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वायुवेग

  • इनका शाल्वको मारनेके लिये उद्यत हुए प्रद्युम्नके पास आकर देवताओंका संदेश सुनाना ( वन० ११ । २२-२४ ) ।
  • इनके द्वारा दमयन्तीकी शुद्धिका समर्थन ( वन० ७६ । ३६ ) ।
  • इनके द्वारा सीताजीकी शुद्धिका समर्थन ( वन० २९१ । २७ ) ।
  • त्रिपुरदाहके समय भगवान् शङ्करके बाणके पंख बने थे ( द्रोण० २०२ । ७६-७७ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको बल और अतिबल नामक दो पार्षद प्रदान ( शल्य० ४५ । ४४-४५ ) ।
  • महाराज पुरूरवाके पूछनेपर उन्हें पुरोहितकी आवश्यकता बताना ( शान्ति० ७२ । १०-२५ ) ।
  • नारदजीके मुखसे सेमलकी उद्दण्डताकी बात सुनकर इनका उस वृक्षको धमकाना ( शान्ति० १५६ । ६-९ ) ।
  • सेमल वृक्षको चेतावनी देना ( शान्ति० १५७ । ५-६ ) ।
  • इन्होंने सुपर्णसे सात्वत धर्मकी शिक्षा प्राप्त की और स्वयं भी विध्वंशी ऋषियोंको उसका उपदेश दिया ( शान्ति० ३४८ । २२-२४ ) ।
  • इनके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १२८ अध्याय ) ।
  • इनका कार्तवीर्य अर्जुनके प्रति ब्राह्मणोंकी महत्ताका प्रतिपादन ( अनु० १५२ । २४ से अनु० १५७ अध्याय तक ) ।
  • ( २ ) एक प्राचीन ऋषि, जो शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीको देखने आये थे ( शान्ति० ४७ । १ ) ।
  • (१) एक क्षत्रिय राजा, जो क्रोधवशसंज्ञक दैत्यके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । ६३ ) ।
  • इन्हें पाण्डवोंकी ओरसे रणनिमन्त्रण भेजनेका निश्चय किया गया था ( उद्योग० ५ । १७ ) ।
  • (२) मण्डूक मुनिके कलशमें रखे हुए वीर्यसे उत्पन्न एक ऋषि ( शल्य० ३८ । ३२-३७ ) ।

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