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लक्ष्मी

  • (१) समुद्रसे प्रकट हुई देवी ( आदि० १८ । ३५ ) ।
  • भगवान् विष्णुकी पत्नी ( आदि० १९८ । ६ ) ।
  • (२) इनके दो स्वरूप हैं—विष्णुप्रिया लक्ष्मी और राज्यलक्ष्मी । विष्णुकी प्रेयसी लक्ष्मी सतियोंकी शिरोमणि हैं।
  • (१) ये पतिका आश्रय छोड़कर कहीं नहीं जातीं; किंतु राज्यलक्ष्मी अनेक स्वरूप धारण करके अनेक लोकोंमें और अनेक राजाओंके पास रहती है । ये अस्थिर और चञ्चल हैं । जहाँ सद्गुण है, सद्धर्म है, वहाँ इनका वास है और जहाँ इन गुणोंका अभाव है, वहाँसे ये हट जाती हैं । नीचे राज्यलक्ष्मीके विषयमें ही कुछ बातें लिखी जाती हैं—) ये कुबेरकी सभामें विराजमान होती हैं ( सभा० १० । ११ ) ।
  • ब्रह्माजीकी सभामें इनकी उपस्थिति होती है ( सभा० ११ । ४१ ) ।
  • द्रोपदीकी अर्जुनके लिये इनसे मङ्गलकामना ( वन० ३० । २२ ) ।
  • इनका प्रह्लादको छोड़कर जाना और पूछनेपर उन्हें इसका कारण बताना ( शान्ति० १२४ । ५८—६२ ) ।
  • इन्द्रको त्याग कर इन्द्रके पास आना और उनके साथ इनका संवाद ( शान्ति० २२५ । ५—२९ ) ।
  • इन्द्र और नारदको इनका दर्शन देना ( शान्ति० २२८ । १६ ) ।
  • इन्द्रके पूछनेपर असुरोंके सद्गुण और दुर्गुणोंका वर्णन ( वन० २२८ । २९—८४ ) ।
  • रुक्मिणीके पूछनेपर भृगुपुत्री नारायणप्रिया लक्ष्मीद्वारा अपने निवासयोग्य स्थानोंका वर्णन ( अनु० ११ । ६—२९ ) ।
  • गौओंके साथ राज्यलक्ष्मीका संवाद और इनका गोमें अपना निवास बनाना ( अनु० ८२ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १२७ । ६—७ ) ।
  • (२) दक्ष प्रजापतिकी पुत्री एवं धर्मकी पत्नी ( आदि० ६६ । १४ ) ।

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