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वसिष्ठ ( वशिष्ठ )

  • )-एक प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि, जो ब्रह्माजीके मानस पुत्र माने गये हैं । एक समय जब राजा संवरण शत्रुओंसे पराजित हो सिन्धुनामक महानदके तटवर्ती निकुञ्जमें एक सहस्र वर्षोंतक छिपे रहे, उन्हीं दिनों भगवान् वसिष्ठ मुनि उनके पास आये । राजाने उन्हें उत्तम आसनपर बिठाकर कहा—'भगवन् ! हम पुनः राज्यके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, आप हमारे पुरोहित हो जाइये ।' तब वसिष्ठजीने 'बहुत अच्छा' कहकर भरत-वंशियोंका अमात्य और पुरोधा बन सबको सम्राट् चक्रवर्तीके पदपर अभिषिक्त कर दिया ( आदि० ९४ । ४०-४५ ) ।
  • वसिष्ठजीका एक नाम आपव भी है ( आदि० २८ । २३ ) ।
  • पूर्वकालमें वरुणने इनको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था ( आदि० ११ । ५ ) ।
  • गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें इनका पवित्र आश्रम था, जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता था । सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे । उस आश्रमके निकटवर्ती वनमें स्वादिष्ट फल-मूल और जलकी सुविधा थी । पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ वहीं तपस्या करते थे ( आदि० ११ । ६-७ ) ।
  • दक्षकन्या सुरभिकी पुत्री नन्दिनी नामक गौ इन्हें दोहनके रूपमें प्राप्त हुई थी ( आदि० ११ । ८-९ ) ।
  • एक दिन द्यो नामक वसुने अपनी पत्नीके बहकानेसे इनकी होमधेनुका अपहरण कर लिया ( आदि० ११ । २६ ) ।
  • वसिष्ठजी फल-मूल लेकर जब आश्रमपर लौटे, तब बछड़े-सहित उस गौको न देखकर वनमें उसकी खोज करने लगे । दिव्य दृष्टिसे यथार्थ बातको जानकर इन्होंने रुष्ट हो वसुओंको मनुष्य-योनिमें जन्म लेनेका शाप दे दिया ( आदि० ११ । २९-३३ ) ।
  • वसुओंके प्रार्थना करने-पर इनका शाप वसुओंको एक-एक वर्षमें ही शापमुक्त होनेका आशीर्वाद और द्यो नामक वसुके दीर्घकालतक मनुष्य-योनिमें रहने, संतान न उत्पन्न करने तथा धर्मज्ञ, सर्वशास्त्रविशारद, पितृहितैषी एवं स्त्री-भोग-परित्यागी होनेका कथन ( आदि० ११ । ३५-४१ ) ।
  • भीष्मने महर्षि वसिष्ठसे छहों अङ्गोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन किया था ( आदि० १०० । ३५ ) ।
  • अर्जुनके जन्म-समयमें सप्तर्षिमण्डलके साथ ये भी पधारे थे ( आदि० १२२ । ५१ ) ।
  • राजा संवरणके द्वारा इनका चिन्तन और इनका बारहवें दिन राजाको दर्शन देना ( आदि० १०२ । १३-२० ) ।
  • सूर्यकन्या तपतीने राजाका चित्त चुरा लिया है—यह जानकर इनका ऊर्ध्वलोकमें गमन और इनके द्वारा सूर्य भगवान्का स्तवन ! सूर्यद्वारा इनका स्वागत और इन्हें अभीष्ट वस्तु देनेका आश्वासन ( आदि० १०२ । १५-२० ) ।
  • इनका संवरणके
  • लिये तपतीका वरण, सूर्यदेवका अपनी कन्याका दान और तपतीके राजाके समीप आगमन ( आदि० १०२ । २०-२८ ) ।
  • इनकी आज्ञासे राजाका तपतीके साथ विधिवत् विवाह करके उसके साथ पर्वतपर विहार करना ( आदि० १०२ । ३२-३४ ) ।
