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वासुकि

  • एक नागराज, जो आस्तीकके मामा तथा कश्यप और कद्रूके पुत्र थे ( आदि० ३५ । ५ ) ।
  • नागोंकी रक्षाके लिये इनके द्वारा अपनी बहिन जरत्कारुको जरत्कारु ऋषिके सेवामें उनकी पत्नीरूपमें समर्पण ( आदि० १३ । २०—२६ ) ।
  • समुद्र-मन्थनके समय इनका मन्थनदण्डकी डोरी होना ( आदि० ९८ । १३ ) ।
  • नागोंद्वारा इनका नागराज-पदपर अभिषेक ( आदि० ३६ । २५ के बाद दा० पाठ ) ।
  • माताके शापसे इनका चिन्तित होना ( आदि० ३० । ३—९; आदि० ४८ । ३—८ ) ।
  • माताके शापसे अपनी रक्षा करनेके उपायपर इनका नागोंके साथ परामर्श ( आदि० ३७ । १०—२४ ) ।
  • एलापत्र नामक नागका इनको अपनी बहिनका जरत्कारु ऋषिके साथ विवाह करनेकी सलाह देना ( आदि० ३८ । १८—१९ ) ।
  • ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकि का जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना ( आदि० ३९ अध्याय ) ।
  • सर्प-यज्ञमें जलते हुए नागोंको देखकर उनकी रक्षाके लिये भयभीत हुए इनका अपनी बहिन जरत्कारुको आस्तीकसे बहिनके लिये प्रेरित करना ( आदि० ५३ । २०—२६ ) ।
  • इनके वंशके जले हुए नागोंकी गणना ( आदि० ५७ । ५—६ ) ।
  • ये अर्जुनके जन्मसमयमें वहाँ पधारे थे ( आदि० १२२ । ७१ ) ।
  • आर्यकके प्रार्थनापर भीमसेनको दिव्य-रसका पान करानेके लिये इनका नागोंको आदेश देना ( आदि० १२७ । ६९ ) ।
  • ये वरुण-सभामें उपस्थित होकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ९ । ८ ) ।
  • अर्जुनने कभी इनकी बहिनका चित्त चुराया था ( विराट० २ । १४ ) ।
  • ये त्रिपुरदाहके समय भगवान् शङ्करके धनुषकी प्रत्यञ्चा बने थे ( द्रोण० २०२ । ७६ ) ।
  • साथ ही उनके रथका कूबर भी बने हुए थे ( कर्ण० २४ । २२ ) ।
  • कर्ण और अर्जुनके द्वैरथ युद्धके समय ये अर्जुन-की ही विजयके समर्थक थे ( कर्ण० ८७ । ४३ ) ।
  • इनका नागधन्वातीर्थ निवासस्थान है; वहीं देवताओंने इनका नागराजके पदपर अभिषेक किया था ( शल्य० ४५ । ५२—५३ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको जय और वरदानका दान ( शल्य० ४५ । ५२—५३ ) ।
  • ये सात धरणीधरोंमेंसे एक हैं ( अनु० १५० । ४१ ) ।
  • बलरामजीके परशुरामधामके समय ये उनके स्वागतमें आये थे ( मौसल० ४ । १५ ) ।

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