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लोमश

  • (१) एक प्राचीन दीर्घजीवी महर्षि, जो धर्म-पालनसे शुद्ध हृदयवाले हुए थे ( वन० ३१ । १२ ) ।
  • इनका स्वर्गमें जाकर इन्द्रसे मिलना और वहाँ इन्द्रके अर्धसिंहासनपर अर्जुनको बैठा देख इनके मनमें उनके पुण्यकर्म क्या हैं—यह प्रश्न उठना ( वन० ४७ । १—५ ) ।
  • इनके द्वारा इनके मानसिक प्रश्नका समाधान ( वन० ४७ । ७—३१ ) ।
  • इनका इन्द्र और अर्जुनका संदेश लेकर काम्यकवनमें युधिष्ठिरके पास आना ( वन० ४७ । ३३—३५ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको अर्जुनकी दिव्यास्त्र-प्राप्तिकी सूचना देना ( वन० ९१ । १०—१४ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरसे इन्द्रका संदेश कहना ( वन० ९१ । १७—२५ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना ( वन० ९२ । १—७ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको आश्वासन ( वन० ९४ । १७—२२ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको अगस्त्यकी कथा सुनाना ( वन० अध्याय ९६ से
  • ९९ तक ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति राम और परशुरामके चरित्रका वर्णन ( वन० ९९ । ४०—७१ ) ।
  • वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचके अस्थि-दान एवं वज्रनिर्माणका वर्णन ( वन० १०० अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा वृत्रासुरके वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणाका कथन ( वन० १०१ अध्याय ) ।
  • महर्षि लोमशके द्वारा कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिके संहारका वर्णन और देवताओंद्वारा भगवान्की स्तुतिका कथन ( वन० १०२ अध्याय ) ।
  • लोमशजीने युधिष्ठिरको जो प्रमुख विषय सुनाये हैं, उनकी संक्षिप्त सूची इस प्रकार है— भगवान्के आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर आकर उनकी स्तुति करना । अगस्त्यजीका विन्ध्य पर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना । अगस्त्यजीद्वारा समुद्र-पान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुनः भरनेका उपाय पूछना । राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजी द्वारा वर पाना । सगरके पुत्रोंकी उत्पत्तिको कपिलकी क्रोधाग्निसे उनका भस्म होना, असमंजसका परित्याग, अंशुमान्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्‌के प्रयत्नसे दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति । भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गङ्गा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना । पृथ्वीपर गङ्गाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार । नन्दा और कौशिकीका माहात्म्य, श्रृङ्गऋङ्ग मुनिका उपाख्यान तथा उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न । वेश्याका श्रृङ्गऋङ्गकी उपासना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना । श्रृङ्गऋङ्गका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारी स्वरूपकी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन । श्रृङ्ग-ऋङ्गका अङ्गराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना ( वन० अध्याय १०३ से ११३ तक ) ।
  • लोमशद्वारा राजा ययातिके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका वर्णन ( वन० १२१ अध्याय ) ।
  • महर्षि लोमशद्वारा च्यवनको सुकन्याकी प्राप्तिके प्रसंगका वर्णन ( वन० १२२ अध्याय ) ।
  • अश्विनीकुमारोंको कुग्राममें महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्तिका वर्णन ( वन० १२३
  • अध्याय ) ।
  • शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उन्हें मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना ( वन० १२४ अध्याय ) ।
  • अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकटमुक्त होना आदि प्रसंगों और प्रयाग तीर्थके महत्त्वका लोमशद्वारा वर्णन ( वन० १२५ अध्याय ) ।
  • राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और उनके संक्षिप्त चरित्रका इनके द्वारा वर्णन ( वन० १२६ अध्याय ) ।
  • लोमशजीका युधिष्ठिरको सोमक और जन्तुका उपाख्यान सुनाना—सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना ( वन० १२७-१२८ अध्याय ) ।
  • कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमाका इनके द्वारा वर्णन ( वन० १२९ अध्याय ) ।
  • लोमशजीद्वारा विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ—राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना ( वन० १३०-१३१ अध्याय ) ।
  • महर्षि लोमशका अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनके राजा जनकके दरबारमें जानेका वर्णन करना ( वन० १३२ अध्याय ) ।
  • अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप, बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समद्रामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना—इन प्रसंगोंका इनके द्वारा कथन ( वन० १३३-१३४ अध्याय ) ।
  • लोमशजीद्वारा कर्दमिल क्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा मृगियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्युका वर्णन ( वन० १३५ अध्याय ) ।
  • यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्युके प्रसंगोंका लोमशद्वारा कथन ( वन० १३६ अध्याय ) ।
  • भरद्वाजका पुत्रवधके विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना, अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना—इन प्रसंगोंको लोमशजीने सुनाया था ( वन० १३७-१३८ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंकी उत्तरा खण्ड-यात्राके समय लोमशजीद्वारा उसकी दुर्गमताका कथन ( वन० १३९ अध्याय ) ।
  • लोमशजीका
  • नारकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना ( वन० १४२ अध्याय ) ।
  • लोमशजीका युधिष्ठिरको विविध उपदेश देकर देवताओंके परम पवित्र स्थानोंको दिखाना ( वन० १७६ । २२ ) ।
  • ये द्वारकापर पड़े हुए भीष्मजीको देखने गये थे ( शान्ति० ४७ । ७ ) ।
  • इनके द्वारा अन्नदानकी महिमाका कथन ( अनु० १७० । १० ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १२९ अध्याय ) ।
  • ये उत्तर दिशाके ऋषि हैं ( वन० १६५ । ४३ ) ।
  • ( २ ) बिडालोपाख्यानमें आया हुआ बिलाव ( शान्ति० १३८ । २२ ) ।
  • इसका पञ्जित नामक चूहेके साथ संवाद ( शान्ति० १३८ । ४४-१९८ ) ।

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