  • अर्जुनके पूछनेपर गन्धर्वका उन्हें वसिष्ठजीका परिचय देना—ये ब्रह्माजीके मानपुत्र हैं, अरुन्धतीदेवीके पति हैं । देवदुष्ट काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु इनकी तपस्यासे पराभूत हो इनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें कर लेनेके कारण ये 'वसिष्ठ' कहलाते हैं ( आदि० १०३ । १-६ ) ।
  • विश्वामित्रके अपराधसे मरे हुए सौ पुत्रोंका बदला लेनेकी शक्ति रखते हुए भी इन्होंने कुशिक-वंशका मूलोच्छेद नहीं किया । उन पुत्रोंके मारे जानेसे संतप्त हो बदला लेनेकी शक्ति रखते हुए भी इन्होंने असमर्थकी भाँति सब कुछ सह लिया, किंतु विश्वामित्रका विनाश करनेके लिये कोई क्रूरतापूर्ण कर्म नहीं किया । ये अपने मरे हुए पुत्रोंको यमलोकसे भी वापस ला सकते थे, फिर भी यमराजकी मर्यादाका उल्लङ्घन करनेको उद्यत नहीं हुए ( आदि० १०३ । ७-९ ) ।
  • इनकी पुरोहितवृत्तिसे राजा इक्ष्वाकुवंशी नरसिंह इन दुर्व्यवहार अधिकार प्राप्त किया था ( आदि० १०३ । १०-११ ) ।
  • इनके आश्रमपर राजा विश्वामित्रका आगमन और नन्दिनीके प्रभावसे इनके द्वारा सेना तथा अतिथिसत्कार ( आदि० १०४ । ६-११ ) ।
  • विश्वामित्रका इनसे नन्दिनीको माँगना और इनका उन्हें देनेसे इन्कार करना ( आदि० १०४ । १२-१६ ) ।
  • विश्वामित्र द्वारा बलपूर्वक नन्दिनीका अपहरण होता देखकर भी इनका मौन रहना । नन्दिनीकी इनसे विश्वामित्रकी सेनाका नाश करनेकी आज्ञा देना और इनकी आज्ञा पाते ही नन्दिनीका म्लेच्छोंकी सृष्टि करके उनके द्वारा विश्वामित्रकी सेनाको मार भगाना ( आदि० १०४ । २१-४३ ) ।
  • विश्वामित्रका इनके ऊपर नाना प्रकार अस्त्र-शस्त्र और दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करना तथा इनका अपनी बाँकी छड़ीसे ही उनके सारे अस्त्र-शस्त्रोंको भस्मभूत कर देना ( आदि० १०४ । ४३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ४१५ ) ।
  • शक्तिके शापसे राक्षसभावको प्राप्त हुए कल्माषपादद्वारा विश्वामित्रकी प्रेरणा पाकर इनके पुत्रोंका भक्षण और इनका शोक ( आदि० १०५ । १-४३ ) ।
  • महर्षिने विश्वामित्रका विनाश न करके स्वयं ही शरीर त्याग देनेका विचार कर लिया । ये मेरु पर्वतके शिखरसे कूद पड़े;
  • किंतु पत्थरकी शिला रुईके ढेरके समान हो गयी । ये धधकते हुए दावानलमें घुस गये; परंतु वह आग इनके लिये शीतल हो गयी । ये गलेमें भारी पत्थर बाँधकर समुद्रके जलमें कूद पड़े; परंतु समुद्रने अपनी लहरोंमें ढकेलकर इन्हें किनारे डाल दिया ( आदि० १०५ । ४४-४९ ) ।
  • इन्होंने देखा, वर्षाका समय है । एक नदी नूतन जलसे लबालब भरी है और तटवर्ती वृक्षोंको बहाये लिये आती है । मोचा इसीके जलमें डूब जाऊँ । अपने शरीरको पाषाणोंद्वारा अच्छी तरह बाँधकर ये उस महानदीके जलमें कूद पड़े; परंतु उस नदीने इनके बन्धन काटकर इन्हें स्थलमें पहुँचा दिया । उसके द्वारा विपाशा ( बन्धनरहित ) होनेके कारण इन्होंने उनका नाम विपाशा रख दिया । इनके बाद हिमालयसे निकली हुई एक दूसरी भयंकर नदीकी प्रखर धारा में इन्होंने अपने-आपको डाल दिया; परंतु इनके गिरते ही वह शत-शत धाराओंमें फूटकर द्रुतगतिसे इधर-उधर भाग चली । इसलिये 'शतद्रु' नामसे विख्यात हुई ( आदि० १०६ । १-९ ) ।
