्णधर्मोंका संक्षिप्त उपदेश ( आदि० ९ । ११ से ११ अध्यायके अन्ततक ) ।
  • मयंकके विषयमें इनकी जिज्ञासा तथा पिताद्वारा उसका समाधान ( आदि० १२ अध्याय ) ।

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