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विजय

  • ( १ ) एक प्राचीन राजा ( आदि० ९ । २३३ ) ।
  • ( २ ) भगवान् शङ्करके त्रिशूलका नाम । यह विजय नामक त्रिशूल स्कन्दकी भद्रवट-यात्राके समय यमराजके पीछे-पीछे गया था । यह तीन शिखरोंसे सुशोभित और सिन्दूर आदिसेसुसज्जित था ( वन० २३१ । ३०-३८ ) ।
  • ( ३ ) अज्ञातवासके समय युधिष्ठिरद्वारा नियत किया गया अर्जुनका एक गुप्त नाम ( विराट० ५ । ३५ ) ।
  • ( ४ ) अर्जुनके प्रसिद्ध दस नामोंमेंसे एक । इस नामकी व्याख्या
  • (५) देवराज इन्द्रका एक दिव्य धनुष, जो गाण्डीवके समान तेजस्वी था और श्रीकृष्णाके शार्ङ्गधनुषकी समान गणना करता था । देवताओंके तीन ही धनुष दिव्य माने गये हैं—विजय, गाण्डीव और शार्ङ्ग । ये क्रमशः इन्द्र, वरुण और भगवान् विष्णुके धनुष हैं । गन्धमादननिवासी किम्पुरुषप्रवर द्रुमको इन्द्रसे यह दिव्य धनुष प्राप्त हुआ था । फिर इसे इन्द्रके शिष्य महातेजस्वी रुक्मीने प्राप्त किया ( उद्योग० १५८ । ३-५ ) ।
  • (६) धृतराष्ट्रका एक पुत्र, जिसने जय और दुर्जयके साथ मिलकर नील, कायव तथा जयत्सेन-इन तीनोंसे युद्ध किया ( द्रोण० २५ । ६-७ ) ।
  • (७) इसका सात्यकिके साथ युद्ध ( द्रोण० ११६ । ६-७ ) ।
  • शकुनिके अर्जुनपर धावा करनेके समय यह भी उसके साथ था ( द्रोण० ११६ । १२०-१२३ ) ।
  • (८) कर्णके दिव्य धनुषका नाम, जो समस्त आयुधोंमें श्रेष्ठ था । इसे इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले विश्वकर्माने उन्हींके लिये बनाया था । देवेन्द्रने इसी धनुषसे कितने ही दैत्यसमूहोंपर विजय पायी थी । इसकी टङ्कार सुनकर दैत्योंको दसों दिशाओंको पहचाननेमें भ्रम हो जाता था । इसी अपने परम प्रिय धनुषको इन्द्रने परशुरामजीको दिया था और परशुरामजीने वह दिव्य उत्तम धनुष कर्णको दे दिया था । यह घोर धनुष गाण्डीवसे श्रेष्ठ था । इसीके द्वारा परशुरामजीने इस पृथ्वीपर इक्कीस बार विजय पायी थी ( कर्ण० ३१ । १२-४६ ) ।
  • (९) भगवान् शिवका एक नाम ( अनु० १०७ । ५१ ) ।
  • (१०) भगवान् विष्णुका एक नाम ( अनु० १४१ । २९ ) ।

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