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वसुदेव

  • शूरसेनके पुत्र । देवकीके पति । श्रीकृष्णके पिता । उग्रसेनके मन्त्री । पाण्डवोंके चूड़ाकरण आदि संस्कारके लिये इनको वृष्णिवंशियोंकी प्रेरणा, इनका पाण्डुपुत्रोंके संस्कार करवानेके लिये काश्यप नामक पुरोहितको शतशृङ्गपर्वतपर भेजना ( आदि० १२३ । ३१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ २१९ ) ।
  • उग्रसेनके भाई
  • देवकीकी पुत्री देवकीके साथ इनका विवाह । देवकीको मारनेके लिये उद्यत हुए कंसको इनके द्वारा आश्वासन ( सभा० २२ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७३१ ) ।
  • इनका नवजात शिशु श्रीकृष्णको रातमें व्रज पहुँचाना और वहाँसे नन्द-कन्याको ले आना ( सभा० २२ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७३२; ७१८ ) ।
  • इनका श्रीकृष्णसे महाभारत-युद्धका वृत्तान्त पूछना ( आश्रम० ६० । १—४ ) ।
  • सुभद्राको मूर्छित हुई देखकर स्वयं भी मूर्छित होना और पुनः श्रीकृष्ण अभिमन्युवधका वृत्तान्त पूछना ( आश्रम० ६१ । १—५ ) ।
  • अभिमन्युका श्राद्ध करना ( आश्रम० ६२ । १ ) ।
  • मौसलकाण्डमें यादवोंका संहार हो जानेपर भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें अपने पिता वसुदेवके पास आना, इनसे अर्जुनकी प्रतीक्षा करते हुए स्त्रियोंको रक्षा करनेके लिये कहना और इनके चरणोंपर मस्तक रखकर बलरामजीके साथ तप करनेके विचारसे तुरंत वहाँसे चल देना ( मौसल० ४ । ८—१० ) ।
  • इनका अर्जुनसे वृष्णि-वंशियोंके दुःख-संहारकी बात बताना और श्रीकृष्णका संदेश सुनाना ( मौसल० ६ अध्याय ) ।
  • अर्जुनका इनसे अपना श्रीकृष्णविरहजनित दुःख बताना और वृष्णिवंशकी स्त्रियोंको इन्द्रप्रस्थ ले जानेका विचार प्रकट करना ( मौसल० ७ । १—६ ) ।
  • इनके द्वारा परमात्मचिन्तन-पूर्वक अपने शरीरका त्याग ( मौसल० ७ । १५ ) ।
  • अर्जुनद्वारा इनका अन्त्येष्टि-संस्कार तथा इनकी चार पत्नियोंका इनके शवके साथ चितारोहण ( मौसल० ७ । १९—२० ) ।
  • ये स्वर्गमें जाकर विश्वेदेवोंके स्वरूपमें मिल गये ( स्वर्ग० ५ । १७ ) ।

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