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लोपामुद्रा

  • महर्षि अगस्त्यने अपनी पत्नी बनानेके लिये एक सुन्दरी कन्याका निर्माण किया और पुत्रके लिये तपस्या करनेवाले विदर्भराजके हाथमें उसे दे दिया । उस कन्याका उस राजभवनमें बिजलीके समान प्रादुर्भाव हुआ । उसे पाकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने ब्राह्मणोंको यह शुभ संवाद सुनाया । ब्राह्मणोंने उस कन्याका नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया । धीरे-धीरे वह युवावस्थामें प्रविष्ट हुई । सौ दासियाँ और सौ कन्याएँ उसकी सेवामें रहने लगीं । महात्मा अगस्त्यके भयसे किसी राजकुमारने उनका वरण नहीं किया । वह अपने शील-सदाचारसे पिता तथा स्वजनोंको संतुष्ट रखती थी । उसे युवती हुई देख पिता उसके विवाहके लिये चिन्तित हुए ( वन० ९६ । १९—२० ) ।
  • एक दिन महर्षि अगस्त्यने आकर विदर्भराजसे लोपामुद्राको माँगा । राजा अपनी पुत्रीका विवाह उनके साथ नहीं करना चाहते थे, परन्तु महर्षिके शापके डरसे वे उन्हें कन्या देनेसे इनकार भी न कर सके । माता-पिताको संकटमें पड़ा देख लोपामुद्रा उनमें इस प्रकार बोली—'आप मुझे महर्षिकी सेवामें दे दें और अपनी रक्षा करें ।' तब उन राजदम्पतिने अपनी उस कन्याका विवाह अगस्त्य मुनिके साथ कर दिया । लोपामुद्राने पतिकी आज्ञासे बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण उतारकर वल्कल एवं मृगचर्म धारण कर लिये । वह पतिके समान ही व्रत और आचारका पालन करने लगी । महर्षि उसे लेकर गङ्गाद्वारमें आये और घोर तपस्यामें संलग्न हो गये । लोपामुद्रा बड़ी प्रसन्नता और विशेष आदरके साथ पतिकी सेवा करने लगी । दीर्घकालके पश्चात् प्रसन्न हो महर्षिने उसे समागमके लिये अपने समीप बुलाया, लोपामुद्राने विताके वरके समान राजमहलमें उनके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की । तब महर्षिने लोपा-
  • मुद्राकी इच्छा पूर्ण करनेके निमित्त धन-संग्रहके लिये प्रस्थान किया ( वन० १० अध्याय १९ तक ) ।
  • लोपामुद्रा जो कुछ चाहती थी, महर्षि अगस्त्यने उसे पूर्ण किया, तब लोपामुद्राने उनसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र माँगा । महर्षिने पूछा—'क्या तुम्हारे गर्भमें एक हजार या एक सौ पुत्र उत्पन्न हों, जो दसके ही बराबर हों? अथवा एक ही पुत्र हो, जो हजारोंको जीतनेवाला हो?' लोपामुद्राने सहस्रोंकी समानता करनेवाला एक ही श्रेष्ठ पुत्र माँगा । महर्षि गर्भाधान करके वनमें चले गये । वह गर्भ सात वर्षांतक माताके पेटमें पलता रहा । सात वर्ष बीतनेपर वह अपने तेज और प्रभावसे प्रज्वलित होता हुआ उदरसे बाहर निकला । वही महाविद्वान् 'दृढस्यु' के नामसे विख्यात हुआ ( वन० ९९ । १८—२५ ) ।
  • इनके पातिव्रत्यकी प्रशंसा ( विराट० २९ । १४ ) ।

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