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वालखिल्य ( बालखिल्य )

  • ब्रह्माजीके शक्तिशाली पुत्र महर्षि क्रतुसे उत्पन्न हुए ऋषि, जिनकी संख्या साठ हजार है । ये क्रतुके समान ही पवित्र, सत्यवादी, व्रतपरायण तथा भगवान् सूर्यके आगे चलनेवाले हैं ( आदि० ६६ । १-४ ) ।
  • कश्यपकी प्रार्थनासे गरुडद्वारा तोड़ी हुई वटशाखाको छोड़कर इन लोगोंका तपके लिये प्रस्थान ( आदि० ३० । १८ ) ।
  • देवराज इन्द्रके अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे पक्षियोंके गरुडसे उत्पन्न होनेकी बृहस्पतिद्वारा चर्चा ( आदि० ३० । ४० ) ।
  • पुत्रकी कामनासे किये जानेवाले महर्षि कश्यपके यज्ञमें सहायताके लिये एक छोटी-सी पलाशकी टहनी लेकर आते हुए अङ्गुष्ठके मध्यभागके बराबर शरीरवाले वालखिल्य ऋषियोंका बलोन्मत्त इन्द्रद्वारा उपहास, अपमान और लङ्घन ( आदि० ३१ । १-१० ) ।
  • रोषमें भरे हुए वालखिल्योंका देवराजके लिये भयदायक दूसरे इन्द्रकी उत्पत्तिके निमित्त अग्निमें विधिवत् होम करना ( आदि० ३१ । ११-१४ ) ।
  • महर्षि कश्यपका अनुनय-पूर्वक वालखिल्योंको समझाना, इनके सबके अनुनय होनेवाले पुत्रको पक्षियोंका इन्द्र बनानेके लिये इनकी सम्मति लेना और याचक बनकर आए हुए देवराज इन्द्रपर अनुग्रह करनेके लिये अनुरोध करना । वालखिल्योंका इनके अनुरोधको स्वीकार करना ( आदि० ३१ । १६-२३ ) ।
  • ये सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले ऋषि और ब्रह्माजीकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ११ । २० ) ।
  • इन्होंने सरस्वतीके तटपर यज्ञ किया था ( वन० ९० । १० ) ।
  • द्रोणाचार्यके पास आकर उनसे युद्ध बंद करनेको कहना ( द्रोण० ५३ । ३३-४० ) ।
  • ये राजा पृथुके मन्त्री बने थे ( शान्ति० ५९ । १० ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर इनका शपथ खाना ( अनु० ९४ । ३१ ) ।
  • वालखिल्यगण तपस्यासे सिद्ध हुए मुनि हैं । ये सब धर्मोंके ज्ञाता हैं और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं । वहाँ ये उच्छवृत्तिके आश्रय ले पक्षियोंकी भाँति एक-एक दाना बीनकर उसीसे जीवन-निर्वाह करते हैं । मृगछाला, चीर और वल्कल—ये ही इनके वस्त्र हैं । ये वालखिल्य शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, सन्मार्गपर चलनेवाले और तपस्याके धनी हैं । इनमेंसे प्रत्येकका शरीर अङ्गुष्ठके सिरेके बराबर है । इतने लघुकाय होनेपर भी ये अपने-अपने कर्तव्यमें स्थित हो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं । इनके धर्मका फल महान्
  • है । ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उनके समान रूप धारण करते हैं । ये तपस्यासे सम्पूर्ण पापोंको दग्ध करके अपने तेजसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हैं ( अनु० १४१ । ९९-१०२ ) ।
  • ये प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए महसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं । ये सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं । इन्हींमें लोक-रक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है । इन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत् टिका हुआ है । इन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है—ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ( अनु० १४२ । ३३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ५२३३ ) ।

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