  • इनका अपनी पुत्रवधू अहर्यन्तीके गर्भस्थ बालकके मुखसे वेदाध्ययनकी ध्वनि सुनकर और शक्तिके गर्भस्थ बालककी सूचना पाकर अपनी वंशपरम्परा सुरक्षित जान मृत्युके संकल्पसे विरत होना ( आदि० १०६ । १२-१६ ) ।
  • राक्षसके भयसे डरी हुई अहर्यन्तीको आश्वासन दे इनका कल्माषपाद का शापसे उद्धार करना तथा राजाकी प्रार्थनासे इनका रानी मदयन्तीके गर्भसे अश्मक नामक पुत्रको उत्पन्न करना ( आदि० १०६ । १७-४७ ) ।
  • भृगुवंशी और्वकी कथा सुनाकर इनके द्वारा पराशरके जगद्विनाशक संकल्पका निवारण तथा पराशरके राक्षससत्रकी समाप्ति ( आदि० १०७ । २१ से आदि० १८० । २१ तक ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ११ । १९ ) ।
  • इनके द्वारा श्रीरामका राज्याभिषेक ( वन० २९१ । १६ ) ।
  • वसिष्ठानुवाह तीर्थमें हस्तिनापुर जाते हुए भीष्मको देखनेके लिये द्रोणाचार्यके पास आकर उनसे युद्ध बंद करनेको कहना ( उद्योग० ८३ । २०, ३३-४० ) ।
  • कुरुक्षेत्रमें वसिष्ठजीके आवाहन करनेपर सरस्वती नदी 'औघवती' के नामसे प्रकट हुई थी ( शल्य० ३८ । १०-२१ ) ।
  • वसिष्ठानुवाह तीर्थके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता ( शल्य० ४२ अध्याय ) ।
  • ये शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मको देखनेके लिये गये थे ( शान्ति० ४७ । ७ ) ।
  • वसिष्ठजी मुचुकुन्दके पुरोहित थे और कुबेर एवं यक्षोंके साथ युद्ध छिड़ जानेपर इन्होंने तपस्यासे मुचुकुन्दके
  • लिये विजयका मार्ग प्रशस्त किया था ( शान्ति० ७४ । ५-६ ) ।
  • इनके द्वारा प्रजाको जीवनदान ( शान्ति० २३४ । २०; अनु० १३७ । १३ ) ।
  • वृत्रासुरसे भयभीत इन्द्रको रथन्तर सामद्वारा सचेत करना ( शान्ति० २९१ । २१-२६ ) ।
  • ये मूल गोत्रप्रवर्तक चार ऋषियोंमेंसे एक हैं ( शान्ति० २२६ । १७ ) ।
  • विदेहराज कराल जनकको विविध ज्ञानोपदेश ( शान्ति० अध्याय ३०२ से ३०८ तक ) ।
  • इक्कीस प्रजापतियोंमें इनकी भी गणना है ( शान्ति० ३३४ । २८-२९ ) ।
  • ये 'चित्रशिखण्डी' नामवाले ऋषियोंमेंसे एक हैं ( शान्ति० ३३५ । २८-२९ ) ।
  • इनके द्वारा हिरण्यकशिपुको शाप ( शान्ति० ३४२ । ३१ ) ।
  • पुत्रप्राप्तिकी श्रेष्ठताके विषयमें इनका ब्रह्माजीके साथ संवाद ( अनु० ७८ अध्याय ) ।
  • इनका राजा सौदासको गोदानकी विधि और गौओंका महत्त्व बताना ( अनु० ७८ । ५५ से ८५ अध्यायतक ) ।
  • परशुरामजीको शुद्धिके उपायके लिये सुवर्णके दान और उसकी उत्पत्तिका प्रसंग बताना ( अनु० ८४ । ४४ से ८५ अध्यायतक ) ।
  • वृषादर्मिसे अप्रतिग्रहका दोष बताना ( अनु० ९३ । ३१ ) ।
  • अहन्द्यतीसे अपनी दुर्बलताका कारण बताना ( अनु० ९३ । ६१ ) ।
  • मातुर्वधसम्बन्धी होनेपर शपथ खाना ( अनु० ९३ । ११४-११५ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शाप देना ( अनु० ९४ । १७ ) ।
  • ब्रह्माजीसे यज्ञके विषयमें प्रश्न करना ( अनु० १२६ । ४४-४५ ) ।
  • वायुदेवद्वारा इनके प्रभावका वर्णन ( अनु० १५५ । १४-१६ ) ।
  • कुम्भमें देवताओंका वीर्य स्थापित हुआ था; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई ( अनु० १५८ । १९ ) ।
  • वृत्रासुरसे गृहीत एवं मोहित हुए इन्द्रको सचेत करना ( आश्व० ११ । १८-१९ ) ।

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