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वडवाग्नि

  • समुद्रके भीतर रहनेवाली एक अग्नि, जिसे वडवामुख भी कहते हैं । इस अग्निके मुखमें समुद्र अपने जलरूपी हविष्यकी आहुति देता रहता है ( आदि० २ । १९ ) ।
  • जब महर्षि और्वने रोषपूर्वक समस्त लोकोंके विनाशका संकल्प कर लिया, तब उनके पितरों ने आकर उन्हें समझाया और उन्हें अपनी क्रोधाग्निको समुद्रमें डाल देनेके लिये कहा । पितरोंके आदेशसे उन्होंने अपनी क्रोधाग्निको समुद्रमें डाल दिया । वही आज भी घोड़ीके मुखकी-सी आकृति बनाकर महासागरका जल पीती रहती है । वडवा ( घोड़ी ) के समान मुखाकृति होनेके कारण ही इसे वडवाग्नि कहते हैं ( आदि० १७९ । २१-२२ ) ।
  • वडवानल और उदामक इसकी एकता ( वन० २९१ । २० ) ।
  • भगवान् शिवका क्रोध ही वडवानल बनकर समुद्रके जलको सोखता रहता है ( सांख्यि० १८ । २१ ) ।

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